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सर्वकोश
वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)

Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma

महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा

DevanagariHindipublished248 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

६. वैशिक अधिकरण १८५
परस्परेण च युक्त्या सङ्किरेदित्यनुबन्धाः ॥ २० ॥
इनको परस्पर युक्तिपूर्वक मिलाये । इस प्रकार अनुबन्ध पूर्ण हुए ॥ २० ॥
परितोषितोऽपि दास्यति न वेत्यर्थसंशयः ॥ २१ ॥
शुद्धसंशय : अर्थसंशय—सन्तुष्ट होने पर भी देगा या नहीं ? यह अर्थसंशय है ॥ २१ ॥
निष्पीडितार्थमफलमुत्सृजन्त्या अर्थमलभमानाया धर्मः स्यान्न वेति धर्म-
संशयः ॥ २२ ॥
धर्मसंशय—जिसका समस्त धन निचोड़ लिया हो और उससे कुछ धन का मिल पाने
के कारण उसे छोड़ने को उद्यत हो, अर्थ न मिल पाने पर उसे छोड़ना वेश्या के लिये धर्म होगा
या नहीं ?—इस प्रकार का संशय धर्मसंशय है ॥ २२ ॥
अभिप्रेतमुपलभ्य परिचारकमन्यं वा क्षुद्रं गत्वा कामः स्यान्न वेति काम-
संशयः ॥ २३ ॥
कामसंशय—अभीष्ट नायक को पाकर भी किसी अन्य आत्मीय सेवक या क्षुद्रव्यक्ति के
निकट जाकर 'इसके साथ समागम करने पर काम होगा या नहीं' ? इस प्रकार का सन्देह करना
कामसंशय कहलाता है ॥ २३ ॥
प्रभाववान् क्षुद्रोऽनभिगतोऽनर्थं करिष्यति न वेत्यनर्थसंशयः ॥ २४ ॥
अनर्थसंशय—प्रभावशाली नीच पुरुष समागम का अवसर न मिलने पर अनर्थ करेगा या
नहीं ?—यह अनर्थसंशय है ॥ २४ ॥
अत्यन्तनिष्फलः सक्तः परित्यक्तः पितृलोकं यायात्तत्राधर्मः स्यान्न वेत्यधर्म-
संशयः ॥ २५ ॥
अधर्मसंशय—समागम के लिये उत्सुक निर्धन नायक को प्रयोजनहीन मानकर छोड़
दिया गया हो और फिर यह सोचा जाये कि यदि यह मर जाये तो अधर्म होगा या नहीं ?—ऐसा
सन्देह अधर्मसंशय कहलाता है ॥ २५ ॥
रागस्यापि विवक्षायामभिप्रेतमनुपलभ्य विरागः स्यान्न वेति द्वेषसंशयः । इति
शुद्धसंशयाः ॥ २६ ॥
द्वेषसंशय—कामव्यथा से पीड़ित वेश्या अभीष्ट नायक को न पाकर जब कामव्यथा के
शमन के लिये छटपटाती है, उस समय उसे बिना मिले विराग होगा या नहीं, यह सन्देह
द्वेषसंशय कहलाता है। इस प्रकार शुद्ध संशयवर्णन पूर्ण हुआ । ॥ २६ ॥
अथ सङ्कीर्णाः ॥ २७ ॥
सङ्कीर्णसंशय—अब सङ्कीर्णसंशयों को कहते हैं ॥ २७ ॥
आगन्तोरविदितशीलस्य वल्लभसंश्रयस्य प्रभविष्णोर्वा समुपस्थितस्यारा-
धनमर्थोऽनर्थ इति संशयः ॥ २८ ॥
अर्थ और अनर्थ की संकीर्णता—आश्रित या प्रभावशाली नायक की उपस्थिति में यदि
अपरिचित पुरुष समागम के लिये आ जाये तो उसका आराधन अर्थकर है या अनर्थकर ?—यह
सन्देह होना—यह अर्थ और अनर्थ का संशय है ॥ २८ ॥