वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९४ वात्स्यायन-कामसूत्र
उष्ट्रास्थि भृङ्गराजरसेन भावितं दग्धमञ्जनं नलिकायां निहितमुष्ट्रास्थि-
शलाकयैव स्रोतोऽञ्जनसहितं पुण्यं चक्षुष्यं वशीकरणं चेत्याचक्षते ॥ ३४ ॥
पुण्य अंजन—ऊँट की हड्डियों में भृङ्गराज के रस की भावना देकर अंजन के समान
पुटपाक विधि से जलाकर काजल बना ले। इसे ऊँट की हड्डियों से बनी सुरमादानी में रखे और
ऊँट की हड्डी से बनी सलाई से आँखों में लगावे। यह नेत्रों के लिये हितकारी और उत्तम
वशीकरण है—ऐसा कहा जाता है ॥ ३४ ॥
एतेन श्येनभासमयूरास्थिमयान्यञ्जनानि व्याख्यातानि ॥ ३५ ॥
इसी प्रकार श्येन, भास, मयूर आदि पक्षियों की हड्डियों का अंजन भी उपर्युक्त विधि से
बनाया जा सकता है ॥ ३५ ॥
उच्चटाकन्दश्चव्या यष्टीमधुकं च सशर्करेण पयसा पीत्वा वृषीभवति ॥ ३६ ॥
बल-वीर्यवर्धक (वृष्य) प्रकरण : उच्चटा और मुलहठी—उच्चटा (उटंगण) और
मुलहठी के चूर्ण को शक्कर मिले दूध के साथ पीने से पुरुष के बलवीर्य में वृद्धि होती है ॥ ३६ ॥
मेषवस्तमुष्कसिद्धस्य पयसः सशर्करस्य पानं वृषत्वयोगः ॥ ३७ ॥
मेढ़ा और बकरे का अण्डकोश—मेढ़ा या बकरे के अण्डकोशों को दूध में पकाकर
और शक्कर डालकर पीने से भी बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३७ ॥
तथा विदार्याः क्षीरिकायाः स्वयंगुप्तायाश्च क्षीरेण पानम् ॥ ३८ ॥
विदारीकन्द, वंशलोचन और क्रौंच—विदारीकन्द, वंशलोचन और क्रौंच के बीजों के
चूर्ण को दूध के साथ पीने से बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३८ ॥
तथा प्रियालबीजानां मोरटाविदार्योश्च क्षीरेणैव ॥ ३९ ॥
चिरौंजी, मुहार और श्वेत विदारी—इसी प्रकार चिरौंजी, मुहार (मुरहरी) और श्वेत
विदारी—इनका चूर्ण दूध के साथ पीने से बलवीर्य की वृद्धि होती है ॥ ३९ ॥
शृङ्गाटककसेरुकामधूलिकानि क्षीरकाकोल्या सह पिष्टानि सशर्करेण पयसा
घृतेन मन्दाग्निनोत्करिकां पक्त्वा यावदर्थं भक्षितवानन्ताः स्त्रियो गच्छतीत्याचार्याः
प्रचक्षते ॥ ४० ॥
क्षीरकाकोली, सिंघाड़ा, कसेरू और महुआ—सिंघाड़ा, कसेरू और महुआ के फूलों
को क्षीरकाकोली के कन्द के साथ पीसकर शक्करमिश्रित दूध के साथ मिलाकर, घी में मन्द
मन्द अग्नि पर हलुआ बनाकर नित्य खाने से इतना बलवीर्य बढ़ता है कि पुरुष अनन्त रमणियों
के साथ रमण कर सकता है—ऐसा आचार्य कहते हैं ॥ ४० ॥
माषकमलिनीं पयसा धौतामुष्णेन घृतेन मृदुकृत्योद्धृतां वृद्धवत्सायाः गोः
पयःसिद्धं पायसं मधुसर्पिर्भ्यामशित्वाऽनन्ताः स्त्रियो गच्छतीति आचार्याः
प्रचक्षते ॥ ४१ ॥
उड़द की दाल की खीर—उड़द की धुली दाल को रात में दूध में भिगो दे और प्रातः
पीसकर घी में लाल होने तक भूने। फिर बाखरी गाय या बकरी का दूध डालकर खीर बना लें।
विषम मात्रा में घी और शहद डालकर खाने से पुरुष में अनन्त स्त्रियों के साथ सम्भोग करने की
शक्ति आ जाती है—ऐसा आचार्य कहते हैं ॥ ४१ ॥