वात्स्यायन कामसूत्र (सान्वय सम्पूर्ण हिन्दी अनुवाद एवं सविस्तार व्याख्या - पं. रामानन्द शर्मा)
Vatsyayana Kamasutra with Complete Hindi Commentary by Ramanand Sharma
महर्षि वात्स्यायन (टीकाकार: पं. रामानन्द शर्मा) द्वारा
१२० वात्स्यायन-कामसूत्र
अनुकूलवृत्ति से प्रसादन—वनविहार (पिकनिक), भोगविलास, वस्त्राभूषणदान, भाई
'भतीजों का स्वागत-सत्कार और ऐकान्तिक प्रेमक्रीड़ा—इनके द्वारा एक एक का स्वतन्त्र
अनुरञ्जन करे ॥ ७१ ॥
युवतिश्च जितक्रोधा यथाशास्त्रप्रवर्तिनी ।
करोति वश्यं भर्तारं सपत्नीश्चाधितिष्ठति ॥ ७२ ॥
अधिकरण के अनुष्ठान का फल—जो युवती अपने क्रोध को नियन्त्रित करके शास्त्र
के अनुसार आचरण करती है, वह अपने पति को वशीभूत करके सभी सपत्नियों में श्रेष्ठ पद प्राप्त
कर लेती है ॥ ७२ ॥
ज्येष्ठादिवृत्तप्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
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५.
पारदारिक नामक पञ्चम अधिकरण
प्रथम अध्याय
स्त्रीपुरुषशीलावस्थापनप्रकरण
व्याख्यातकारणाः परपरिग्रहोपगमाः ॥ १ ॥
प्रकरणशुद्धि का स्मरण—परकीया के साथ सम्बन्ध स्थापित करने के कारण पहले ही
(नायिकाविमर्श में) दिये जा चुके हैं ॥ १ ॥
तेषु साध्यत्वमनत्ययं गम्यत्वमायतिं वृत्तिं चादित एव परीक्षेत ॥ २ ॥
परकीयागमन से पूर्व विचारणीय बातें—परकीया से सम्बन्ध स्थापित करने से पहले
इन बातों का भलीप्रकार विचार कर लेना चाहिये—अभीष्ट स्त्री मुझे प्राप्त हो सकेगी या नहीं ?
उसे प्राप्त करने में प्राणों का सङ्कट तो उपस्थित नहीं हो जायेगा ? वह गमन के योग्य है या नहीं ?
उससे सम्बन्ध स्थापित हो जाने के पश्चात् मेरा प्रभाव कैसा होगा ? मुझे सम्बन्ध रखने से क्या
लाभ होगा ? ॥ २ ॥
यदा तु स्थानात्स्थानान्तरं कामं प्रतिपद्यमानं पश्येत्तदात्मशरीरोपघातत्राणार्थं
परपरिग्रहानभ्युपगच्छेत् ॥ ३ ॥
प्रमुखतम कारण—जब एक अवस्था से दूसरी अवस्था में बढ़ते हुए काम को देखे,
और यह समझ ले कि इस स्त्री के विना मैं रह नहीं सकता, तो प्राणरक्षा के लिये परकीया के
साथ भी गमन करे ॥ ३ ॥
दश तु कामस्य स्थानानि ॥ ४ ॥
दश कामदशाएँ—व्यवहार के लिये काम की दश दशाएँ हैं ॥ ४ ॥
५. पारदारिक अधिकरण १२१
चक्षुःप्रीतिर्मनःसङ्गः सङ्कल्पोत्पत्तिर्निद्राच्छेदस्तनुता विषयेभ्यो व्यावृति-
र्लज्जाप्रणाश उन्मादो मूर्च्छा मरणमिति तेषां लिङ्गानि ॥ ५ ॥
कामदशाओं का क्रमशः वर्णन—नेत्रों में प्रेम का छलक उठना, चित्त का आसक्त
