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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 217

७. औपनिषदिक अधिकरण १९१
मात्रमन्यतो वारयेत्। ततो वारितां बालां वामत्वाल्लालसीभूतेषु गम्येषु योऽस्यै
संघर्षेण बहु दद्यात्तस्मै विसृजेदिति सौभाग्यवर्धनम्॥ १२॥
विद्यातन्त्र और विद्यायोग से यौवनावस्था को प्राप्त परिचारिका को स्वामी एक वर्ष तक
समागम से रक्षित रखे। इस प्रकार रक्षित परिचारिका को दूसरे पुरुष बाला मानकर समागम और
विवाह की इच्छा प्रकट करेंगे। इस प्रकार लालसा की स्पर्धा में जो अधिक धन दे, उसी को
परिचारिका सौंप दे, यह परिचारिका के सौभाग्यवर्धन की विधि है॥ १२॥
गणिका प्राप्तयौवनां स्वां दुहितरं तस्या विज्ञानशीलरूपानुरूप्येण तान-
भिनिमन्त्र्य सारेण योऽस्या इदमिदं च दद्यात् स पाणिं गृह्णीयादिति सम्भाष्य
रक्षयेदिति॥ १३॥
वेश्यापुत्री के विवाह की विधि—गणिका अपनी युवा पुत्री को समान शील, रूप, गुण
और यौवनसम्पन्न युवकों को आमन्त्रित कर उनकी गोष्ठी में यह घोषणा करे कि जो मेरी पुत्री
को ये ये वस्तुएँ देगा उसी के साथ उसका विवाह कर दिया जायेगा—इस प्रकार अपनी पुत्री का
विवाह कर उसके चरित्र की रक्षा करें॥ १३॥
सा च मातुरविदिता नाम नागरिकपुत्रैर्धनिभिरत्यर्थं प्रीयेत॥ १४॥
वेश्यापुत्री का कर्तव्य—और उस वेश्यापुत्री को चाहिये कि वह उन धनी नागरिक पुत्रों
के साथ इस प्रकार प्रेम प्रदर्शित करे मानो माँ को कुछ पता ही नहीं है॥ १४॥
तेषां कलाग्रहणे गन्धर्वशालायां भिक्षुकीभवने तत्र तत्र च सन्दर्शन-
योगाः॥ १५॥
रसिकों का दर्शन—जब वे युवक कलाज्ञान के लिये अपने घर आयें तो लड़की उनसे
मिले और तत्पश्चात् गन्धर्वशाला, भिक्षुकी के घर, सरस्वतीभवन, उद्यान आदि में मिलती
रहे॥ १५॥
तेषां यथोक्तदायिनां माता पाणिं ग्राहयेत्॥ १६॥
पाणिग्रहण—जो युवक कही हुई वस्तु लाकर दे दे, उसके साथ वेश्या अपनी पुत्री का
पाणिग्रहण करा दे॥ १६॥
तावदर्थमलभमाना तु स्वेनाप्येकदेशेन दुहित्र एतद्दत्तमनेनेति
ख्यापयेत्॥ १७॥
विना धन मिले भी प्रदर्शन—जो जो वस्तुएँ उससे पहले नियत हुई हों, यदि वे सब न
भी मिलें तो वेश्या अपनी ओर से दिखाकर यह कह दे कि यह भी इस युवक ने मेरी पुत्री को
दिया है॥ १७॥
ऊढाया वा कन्याभावं विमोचयेत्॥ १८॥
अथवा कन्या के युवा हो जाने पर उपर्युक्त रीति से युवकों को फँसाकर उसका
कौमार्यभङ्ग करा दे॥ १८॥
प्रच्छन्नं वा तैः संयोज्य स्वयमजानती भूत्वा ततो विदितेष्वेतं धर्मस्थेषु
निवेदयेत्॥ १९॥