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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 248 में से

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पृष्ठ 204

१७८ वात्स्यायन-कामसूत्र
लोग जिसे अभीष्ट समझें अथवा जिस नायक को अधिक गुणी, सुन्दर और प्रभावशाली समझें,
उसी की दी हुई वस्तु ग्रहण करे ॥ ८ ॥
रागित्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ ९ ॥
रागी से त्यागी की श्रेष्ठता—अनुरक्त नायक की अपेक्षा दानशील त्यागी से अधिक लाभ
प्रत्यक्ष ही है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ ९ ॥
शक्यो हि रागिणि त्याग आधातुम् ॥ १० ॥
उपायों द्वारा रागी की त्यागशीलता भी सम्भव—अनुरक्त नायक को उपायों द्वारा
त्यागशील बनाया जा सकता है ॥ १० ॥
लुब्धोऽपि हि रक्तस्त्यजति न तु त्यागी निर्बन्धाद्रज्यत इति वात्स्यायनः ॥ ११ ॥
अनुरक्त होने पर तो लोभी पुरुष भी धन दे सकता है, किन्तु त्यागशील को उपायों द्वारा
अनुरक्त नहीं किया जा सकता—यह आचार्य वात्स्यायन का मत है ॥ ११ ॥
तत्रापि धनवदधनवतोर्धनवति विशेषः । त्यागप्रयोजनकर्त्रोः प्रयोजनकर्तरि
विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ १२ ॥
निर्धन से धनवान् और त्यागशील से कार्यसाधक श्रेष्ठ—इसमें भी निर्धन की अपेक्षा
धनवान् श्रेष्ठ है और त्यागशील की अपेक्षा वेश्या का स्वार्थसाधक श्रेष्ठ है—ऐसा कामशास्त्र के
पूर्व आचार्यों का मत है ॥ १२ ॥
प्रयोजनकर्ता सकृत्कृत्वा कृतिनमात्मानं मन्यते त्यागी पुनरतीतं नापेक्षत इति
वात्स्यायनः ॥ १३ ॥
वेश्या का कार्य सिद्ध करने वाला तो एक बार कार्य सिद्ध करके अपने को कृती मान लेता
है, किन्तु त्यागशील तो अतीत में दिये गये धन के विषय में सोचता ही नहीं है—ऐसा आचार्य
वात्स्यायन का मत है ॥ १३ ॥
तत्राप्यात्ययिकतो विशेषः ॥ १४ ॥
आवश्यकतानुसार विशिष्ट—आवश्यकतानुसार इन दोनों में भी विशेषता होती
है ॥ १४ ॥
कृतज्ञत्यागिनोस्त्यागिनि विशेषः प्रत्यक्ष इत्याचार्याः ॥ १५ ॥
कृतज्ञ और त्यागी—कृतज्ञ और त्यागी—दोनों में त्यागी से विशेष लाभ प्राप्त किया जा
सकता है—ऐसा कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १५ ॥
चिरमाराधितोऽपि त्यागी व्यलीकमेकमुपलभ्य प्रतिगणिकया वा
मिथ्यादूषितः श्रममतीतं नापेक्षते ॥ १६ ॥
त्यागी की न्यूनता—बहुत समय तक उपायों द्वारा सिद्ध किया गया त्यागी, वेश्या के एक
ही अपराध को देखकर अथवा प्रतिगणिका (स्पर्धी वेश्या) द्वारा बहकाये जाने पर वेश्या द्वारा
उठाये गये कष्टों को नहीं देखता ॥ १६ ॥
प्रायेण हि तेजस्विन ऋजवोजनादृताश्च त्यागिनो भवन्ति ॥ १७ ॥