होना, प्राप्ति का संकल्प उत्पन्न होना, नींद का उड़ जाना, दुर्बल होते जाना, चित्त का विषयों से
हट जाना, लज्जा का नष्ट हो जाना, उन्माद, मूर्च्छा आना और मृत्यु—ये कामदशाओं के
परिचायक हैं ॥ ५ ॥
तत्राकृतितो लक्षणतश्च युवत्याः शीलं सत्यं शौचं साध्यतां चण्डवेगतां च
लक्षयेदित्याचार्याः ॥ ६ ॥
शीलादि की परीक्षा—कामशास्त्र के आचार्यों का मत है कि परकीया से सम्बन्ध
स्थापित करने से पूर्व उसकी आकृति और लक्षणों से युवती के शील, सत्य, शौच, साध्यता और
चण्डवेगता का भलीभाँति परीक्षण कर लेना चाहिये ॥ ६ ॥
व्यभिचारादाकृतिलक्षणयोगानामिङ्गिताकाराभ्यामेव प्रवृत्तिर्बोद्धव्या योषित
इति वात्स्यायनः ॥ ७ ॥
वात्स्यायन का अभिमत—स्त्री के शरीर और उसके विभिन्न अंगों पर जो चिह्नादि देखे
जाते हैं, उनसे स्त्री के शीलादि का पता नहीं चलता, अतएव सङ्केत और चेष्टाओं से ही उसकी
प्रवृत्ति समझनी चाहिये ॥ ७ ॥
यं कञ्चिदुज्ज्वलं पुरुषं दृष्ट्वा स्त्री कामयते। तथा पुरुषोऽपि योषितम्।
अपेक्षया तु न प्रवर्तते इति गोणिकापुत्रः ॥ ८ ॥
गोणिकापुत्र का मत—किसी भी उज्ज्वल वर्ण-वेश वाले पुरुष को देखकर स्त्रियाँ
अनुरक्त हो जाती हैं। इसी प्रकार पुरुष भी उज्ज्वल वर्ण-वेश वाली युवती को देखकर आसक्त
हो जाते हैं, किन्तु कारणवश परस्पर अनुरक्त होते हुए भी एक-दूसरे में प्रवृत्त नहीं हो पाते ॥ ८ ॥
तत्र स्त्रियं प्रति विशेषः ॥ ९ ॥
स्त्री में अनुराग का आधिक्य—यद्यपि स्त्री और पुरुष, दोनों में ही अन्य पर अनुरक्त
होने की भावना मिलती है, किन्तु स्त्रियों में परपुरुष पर आसक्ति अधिक देखी जाती है ॥ ९ ॥
न स्त्री धर्ममधर्मं चापेक्षते कामयत एव। कार्यापेक्षया तु नाभियुङ्क्ते ॥ १० ॥
स्त्री-स्वभाव की विशेषता—स्त्री धर्म-अधर्म की चिन्ता नहीं करती, वह केवल
कामना करती है, किन्तु मिलन में दोष देखकर वह फिर नहीं मिलती ॥ १० ॥
स्वभावाच्च पुरुषेणाभियुज्यमाना चिकीर्षयन्त्यपि व्यावर्तते ॥ ११ ॥
स्वतः हटने की प्रवृत्ति—पुरुष द्वारा मिलन का उपाय करने पर और स्वयं चाहने पर भी
वह स्वतः पीछे हट जाती है ॥ ११ ॥
पुनःपुनरभियुक्ता सिध्यति ॥ १२ ॥
बार-बार प्रयत्न से सिद्धि—पुरुष के बार-बार अभियोग करने पर ही वह उससे
सम्बन्ध स्थापित करती है ॥ १२ ॥
पुरुषस्तु धर्मस्थितिमार्यसमयं चापेक्ष्य कामयमानोऽपि व्यावर्तते ॥ १३ ॥
१२२ वात्स्यायन-कामसूत्र
पुरुष-स्वभाव—पुरुष धार्मिक मर्यादा और शिष्टाचार को देखकर परकीया की कामना
