वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७. औपनिषदिक अधिकरण १९५
विदारी स्वयंगुप्ता शर्करा मधुसर्पिभ्यां गोधूमचूर्णेन पोलिकां कृत्वा यावदर्थं
भक्षितवानन्ताः स्त्रियो गच्छतीत्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४२ ॥
विदारीकन्द और क्रौंच की पूड़ियाँ—विदारीकन्द और क्रौंच के बीजों के चूर्ण में गेहूँ
का आटा, शहद और शक्कर मिलाकर घी में पूड़ियाँ सेंक लें। इन्हें नित्य खाने से पुरुष में इतना
बलवीर्य बढ़ता है कि वह अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग कर सकता है—ऐसा आचार्य
कहते हैं ॥ ४२ ॥
चटकाण्डरसभावितैस्तण्डुलैः पायसं सिद्धं मधुसर्पिभ्यां प्लावितं
यावदर्थमिति समानं पूर्वेण ॥ ४३ ॥
गौरैया के अण्डों से भावित खीर—चिड़िया के अण्डों के रस की भावना देकर तैयार
किये गये चावलों की खीर बनाये। उसे विषम मात्रा में घी और शहद डालकर खाने से पुरुष में
अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग करने की शक्ति आ जाती है ॥ ४३ ॥
चटकाण्डरसभावितानपगतत्वचस्तिलाञ् शृङ्गाटककसेरुकस्वयंगुप्ता-
फलानि गोधूममाषचूर्णं सशर्करेण पयसा सर्पिषा च पक्वं संयावं यावदर्थं
प्राशित्वा—इति समानं पूर्वेण ॥ ४४ ॥
उक्त रीति से भावित तिलों की खीर—काले तिलों को भिगोकर उनका छिलका अलग
कर लिया जाये और फिर गौरैया के अण्डों के रस की भावना दे। तत्पश्चात् सिंघाड़ा, कसेरू और
क्रौंच के बीजों का चूर्ण तैयार करे। गेहूँ का आटा और उड़द की दाल की पिट्ठी मिलाकर तथा
शक्कर, घी से जल के स्थान पर दूध डालकर लप्सी तैयार कर ले। इसे नित्य खाने से
रतिमल्लता बढ़ती है ॥ ४४ ॥
सर्पिणो मधूनः शर्कराया मधुकस्य च द्वे द्वे पले मधुरसायाः कर्षः प्रस्थं पयस
इति षडङ्गममृतं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरसमित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४५ ॥
मुलहठी आदि का षडङ्ग अमृत—घी, शहद, शक्कर और मुलहठी दो-दो पल, एक
कर्ष मधुरसा और एक प्रस्थ दूध—यह छह अंगों वाला अमृतमेध्य है, वाजीकरण है, आयुर्वर्धक
हैं। इसे युक्तरस कहते हैं ॥ ४५ ॥
शतावरीश्वदंष्ट्रागुडकषाये पिप्पलीमधुकल्के गोक्षीरच्छागघृते पक्वे तस्य
पुष्यारम्भेणान्वहं प्राशनं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरसमित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४६ ॥
शतावरी और गोखरू—शतावरी और पहाड़ी गोखरू—इन दोनों वस्तुओं के कषाय में
पीपल और शहद का कल्क मिलाकर गाय के घी में भूनकर दूध में पका लें। इसे पुष्य नक्षत्र में
नित्य चाटना बलबुद्धिवर्धक है, वाजीकारक है, आयुर्वर्धक है। इसे आचार्य 'युक्तरस'
कहते हैं ॥ ४६ ॥
शतावर्याः श्वदंष्ट्रायाः श्रीपर्णीफलानां च क्षुण्णानां चतुर्गुणितजलेन पाक
आप्रकृत्यवस्थानात् तस्य पुष्यारम्भेण प्रातः प्राशनं मेध्यं वृष्यमायुष्यं युक्तरस-
मित्याचार्याः प्रचक्षते ॥ ४७ ॥
शतावरी, गोखरू और श्रीपर्णी—शतावरी, पहाड़ी गोखरू और श्रीपर्णी (कसेरू) के