सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

६. वैशिक अधिकरण १८३
स्वभाव में कठोरता आना, अपनी गम्यता और शरीर का उपघात (विनाश), बालों का काट
लिया जाना, बन्धन एवं ताड़न तथा अङ्ग-भङ्ग कर देना ॥ ३ ॥
तस्मात्तानादित एव परिजिहीर्षेदर्थभूयिष्ठाँश्चोपेक्षेत ॥ ४ ॥
उपाय का समुचित समय—अतएव वेश्या को चाहिये कि बुद्धि की दुर्बलता आदि
अनर्थ के कारणों को प्रारम्भ से ही दूर कर दे और यदि उनसे अधिक धन भी मिलता हो तो भी
उनकी उपेक्षा कर दे ॥ ४ ॥
अर्थो धर्मः काम इत्यर्थत्रिवर्गः ॥ ५ ॥
अर्थ, धर्म और काम—यह अर्थत्रिवर्ग कहलाता है ॥ ५ ॥
अनर्थोऽधर्मो द्वेष इत्यनर्थत्रिवर्गः ॥ ६ ॥
अनर्थत्रिवर्ग—अनर्थ, अधर्म और द्वेष—यह अनर्थत्रिवर्ग है ॥ ६ ॥
तेष्वाचर्यमाणेष्वन्यस्यापि निष्पत्तिरनुबन्धः ॥ ७ ॥
अनुबन्ध-स्वरूप—अर्थ आदि को सिद्ध करते हुए, उसके साथ जो दूसरा स्वतः सिद्ध
हो जाये, उसे 'अनुबन्ध' कहते हैं ॥ ७ ॥
सन्दिग्धायां तु फलप्राप्तौ स्याद्वा न वेति शुद्धसंशयः ॥ ८ ॥
शुद्धसंशय—'यह होगा या नहीं'? इस प्रकार फलप्राप्ति में सन्देह होना 'शुद्ध संशय'
कहलाता है ॥ ८ ॥
इदं वा स्यादिदं वेति सङ्कीर्णः ॥ ९ ॥
संकीर्णसंशय—'यह फल होगा या यह फल'?—यह सङ्कीर्णसंशय है ॥ ९ ॥
एकस्मिन् क्रियमाणे कार्ये कार्यद्वयस्योत्पत्तिरुभयतोयोगः ॥ १० ॥
उभयतोयोग—जब एक कार्य करने पर दूसरे कार्य की उत्पत्ति स्वतः हो जाये तो उसे
'उभयतो योग' कहते हैं ॥ १० ॥
समन्तादुत्पत्तिः समन्ततोयोग इति तानुदाहरिष्यामः ॥ ११ ॥
समन्ततोयोग—जब चारों ओर से उत्पत्ति हो तो उसे 'समन्ततो योग' कहते हैं। इसके
उदाहरण आगे देंगे ॥ ११ ॥
विचारितरूपोऽर्थत्रिवर्गः। तद्विपरीत एवानर्थत्रिवर्गः ॥ १२ ॥
दोनों त्रिवर्ग—जिसके स्वरूप पर विचार किया जा चुका है वह अर्थत्रिवर्ग है। इसके
विपरीत अनर्थत्रिवर्ग है ॥ १२ ॥
यस्योत्तमस्याभिगमने प्रत्यक्षतोऽर्थलाभो ग्रहणीयत्वमायतिरागमः प्रार्थनीयत्वं
चान्येषां स्यात्सोऽर्थोऽर्थानुबन्धः ॥ १३ ॥
अर्थ के साथ अर्थ का अनुबन्ध—जिस उत्तम नायक के साथ समागम करने पर
नायिका को केवल अर्थलाभ ही न हो, अपितु उस का प्रभाव बढ़ जाये, वह अन्य नायकों के
लिये आकांक्षा की वस्तु बन जाये, वे समागम हेतु प्रार्थना करें और नायिका को अर्थ की प्राप्ति
हो तो यह अर्थ प्रथम या प्रधान अर्थ के साथ सम्बद्ध होने के कारण अर्थोऽर्थानुबन्धः (अर्थ का
अर्थ के साथ अनुबन्ध) कहलाता है ॥ १३ ॥