करता हुआ भी पीछे हट जाता है ॥ १३ ॥
तथाबुद्धिश्चाभियुज्यमानोऽपि न सिध्यति ॥ १४ ॥
विचारशील की प्राप्ति असम्भव—धार्मिक मर्यादा और शिष्टाचार का ध्यान रखने वाला
पुरुष परकीया द्वारा अभियोग करने पर भी प्राप्त नहीं हो पाता ॥ १४ ॥
निष्कारणमभियुङ्क्ते। अभियुज्यापि पुनर्नाभियुङ्क्ते। सिद्धायां च माध्यस्थ्यं
गच्छति ॥ १५ ॥
पुरुष-स्वभाव की विचित्रता—पुरुष कभी तो अकारण (बिना काम के) अभियोग
करने लगता है और कभी स्त्री के सिद्ध हो जाने पर भी उससे उदासीन हो जाता है ॥ १५ ॥
सुलभामवमन्यते। दुर्लभामाकाङ्क्षत इति प्रायोवादः ॥ १६ ॥
सुलभ की अवमानना और दुर्लभ की आकांक्षा—प्रायः देखा जाता है कि पुरुष
सहजता से प्राप्त हो जाने वाली स्त्री को महत्त्व नहीं देता और अभियोगों द्वारा कठिनता से मिलने
वाली स्त्री की आकांक्षा करता है ॥ १६ ॥
तत्र व्यावर्तनकारणानि ॥ १७ ॥
व्याववृत्तिकारण—जिन कारणों से स्त्री परपुरुष की कामना करती हुई भी स्वयं पीछे हट
जाती हैं, उन्हें कहते हैं ॥ १७ ॥
पत्यावनुरागः ॥ १८ ॥
पतिविषयक प्रेम—परपुरुष की कामना करती हुई स्त्री, पति के अनुराग का ध्यान कर
पीछे हट जाती है ॥ १८ ॥
अपत्यापेक्षा ॥ १९ ॥
सन्तति की अपेक्षा—बच्चों के प्रति वात्सल्य भी उसे परपुरुष से विरत कर देता
है ॥ १९ ॥
अतिक्रान्तवयस्त्वम् ॥ २० ॥
प्रौढ़ावस्था का ध्यान—यौवन बीत जाने पर वह स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २० ॥
दुःखाभिभवः ॥ २१ ॥
शोकाकुलता—शोकाकुल स्त्री भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २१ ॥
विरहानुपलम्भः ॥ २२ ॥
विरह की असमर्थता—पति के विरह को सहने में असमर्थ स्त्री भी स्वयं पीछे हट
जाती है ॥ २२ ॥
अवज्ञयोपमन्त्रयत इति क्रोधः ॥ २३ ॥
अवज्ञा की शंका—कहीं अनादर के लिये तो नहीं बुला रहा है, इस भय से भी स्वयं
पीछे हट जाती है ॥ २३ ॥
अप्रतर्क्य इति सङ्कल्पवर्जनम् ॥ २४ ॥
अवश्यता का अनुमान—यह पुरुष वश में नहीं आ सकेगा, ऐसा मानकर भी परपुरुष
का सङ्कल्प छोड़ देती है ॥ २४ ॥
५. पारदारिक अधिकरण १२३
गमिष्यतीत्यनायतिरन्यत्र प्रसक्तमतिरिति च ॥ २५ ॥
अनिश्चतता की सम्भावना—यह पुरुष किसी अन्य से प्रेम कर लेगा अथवा किसी
अन्य से भी प्रेम कर रहा है—यह सोचकर भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २५ ॥
असंवृत्ताकार इत्युद्वेगः ॥ २६ ॥
रहस्योद्घाटन का भय—यह पुरुष मेरा रहस्य प्रकट कर देगा—इस भय से भी स्वयं
पीछे हट जाती है ॥ २६ ॥
मित्रेषु निसृष्टभाव इति तेष्वपेक्षा ॥ २७ ॥
