वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० वात्स्यायन-कामसूत्र
यदि पूर्वोक्त विधियों (तन्त्र१ और आवाप२) से अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति न हो सके तो इस
औपनिषदिक३ अधिकरण में बताये गये उपायों को प्रयोग में लाना चाहिये ॥ २ ॥
रूपं गुणो वयस्त्याग इति सुभगङ्करणम् ॥ ३ ॥
सुभगङ्करण (सौन्दर्यवर्धक) योग—रूप, गुण, अवस्था और उदारता—ये चार बातें
मनुष्य को सौभाग्यशाली बनाती हैं ॥ ३ ॥
तगरकुष्ठतालीसपत्रकानुलेपनं सुभगङ्करणम् ॥ ४ ॥
सौन्दर्यवर्धक योग—तगर, कूट और तालीशपत्र का लेप करना सौन्दर्य बढ़ाता है ॥ ४ ॥
एतैरेव सुपिष्टैर्वर्तिमालिम्याक्षतैलेन नरकपाले साधितमञ्जनं च ॥ ५ ॥
सुभगङ्करण काजल—उपर्युक्त वस्तुओं को पीसकर और रूई को बत्ती में लपेटकर
बहेड़े के तैल में जलाकर नरकपाल में अंजन बना ले ॥ ५ ॥
पुनर्नवासहदेवीसारिवाकुरण्टोत्पलपत्रैश्च सिद्धं तैलमभ्यञ्जनम् ॥ ६ ॥
सुभगङ्करण तैल—पुनर्नवा, सहदेवी, अनन्तमूल, कुरण्ट (पियाबाँसा) और उत्पल
(नीलकमल)—इन सबका तैल बनाकर लगाने से सौभाग्य-सौन्दर्य बढ़ता है ॥ ६ ॥
तद्युक्ता एव स्त्रजश्च ॥ ७ ॥
सुभगङ्कर माला—पुनर्नवा आदि वस्तुओं को माला में लगाकर पहने ॥ ७ ॥
पद्मोत्पलनागकेसराणां शोषितानां चूर्णं मधुघृताभ्यामवलिह्य सुभगो
भवति ॥ ८ ॥
सुभगङ्कर चटनी—पद्म (लाल कमल), उत्पल (नील कमल) और नागकेसर के चूर्ण
को शहद और घी के साथ मिलाकर चाटने से भी सौन्दर्य (सौभाग्य) बढ़ता है ॥ ८ ॥
तान्येव तगरतालीसतमालपत्रयुक्तान्यनुलिप्य ॥ ९ ॥
सुभगङ्कर लेप—इन वस्तुओं में तगर, तालीशपत्र और तमालपत्र मिलाकर सुभगङ्कर
लेप भी तैयार होता है ॥ ९ ॥
मयूरस्याक्षि तरक्षोर्वा सुवर्णेनावलिप्य दक्षिणहस्तेन धारयेदिति सुभग-
ङ्करणम् ॥ १० ॥
सुभगङ्कर यंत्रधारण—मोर और चीते की आँखें सोने के ताबीज में भरकर दाहिने हाथ
में बाँधें—ये सुभग बनाने के उपाय हैं ॥ १० ॥
तथा बादरमणिं शङ्खमणिं च तथैव तेषु चाथर्वणान्योगान् गमयेत् ॥ ११ ॥
इसी प्रकार बादरमणि और शङ्खमणि भी हैं। अथर्ववेद में लिखे ऐसे प्रयोगों को समझ
लेना चाहिये ॥ ११ ॥
विद्यात्तन्त्राच्च विद्यायोगात् प्राप्तयौवनां परिचारिकां स्वामी संवत्सर-
१. पूर्वोक्त रत्युत्पादक आलिङ्गन, चुम्बन आदि तन्त्र कहलाते हैं।
२. पूर्वोक्त स्त्री आदि की प्राप्ति आवाप कही जाती है।
३. गूढ या गोपनीय सिद्धान्त औपनिषदिक कहलाते हैं।