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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 248 में से

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पृष्ठ 210

१८४ वात्स्यायन-कामसूत्र
लाभमात्रे कस्यचिदन्यस्य गमनं सोऽर्थो निरनुबन्धः ॥ १४ ॥
अनुबन्धरहित अर्थ—केवल अर्थलाभ की दृष्टि से किसी से भी समागम कर लेना
अनुबन्धरहित अर्थ है ॥ १४ ॥
अन्यार्थपरिग्रहे सक्तादायतिच्छेदनमर्थस्य निष्क्रमणं लोकविद्विष्टस्य वा
नीचस्य गमनमायतिघ्नमर्थोऽनर्थानुबन्धः ॥ १५ ॥
अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध—नायक के हाथों पराया (चुराया हुआ) अर्थ लेने से
वेश्या का प्रभाव कम होता है और वह अर्थ भी निकल जाता है अथवा लोकद्रोही या अधम
पुरुष के साथ समागम करने से प्रभाव कम होता है और ऐसा अर्थ अनेक अनर्थों को उत्पन्न
करता है, अतएव इसे अर्थोऽनुर्थानुबन्धः (अर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध) कहते हैं ॥ १५ ॥
स्वेन व्ययेन शूरस्य महामात्रस्य प्रभवतो वा लुब्धस्य गमनं निष्फलमपि
व्यसनप्रतीकारार्थं महतश्चार्थघ्नस्य निमित्तस्य प्रशमनमायतिजननं वा सोऽनर्थो-
ऽर्थानुबन्धः ॥ १६ ॥
अनर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध—अपने व्यय पर किसी शूरवीर, प्रभावशाली पुरुष,
महामन्त्री या लोभी के साथ समागम निष्फल (तत्काल अर्थहीन) होने पर भी सङ्कट के निवारण
के लिये, महान् अर्थनाशक कारणों को शान्त करने के लिये और प्रभाव बढ़ाने के लिये तो है।
इस प्रकार अर्थप्राप्ति रूप एक प्रयोजन के सिद्ध न होने पर भी अनेक प्रयोजन सिद्ध करने वाला
है—इसे ही 'अनर्थोऽर्थानुबन्धः'—अनर्थ का अर्थ से अनुबन्ध कहा जाता है ॥ १६ ॥
कदर्यस्य सुभगमानिनः कृतघ्नस्य वातिसन्धानशीलस्य स्वैरपि व्ययैस्तथारा-
धनमन्ते निष्फलं सोऽनर्थो निरनुबन्धः ॥ १७ ॥
अनुबन्धरहित अनर्थ—अपने को सुन्दर समझने वाले, कृपण, कृतघ्न या अत्यधिक
चाटुकारिता चाहने वाले पुरुष के साथ जब वेश्या अपने व्यय पर समागम करती है तो उसका
धन और अनुराग, दोनों ही निष्फल हो जाते हैं। किसी के भी साथ सम्बद्ध न होने के कारण
ऐसा अनर्थ अनुबन्धरहित कहलाता है ॥ १७ ॥
तस्यैव राजवल्लभस्य क्रौर्यप्रभावाधिकस्य तथैवाराधनमन्ते निष्फलं
निष्कासनं च दोषकरं सोऽनर्थोऽनर्थानुबन्धः ॥ १८ ॥
अनर्थ के साथ अनर्थ का अनुबन्ध—कृपण पुरुषों से केवल अनुबन्धरहित अनर्थ ही
उत्पन्न हो, ऐसा नहीं है; कभी-कभी अनर्थ से सम्बन्धित अनर्थ भी उत्पन्न हो जाते हैं। इसी
प्रकार किसी क्रूर राजपुरुष या प्रशासनिक अधिकारी के साथ समागम करना निष्फल होता है
और उसे निकाल देना अनेक अनर्थों को उत्पन्न करने वाला बन जाता है। इस प्रकार यह अनर्थ
अपने साथ अनेक अनर्थों का सम्बन्ध रखने के कारण ‘अनर्थोऽनर्थानुबन्धः' (अनर्थ का अनर्थ
के साथ अनुबन्ध) कहलाता है ॥ १८ ॥
एवं धर्मकामयोरप्यनुबन्धान् योजयेत् ॥ १९ ॥
धर्म और काम की अनुबन्ध योजना—इसी प्रकार धर्म और काम के अनुबन्धों की भी
योजना कर लेनी चाहिये ॥ १९ ॥