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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

७. औपनिषदिक अधिकरण १८९
सर्वासां चानुरूपेण गम्याः सहायास्तदुपराञ्जनमर्थागमोपाया निष्कासनं पुनः
सन्धानं लाभविशेषानुबन्धा अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचाराश्चेति वैशिकम् ॥ ५१ ॥
जितने प्रकार की वेश्याएँ बतायी गयी हैं, उतने ही प्रकार के उनके मिलने वाले भी होते
हैं। वेश्याएँ, उनके नायक, उनके सहायक, अनुरक्त करने के उपाय, अर्थप्राप्ति के उपाय, धनहीन
नायकों को निकालने की रीति, वियुक्त को मिलाने की रीति; लाभविशेष, अर्थ, अनर्थ, अनुबन्ध
और संशयों का विचार—यही इस अधिकरण के प्रमुख प्रतिपाद्य (विषय) हैं ॥ ५१ ॥
भवतश्चात्र श्लोकौ—
रत्यर्थाः पुरुषा येन रत्यर्थाश्चैव योषितः।
शास्त्रस्यार्थप्रधानत्वात्तेन योगोऽत्र योषिताम् ॥ ५२ ॥
इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
पुरुष और स्त्री, दोनों ही रतिसुख की कामना करते हैं, दोनों का प्रयोजन रतिसुख ही
होता है। क्योंकि रतिसुख का केन्द्र स्त्री है, इसलिये स्त्रियों के रति प्रयोजन पर यहाँ विस्तार से
विचार किया गया है ॥ ५२ ॥
सन्ति रागपरा नार्यः सन्ति चार्थपरा अपि।
प्राक्तत्र वर्णितो रागो वेश्यायोगाश्च वैशिके ॥ ५३ ॥
उपसंहार—कुछ स्त्रियाँ शुद्ध राग की ही कामना करती हैं और कुछ रति के साथ धन
की भी इच्छा करती हैं। रागिणी स्त्रियों का वर्णन तो पिछले अधिकरणों में कर दिया गया है और
जो रति (राग) के साथ धन की भी इच्छा करती हैं, उनका वर्णन इस अधिकरण में किया गया
है ॥ ५३ ॥
अर्थानर्थानुबन्धसंशयविचारप्रकरण
नामक षष्ठ अध्याय सम्पन्न ॥
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७.
औपनिषदिक नामक सप्तम अधिकरण
प्रथम अध्याय
सुभगङ्करणादिप्रकरण
व्याख्यातं च कामसूत्रम् ॥ १ ॥
स्वयं शास्त्रकार महर्षि वात्स्यायन इस प्रकरण का सम्बन्ध बताते हुए कहते हैं—कामसूत्र
की व्याख्या समाप्त हुई ॥ १ ॥
तत्रोक्तेस्तु विधिभिरभिप्रेतमर्थमनधिगच्छन्नौपनिषदिकमाचरेत् ॥ २ ॥