मित्रों का यथोक्तकारी—यह मित्रों से अपनी प्रत्येक बात बता देता है और उनके
परामर्श से ही कार्य करता है—यह जानकर भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २७ ॥
शुष्काभियोगीत्याशङ्का ॥ २८ ॥
निरर्थक उपायों की आशङ्का—यह मात्र केवल अभियोग करता है—इस आशङ्का से
भी स्वयं पीछे हट जाती है ॥ २८ ॥
तेजस्वीति साध्वसम् ॥ २९ ॥
तेजस्विता का भय—यह तेजस्वी (प्रभावशाली) व्यक्ति है—इस भय से भी स्वयं पीछे
हट जाती है ॥ २९ ॥
चण्डवेगः समर्थो वेति भयं मृग्याः ॥ ३० ॥
प्रचण्ड काम की शङ्का—मृगी (छोटी योनि वाली) स्त्री, पुरुष को चण्डवेग और अश्व
जाति का समझकर भी भयभीत हो उठती है ॥ ३० ॥
नागरकः कलासु विचक्षण इति व्रीडा ॥ ३१ ॥
कलानिष्णात्त से सङ्कोच—यह रसिक है, कलाओं में निष्णात है और मैं अविदग्ध
(ग्रामीण)—इस सङ्कोच से भी स्त्री परपुरुष से विमुख हो जाती है ॥ ३१ ॥
सखित्वेनोपचरित इति च ॥ ३२ ॥
पुरातन मैत्रीभाव—मैंने अब तक इसके साथ मैत्री सम्बन्ध निभाया है—यह भाव भी
स्त्री को परपुरुष में प्रवृत्त होने से रोकता है ॥ ३२ ॥
अदेशकालज्ञ इत्यसूया ॥ ३३ ॥
नायक की विवेकहीनता—यह देश और काल को नहीं समझता—इस घृणा से भी
अपनी इच्छा छोड़ देती है ॥ ३३ ॥
परिभवस्थानमित्यबहुमानः ॥ ३४ ॥
निन्द्य से बचना—यह निन्दा का पात्र है—ऐसा समझकर उसका अनादर कर
देती है ॥ ३४ ॥
आकारितोऽपि नावबुध्यत इत्यवज्ञा ॥ ३५ ॥
अविदग्ध से दूरी—यह पुरुष सङ्केत को नहीं समझता, अतः अविदग्ध (मूर्ख) है—यह
जानकर भी उसकी अवज्ञा कर देती है ॥ ३५ ॥
काम० १० शशो मन्दवेग इति च हस्तिन्याः ॥ ३६ ॥
१२४ वात्स्यायन-कामसूत्र
मन्दकाम की शङ्का—यह शश जाति का और मन्दवेग है, यह समझकर हस्तिनी जाति
की और चण्डवेग स्त्री पीछे हट जाती है॥ ३६॥
मत्तोऽस्य मा भूदनिष्टमित्यनुकम्पा॥ ३७॥
अनिष्ट की आशङ्का—मेरे कारण इसका कुछ अनिष्ट न हो जाये—इस अनुकम्पा से भी
स्त्री विरत हो जाती है॥ ३७॥
आत्मनि दोषदर्शनान्निर्वेदः॥ ३८॥
अपने दोषों पर दृष्टि—अपने में दोष देखकर भी स्त्री परपुरुष से विरक्त हो जाती
है॥ ३८॥
विदिता सती स्वजनबहिष्कृता भविष्यामीति भयम्॥ ३९॥
बहिष्कार का भय—अवैध सम्बन्धों का पता लग जाने पर परिवार द्वारा बहिष्कृत कर
दी जाऊँगी—इस भय से भी स्त्री परपुरुष में प्रवृत्त नहीं होती॥ ३९॥
पलित इत्यनादरः॥ ४०॥
परपुरुष की वृद्धता—परपुरुष को वृद्ध देखकर भी उसका अनादर कर देती है॥ ४०॥
पत्या प्रयुक्तः परीक्षत इति विमर्शः॥ ४१॥
