वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८६ वात्स्यायन-कामसूत्र
श्रोत्रियस्य ब्रह्मचारिणो दीक्षितस्य व्रतिनो लिङ्गिनो वा मां दृष्ट्वा जातरागस्य
मुमूर्षोर्मित्रवाक्यादानृशंस्याच्च गमनं धर्मोऽधर्म इति संशयः ॥ २९ ॥
धर्म और अधर्म की संकीर्णता—अपने को देखकर अनुरक्त हुए वेदपाठी ब्राह्मण,
ब्रह्मचारी, दीक्षित, व्रती, साधु या मरने की इच्छा रखने वाले पुरुष के साथ मित्र के कथन पर
अथवा अपनी दयालुता के कारण वेश्या का समागम करना धर्म होगा या अधर्म?—यह
धर्माधर्मसंशय कहलाता है ॥ २९ ॥
लोकादेवाकृतप्रत्ययादगुणो गुणवान् वेत्यनवेक्ष्य गमनं कामो द्वेष इति
संशयः ॥ ३० ॥
काम और द्वेष की सङ्कीर्णता—'यह गुणवान् है अथवा गुणहीन है' इस बात का स्वयं
विचार करके केवल लोकप्रवाद (संसार के कहने पर) से नायक के साथ समागम करने पर
काम होगा या द्वेष?—इस प्रकार का सन्देह काम और द्वेष की सङ्कीर्णता कहलाता है ॥ ३० ॥
सङ्किरेच्च परस्परेणेति सङ्कीर्णसंशयाः ॥ ३१ ॥
जो परस्पर मिलने से संशय हो, वे सङ्कीर्णसंशय हैं। इस प्रकार सङ्कीर्णसंशय पूर्ण
हुए ॥ ३१ ॥
यत्र परस्याभिगमनेऽर्थः सक्ताच्च सङ्घर्षतः स उभयतोऽर्थः ॥ ३२ ॥
उभयतः अर्थयोग—दूसरे नायक से अर्थ लेकर समागम करने से वेश्या पर आसक्त
नायक भी दूसरे नायक से सम्बन्ध-विच्छेद करने के लिये अर्थ देता है, तो दोनों ओर से अर्थ का
योग होने से यह 'उभयतो अर्थयोग' हुआ ॥ ३२ ॥
यत्र स्वेन व्ययेन निष्फलमभिगमनं सक्ताच्चामर्षिताद्वित्तप्रत्यादानं स उभ-
यतोऽनर्थः ॥ ३३ ॥
उभयतः अनर्थयोग—जहाँ नायिका अपना धन व्यय करके नायक के साथ समागम
करती है और निष्फल रहता है तथा दूसरी ओर अप्रसन्न अनुरक्त नायक से उसके द्वारा दिये गये
अर्थ के छिन जाने का भय हो तो इसे 'उभयतः अनर्थयोग' कहते हैं ॥ ३३ ॥
यत्राभिगमनेऽर्थो भविष्यति न वेत्याशङ्का सक्तोऽपि सङ्घर्षाद्दास्यति न वेति स
उभयतोऽर्थसंशयः ॥ ३४ ॥
उभयतः अर्थसंशय—जिस समागम में 'अर्थ प्राप्त होगा या नहीं'? यह शंका हो और
अनुरक्त नायक भी संघर्ष के कारण देगा या नहीं—यह संशय हो तो इसे 'उभयतः अर्थसंशय'
कहा जाता है ॥ ३४ ॥
यत्राभिगमने व्ययवति पूर्वो विरुद्धः क्रोधादपकारं करिष्यति न वेति सक्तो
वामर्षितो दत्तं प्रत्यादास्यति न वेति स उभयतोऽनर्थसंशयः। इत्यौद्दालकेरुभयतो
योगाः ॥ ३५ ॥
उभयतो अनर्थसंशय—अपने पास से व्यय करके अपूर्व नायक के साथ समागम करना
पड़े, इससे पूर्व नायक क्रोधवश अपकार कर देगा या नहीं?—यह संशय हो अथवा अनुरक्त
नायक भी अप्रसन्न होकर दिये गये धन को वापस न ले ले?—यह संशय हो। इस प्रकार दोनों