सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

पृष्ठ 207, कुल 248 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 207

६. वैशिक अधिकरण १८१
गम्यमन्यतो निवारयितुकामा सक्तमन्यस्यामपहर्तुकामा वा अन्यां वा लाभतो
वियुयुक्षमाणागम्यसंसर्गादात्मनः स्थानं वृद्धिमायतिमभिगम्यतां च मन्यमाना
अनर्थप्रकारे वा साहाय्यमेनं कारयितुकामा सक्तस्य वान्यस्य व्यलीकार्थिनी
पूर्वोपकारमकृतमिव पश्यन्ती केवलप्रीत्यर्थिनी वा कल्याणबुद्धेरल्पमपि लाभं
प्रतिगृह्णीयात्॥ ३३॥
अल्प लाभ के स्थान—यदि वेश्या अपने नायक को किसी अन्य वेश्या के पास जाने से
रोकना चाहे, अन्य नायिका के धनवान् नायक को आकृष्ट करना चाहे, अन्य नायिका को
आर्थिक हानि पहुँचाना चाहे, नायक के साथ संसर्ग से उचित स्थान, वृद्धि, उज्ज्वल भविष्य और
नायकों की इच्छा की वस्तु बनवाना चाहे, अनर्थों के निवारण में उसकी सहायता की इच्छा रखे
अथवा पहले किये गये उपकारों को भूलकर निर्धन नायक को निकलवाना चाहे और किसी
शुभचिन्तक प्रेमी को अपना बनाना चाहे तो वेश्या अल्प लाभ भी ले सकती है॥ ३३॥
आयत्यर्थिनी तु तमाश्रित्य चानर्थं प्रतिचिकीर्षन्ती नैव प्रतिगृह्णीयात्॥ ३४॥
लाभ न लेने के स्थान—भविष्य में प्रभाव चाहने वाली वेश्या, जिसके बल पर अनर्थों
को रोकना चाहे, उससे कुछ न ले॥ ३४॥
त्यक्ष्याम्येनमन्यतः प्रतिसन्धास्यामि, गमिष्यति दारैर्योक्ष्यते नाशयिष्यत्य-
नर्थान्, अङ्कुशभूत उत्तराध्यक्षोऽस्यागमिष्यति स्वामी पिता वा, स्थानभ्रंशो वास्य
भविष्यति चलचित्तश्चेति मन्यमाना तदात्वे तस्माल्लाभमिच्छेत्॥ ३५॥
तत्काल लाभ के स्थान—इस नायक को छोड़कर अन्य से सम्बन्ध बनाऊँगी, यह
स्वयं चला जायेगा, अपनी स्त्रियों से मिल जायेगा, यह अनर्थों को नष्ट कर देगा, इसके ऊपर
स्वामी या पिता का अंकुश विद्यमान है अथवा इसका पद या अधिकार भ्रष्ट हो जायेगा, यह
चञ्चल चित्त का व्यक्ति है—यदि वेश्या ऐसा समझे तो तत्काल जो लाभ मिल सकता हो, प्राप्त
कर ले॥ ३५॥
प्रतिज्ञातमीश्वरेण प्रतिग्रहं लप्स्यते अधिकरणं स्थानं वा प्राप्स्यति वृत्ति-
कालोऽस्य वा आसन्नः वाहनमस्यागमिष्यति स्थलपत्रं वा सस्यमस्य पक्ष्यते कृतम-
स्मिन्न नश्यति नित्यमविसंवादको वेत्यायत्यामिच्छेत्। परिग्रहकल्पं वाचरेत्॥ ३६॥
भविष्य में लाभ के स्थान— राज्य या शासन से इसे धन की प्राप्ति निश्चित रूप से होगी,
इसको महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त होगा या इसे किसी प्राधिकरण का प्रमुख बनाया जायेगा, इसकी
जीविकाप्राप्ति का समय निकट ही है, इसका वाहन व्यापारिक वस्तुएँ बेचकर शीघ्र ही आने
वाला है, इसकी भूमि उर्वर है, इसकी फसल पक रही है, यह कृतज्ञ है, इसलिये इसके साथ
संसर्ग हानिकारक नहीं है, यह कभी झूठ नहीं बोलता, इसलिये कहकर अवश्य देगा—यदि
ऐसी स्थिति हो तो भविष्य में लाभ की इच्छा रखे और पत्नी के समान उसकी सेवा करे॥ ३६॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
कृच्छाधिगतवित्तांश्च राजवल्लभनिष्ठुरान्।
आयत्यां च तदात्वे च दूरादेव विवर्जयेत्॥ ३७॥