पति द्वारा परीक्षा की शङ्का—कहीं इसे मेरे पति ने ही मेरी परीक्षा के लिये न भेजा
हो—यह सोचकर भी वह परपुरुष से विमुख हो जाती है॥ ४१॥
धर्मापेक्षा चेति॥ ४२॥
धर्म की मर्यादा का ध्यान—धर्म की मर्यादा को समझकर भी स्त्री कुमार्ग से निवृत्त हो
जाती है॥ ४२॥
तेषु यदात्मनि लक्षयेत् तदादित एव परिच्छिन्द्यात्॥ ४३॥
प्रतिकार के उपाय—इनमें से जिन कारणों को पुरुष (उपपति) अपने में देखे, उन्हें
पहले ही दूर कर दे॥ ४३॥
आर्यत्वयुक्तानि रागवर्धनात्॥ ४४॥
श्रेष्ठता को अनुराग से हटाये—श्रेष्ठता (आर्यत्व) से उत्पन्न कारणों को अनुराग
बढ़ाकर हटाये॥ ४४॥
अशक्तिजान्युपायप्रदर्शनात्॥ ४५॥
दोषदर्शन का उपाय—मिलन में जिन दोषों को देखकर स्त्री विमुख हो रही हो, उन
दोषों को दूर करने का उपाय पुरुष उसे बता दे॥ ४५॥
बहुमानकृतान्यतिपरिचयात्॥ ४६॥
बहुमानजन्य कारणों का उपाय—बहुमान से उत्पन्न कारणों को अतिपरिचय से दूर
कर दे॥ ४६॥
परिभवकृतान्यतिशौण्डीर्याद्, वैचक्षणयाच्च॥ ४७॥
परिभवजन्य कारणों का उपाय—परिभव की भावना से उत्पन्न कारणों को व्यवहार-
कुशलता और कामशास्त्र की निपुणता दिखाकर दूर कर दें॥ ४७॥
५. पारदारिक अधिकरण १२५
तत्परिभवजानि प्रणत्या ॥ ४८ ॥
अपने प्रति जो अविश्वास की भावना हो, उसे विनम्रता से दूर कर दे ॥ ४८ ॥
भययुक्तान्याश्वासनादिति ॥ ४९ ॥
भयनिवारण—भय से उत्पन्न कारणों को आश्वासन देकर दूर कर दे ॥ ४९ ॥
पुरुषास्त्वमी प्रायेण सिद्धाः—कामसूत्रज्ञः कथाख्यानकुशलो बाल्यात्प्रभृति
संसृष्टः प्रवृद्धयौवनः क्रीडनकर्मादिनागतविश्वासः प्रेषणस्य कर्तोचितसम्भाषणः
प्रियस्य कर्तान्यस्य भूतपूर्वो दूतो मर्मज्ञ उत्तमया प्रार्थितः सख्या प्रच्छन्नं संसृष्टः
सुभगाभिख्यातः सहसंवृद्धः प्रातिवेश्यः कामशीलस्तथाभूतश्च परिचारको
धात्रेयिकापरिग्रहो नववरकः प्रेक्षोद्यानत्यागशीलो वृष इति सिद्धप्रतापः साहसिकः
शूरो विद्यारूपगुणोपभोगैः पत्युरतिशयिता महार्हवेषोप-चारश्चेति ॥ ५० ॥
स्त्रीसिद्धपुरुष प्रकरण—प्रायः निम्नलिखित पुरुष परकीया को सिद्ध करने में निपुण
होते हैं—कामसूत्र का ज्ञाता, कथा और आख्यान कहने में निपुण, बाल्यकाल का सहचर, भरपूर
यौवन सम्पन्न, खेलने का विश्वासी (खिलाड़ी), यथोक्तकारी (जैसा कहो, वैसा ही मान लेने
वाला), सन्तुलित बोलने वाला, मनोवाञ्छित वस्तु लाकर देने वाला, जो पहले किसी अन्य प्रेमी
का दूत रहा हो, जो किसी सुन्दर स्त्री का प्रेम प्राप्त कर चुका हो, जो सखी से गुप्तरूप से मिल
