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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 214

१८८ वात्स्यायन-कामसूत्र
एवं धर्मकामावप्यनयैव युक्त्योदाहरेत्। सङ्कीरेच्च परस्परेण व्यतिषञ्-
येच्चेत्युभयतोयोगाः॥ ४३॥
अवशिष्टों के शुद्ध, सङ्कीर्ण और संश्लिष्ट—जिस युक्ति से अर्थ के शुद्ध उभयतो योग
बताये गये हैं उसी युक्ति से धर्म और काम के भी शुद्ध उभयतो योग बना लें, अर्थ के समान ही
इनके सङ्कीर्ण उभयतो योग भी बना लें, और फिर उनके विरोधी भाव हटाकर उन्हें परस्पर
संश्लिष्ट भी कर दें॥ ४३॥
सम्भूय च विटाः परिगृह्णन्त्येकामसौ गोष्ठीपरिग्रहः॥ ४४॥
गोष्ठीपरिग्रह—बहुत से विट (रसलम्पट) मिलकर एक वेश्या के साथ रतिक्रीड़ा करें
तो उसे ‘गोष्ठीपरिग्रह’ कहते हैं॥ ४४॥
सा तेषामितस्ततः संसृज्यमाना प्रत्येकं सङ्घर्षार्थं निर्वर्तयेत्॥ ४५॥
समन्ततो योग में वेश्या का कर्तव्य—गोष्ठीपरिग्रह वाली वेश्या को चाहिये कि इधर
उधर मिलती हुई, नायकों से स्पर्धा कराकर उनसे धन प्राप्त कर ले॥ ४५॥
सुवसन्तकादिषु च योगे यो मे इमममुं च सम्पादयिष्यति तस्याद्य गमिष्यति मे
दुहितेति मात्रा वाचयेत्॥ ४६॥
स्पर्धा का कारण—वेश्या की माँ उसके नायकों से यह कहलवा दे कि सुवसन्तक
आदि उत्सव पर यह उसी के साथ प्रथम समागम करेगी, जो इन इन वस्तुओं को लाकर उसे
देगा॥ ४६॥
तेषां च सङ्घर्षजेऽभिगमने कार्याणि लक्षयेत्॥ ४७॥
उस समय जब नायक वेश्या से मिलने के लिये स्पर्धा करने लगे तो अपने लक्ष्य (लाभ)
पर ही ध्यान रखे॥ ४७॥
एकतोऽर्थः सर्वतोऽर्थः, एकतोऽनर्थः सर्वतोऽनर्थः, अर्धतोऽर्थः सर्वतोऽर्थः,
अर्धतोऽनर्थः सर्वतोऽनर्थः—इति समन्ततो योगाः॥ ४८॥
लाभनिर्देश—एक से अर्थ सबसे अर्थ, एक से अनर्थ सबसे अनर्थ, आधों से अर्थ सबसे
अर्थ, आधों से अनर्थ सबसे अनर्थ—ये समन्ततो योग हैं॥ ४८॥
अर्थसंशयमनर्थसंशयं च पूर्ववद्योजयेत्। सङ्कीरेच्च तथा धर्मकामावपि।
इत्यर्थानर्थानुबन्धसंशयविचाराः॥ ४९॥
पूर्ववत् अर्थसंशय और अनर्थसंशय की योजना कर लेनी चाहिये, साथ ही संकीर्ण को भी
समझ लेना चाहिये। इसी प्रकार धर्म और काम के समन्ततो योग भी समझ लेने चाहिये। इस
प्रकार अनुबन्ध, अर्थ, अनर्थ और संशयों के विचार पूर्ण हुए॥ ४९॥
कुम्भदासी परिचारिका कुलटा स्वैरिणी नटी शिल्पकारिका प्रकाशविनष्टा
रूपाजीवा गणिका चेति वेश्याविशेषाः॥ ५०॥
कुम्भदासी, परिचारिका, कुलटा, स्वैरिणी, नटी, शिल्पकारिका, प्रकाशविनष्टा, रूपाजीवा
और गणिका—ये वेश्या के भेद हैं॥ ५०॥