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वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 208

१८२ वात्स्यायन-कामसूत्र
अग्राह्य पुरुष—जिन्हें कठिनता से धन मिला हो, जो राजा को प्रसन्न करने के लिये क्रूर
कर्म करते हों, उनसे तत्काल या भविष्य में अधिक लाभ की सम्भावना भी हो तब भी उनसे दूर
ही रहना चाहिये ॥ ३७ ॥
अनर्थो वर्जने येषां गमनेऽभ्युदयस्तथा।
प्रयत्नेनापि तान् गृह्य सापदेशमुपक्रमेत् ॥ ३८ ॥
ग्राह्य पुरुष—जिनको ना करने पर अनर्थ की सम्भावना हो और मिलने पर अभ्युदय की
प्राप्ति निश्चित हो, ऐसे नायकों को प्रयत्नपूर्वक आकृष्ट करके समागम का अवसर देना
चाहिये ॥ ३८ ॥
प्रसन्ना ये प्रयच्छन्ति स्वल्पेऽप्यगणितं वसु।
स्थूललक्ष्यान्महोत्साहाँस्तान् गच्छेत् स्वैरपि व्ययैः ॥ ३९ ॥
अर्थप्रयोजन के पूरक नायक—जो अल्प प्रसन्नता पर भी असीमित धन दे देते हैं, ऐसे
स्थूल लक्ष्य वाले पुरुषों को अपना धन खर्च करके भी मिलाना चाहिये ॥ ३९ ॥
लाभविशेषप्रकरण नामक पञ्चम अध्याय पूर्ण हुआ ॥
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षष्ठ अध्याय
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण
अर्थानाचर्यमाणानर्था अप्यनूद्भवन्त्यनुबन्धाः संशयाश्च ॥ १ ॥
अर्थोपार्जन के लिये प्रयास करती हुई वेश्या के समक्ष अनेक प्रकार के अनर्थ, अनुबन्ध
और संशय उत्पन्न हो जाते हैं ॥ १ ॥
ते बुद्धिदौर्बल्यादतिरागादत्यभिमानादतिदम्भादत्यार्जवादतिविश्वासादति-
क्रोधात् प्रमादात् साहसाद्दैवयोगाच्च स्युः ॥ २ ॥
अनर्थत्रिवर्ग की उत्पत्ति के कारण—अनर्थ, उनके अनुबन्ध और संशय इन कारणों
से उत्पन्न होते हैं—बुद्धि की दुर्बलता से, अधिक प्रेम से, अतिशय अभिमान से, अत्यधिक
सरलता से, अत्यन्त विश्वास करने से, अतिक्रोध से, प्रमाद (असावधानी) से, अविवेकपूर्ण कार्य
करने से और दैवयोग से ॥ २ ॥
तेषां फलम्—कृतस्य व्ययस्य निष्फलत्वमनायतिरागमिष्यतोऽर्थस्य निवर्तन-
प्राप्तस्य निष्क्रमणं पारुष्यस्य प्राप्तिर्गर्भ्यता शरीरस्य प्रघातः केशानां छेदनं
पातनमङ्गवैकल्यापत्तिः ॥ ३ ॥
दुष्परिणाम—इनके ये दुष्परिणाम हैं—किये गये खर्च का निष्फल हो जाना, प्रभाव और
अनुराग का मिट जाना, हाथ आते धन का न मिलना और प्राप्त धन का हाथ से निकल जाना,