चुका हो, जो अपनी सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध हो, जिसका स्त्री (नायिका) के साथ लालन-
पालन हुआ हो, कामी पड़ौसी, कामी नौकर, धाय की लड़की का पति, नया दामाद, जो
नृत्यनाट्य देखने और वनविहार (पिकनिक) आदि में रुचि रखता हो, त्यागशील (स्त्रियों को
भेंट देने वाला), हृष्टपुष्ट एवं साहसी, शूरवीर, जो विद्या रूप गुण और उपभोगों में स्त्री के पति
से बढ़कर हो, सुन्दर वेश वाला, कामकलाओं में निपुण और मर्मज्ञ हो ॥ ५० ॥
यथात्मानः सिद्धतां पश्येदेवं योषितोऽपि ॥ ५१ ॥
अयत्नसाध्ययोषित्-प्रकरण—जिस प्रकार पुरुष अपने उपायों की सफलता पर विचार
करता है कि मैं सफल हो सकता हूँ या नहीं, उसी प्रकार उसे वांछित स्त्री (परकीया या
नायिका) के विषय में भी विचार करना चाहिये कि यह सिद्ध हो सकती है अथवा नहीं ॥ ५१ ॥
अयत्नसाध्या योषितस्त्विमाः—अभियोगमात्रसाध्याः। द्वारदेशावस्थायिनी।
प्रासादाद्राजमार्गावलोकिनी। तरुणप्रातिवेश्यगृहे गोष्ठीयोजिनी। सततप्रेक्षिणी।
प्रेक्षिता पार्श्वविलोकिनी। निष्कारणं सपत्न्याधिविन्ना। भर्तुर्द्वेषिणी विद्विष्टा च।
परिहारहीना। निरपत्या ॥ ५२ ॥
विना प्रयत्न के सिद्ध होने वाली स्त्रियाँ—ये स्त्रियाँ विना विशेष प्रयत्न के, केवल
साधारण अभियोग से ही सिद्ध हो जाती हैं—सदैव द्वार पर खड़ी रहने वाली, भवन की छत से
सड़क पर सदैव झाँकने वाली, तरुण पड़ोसी से जाकर गप्पें लड़ाने वाली, आने जाने वालों को
निरन्तर देखते रहने वाली, देखे जाने पर तिरछी निगाह से देखने वाली, जिसके पति ने अकारण
दूसरा विवाह कर लिया हो, पति से द्वेष करने वाली, जिसका पति उससे द्वेष रखता हो, जिसे
कोई नियन्त्रित करने वाला न हो और जो सन्तानरहित हो ॥ ५२ ॥
१२६ वात्स्यायन-कामसूत्र
ज्ञातिकुलनित्या। विपन्नापत्या। गोष्ठीयोजिनी। प्रीतियोजिनी। कुशीलव-
भार्या। मृतपतिका बाला। दरिद्रा बहुपभोगा। ज्येष्ठभार्या बहुदेवरका। बहुमानिनी
न्यूनभर्तृका। कौशलाभिमानिनी भर्तृमौर्ख्येणोद्विग्ना। अविशेषतया लोभेन ॥ ५३ ॥
जो सदैव पितृगृह में ही रहती हो, जिसके बच्चे होकर मर जाते हों, जिसे गप्पें मारने में
रुचि हो, जो सबसे मित्रता जोड़ती फिरती हो, नृत्यनाट्य करने वालों की स्त्रियाँ, बालविधवा,
दरिद्र होकर भी भोगविलासों की आकांक्षा रखने वाली, अनेक देवरों वाली, जो अपने रूप गुण
के अभिमान में पति को हीन मानने वाली हो, जो अपने कलाकौशल का अत्यधिक अभिमान
रखती हो और पति की मूर्खता से पीड़ित हो तथा जो पति पर मुग्ध न होकर किसी अन्य को
चाहती हो ॥ ५३ ॥
कन्याकाले यत्नेन वारिता कथञ्चिदलभ्याभियुक्ता च सा तदानीम्। समान-
बुद्धिशीलमेधाप्रतिपत्तिसात्म्या। प्रकृत्या पक्षपातिनी। अनपराधे विमानिता।
तुल्यरूपाभिश्चाधः कृता। प्रोषितपतिकेति। ईर्ष्यालुपूतिचोक्षकलीबदीर्घसूत्रका-
पुरुषकुब्जवामनविरूपमणिकारग्राम्यदुर्गन्धिरोगिवृद्धभार्याश्चेति ॥ ५४ ॥
जिसे मनोवाञ्छित पति न मिला हो, जिसकी बुद्धि शील मेधा और प्रतिपत्ति नायक के
समान हो, जो स्वभावतः पक्षपात रखती हो, जो निरपराध होकर भी अपमानित की गयी हो, जो
समानता रखने वाली सपत्नियों द्वारा अपमानित की गयी हो, जिसका पति विदेश गया हुआ हो,
जिसका पति प्रेम न रखकर ईर्ष्या करता हो, जिसका पति मलिन या निम्न जाति का हो, नपुंसक
हो, आलसी हो, कायर हो, कुबड़ा हो, बौना हो, कुरूप हो, जौहरी हो, गँवार हो, रोगी हो,
दुर्गन्ध वाला हो और बुड्ढा हो—ऐसी स्त्रियाँ प्रायः व्यभिचारिणी बन जाती हैं ॥ ५४ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
इच्छा स्वभावतो जाता क्रियया परिवृंहिता।
बुद्ध्या संशोधितोद्वेगा स्थिरा स्यादनपायिनी ॥ ५५ ॥
उपसंहार—इस विषय में दो आनुवंश्य श्लोक उद्धृत करते हैं—
पुरुष सुन्दर स्त्री को चाहता है और स्त्री सुन्दर पुरुष को—यह इच्छा स्वभावतः उत्पन्न
होती है। ये सहज कामनाएँ परिचय और अभियोगों द्वारा बढ़ायी जा सकती हैं और बुद्धि से
उद्वेगों का संशोधन कर इस प्रकार की कामनाएँ स्थायी बनायी जा सकती हैं ॥ ५५ ॥
सिद्धतामात्मनो ज्ञात्वा लिङ्गान्यनुन्नीय योषिताम्।
व्यावत्तिकारणोच्छेदी नरो योषित्सु सिध्यति ॥ ५६ ॥
अपनी सफलता को जानकर, स्त्री के सङ्केतों एवं चेष्टाओं का अनुमान करके,
अतिपरिचय, अनुराग आदि से प्रतिबन्धकों को दूर करके पुरुष परकीया स्त्रियों को सिद्ध करने
में सफल हो जाता है ॥ ५६ ॥
स्त्री-पुरुषशीलावस्थापन प्रकरण नामक प्रथम अध्याय सम्पन्न ॥
५. पारदारिक अधिकरण १२७
द्वितीय अध्याय
परिचयकारणाभियोगप्रकरण
यथा कन्या स्वयमभियोगसाध्या न तथा दूत्या। परस्त्रियस्तु सूक्ष्मभावा
दूतीसाध्या न तथात्मनेत्याचार्याः ॥ १ ॥
जिस प्रकार कन्या स्वयं अपने उपायों से सिद्ध की जा सकती है, उस तरह दूती द्वारा
नहीं। सूक्ष्म भावों से सम्पन्न परकीया जिस प्रकार दूती द्वारा सिद्ध की जा सकती है, उस तरह
अपने उपायों से नहीं—यह कामशास्त्र के आचार्यों का मत है ॥ १ ॥
सर्वत्र शक्तिविषये स्वयं साधनमुपपन्नतरकं दुरुपपादत्वात्तस्य दूतीप्रयोग इति
वात्स्यायनः ॥ २ ॥
यदि सम्भव हो, तो सर्वत्र स्वयं उपाय करना दूती की अपेक्षा श्रेष्ठ है। यदि स्वयं उपाय
करना सम्भव न हो, तो दूती का प्रयोग करना चाहिये—यह आचार्य वात्स्यायन का मत
है ॥ २ ॥
प्रथमसाहसा अनियन्त्रणसम्भाषाश्च स्वयं प्रतार्याः। तद्विपरीताश्च दूत्येति
प्रायोवादः ॥ ३ ॥
जिस स्त्री का चरित्र प्रथम बार खण्डित हुआ हो और जिससे स्वयं बात की जा सकती
हो, उसे स्वयं ही सिद्ध कर लेना चाहिये। इसके विपरीत, यदि नायिका का चरित्र अनेक बार
खण्डित हो चुका हो और उससे वार्तालाप सम्भव न हो, तो उसे दूती के माध्यम से सिद्ध करना
चाहिये ॥ ३ ॥
स्वयमभियोक्ष्यमाणस्त्वादावेव परिचयं कुर्यात् ॥ ४ ॥
यदि नायक स्वयं उपाय करना चाहे, तो पहले नायिका से परिचय करे, सम्बन्ध बढ़ाये।
परिचय का आशय है भली प्रकार दर्शन, भेंट या जान-पहचान। यह स्वयं भी हो सकता है और
दूती के माध्यम से भी ॥ ४ ॥
तस्याः स्वाभाविकं दर्शनं प्रायत्नकं च ॥ ५ ॥
दर्शनभेद—दर्शन दो प्रकार का होता है—स्वाभाविक और प्रायत्निक। जो दर्शन सहज
भाव से हो, वह स्वाभाविक है और जो उपायों द्वारा सम्भव हो, वह प्रायत्निक है ॥ ५ ॥
स्वाभाविकमात्मनो भवनसन्निकर्षे प्रायत्निकं मित्रज्ञातिमहामात्रवैद्यभवन-
सन्निकर्षे विवाहयज्ञोत्सवव्यसनोद्यानगमनादिषु ॥ ६ ॥
अपने भवन के निकट आती-जाती नायिका को देख लेना स्वाभाविक दर्शन है। मित्र,
जाति, महामन्त्री और वैद्य के घर के निकट अथवा विवाह, उत्सव, यज्ञ, दुःख (सङ्कट),
वनविहार (पिकनिक) आदि में देखना प्रायत्निक है ॥ ६ ॥
दर्शने चास्याः सततं साकारं प्रेक्षणं केशसंयमनं नखाच्छुरणमाभरणप्रह्लादन-
मधरौष्ठविमर्दनं तास्ताश्च लीला वयस्यैः सह प्रेक्षमाणायास्तत्सम्बद्धाः परापदे-
शिन्यश्च कथास्त्यागोपभोगप्रकाशनं सख्युरुत्सङ्गनिषण्णस्य साङ्गभङ्गं जृम्भण-
१२८ वात्स्यायन-कामसूत्र
मेकभ्रूक्षेपणं मन्दवाक्यता तद्वाक्यश्रवणं तामुद्दिश्य बालेनान्यजनेन वा सहान्यो-
पदिष्टा द्व्यर्था कथा तस्यां स्वयं मनोरथावेदनमन्यापदेशेन तामेवोद्दिश्य
बालचुम्बनमालिङ्गनं च जिह्वया चास्य ताम्बूलदानं प्रदेशिन्या हनुदेशघट्टनं
तत्तद्यथायोगं यथावकाशं च प्रयोक्तव्यम् ॥ ७ ॥
बाह्य परिचय—नायिका का दर्शन मुख और नेत्रों की भावसूचक चेष्टाओं के साथ ही
करना चाहिये। उसे देखते समय बार बार अपने बालों को ठीक करे या सहलाये, नखों से
खुजाये, आभूषणों को ठीक करे, अपने अधर को मसले और अपने समवयस्क मित्रों के साथ
उसके देखते हुए ही उन उन लीलाओं को करे। अन्य के बहाने उसकी बात करे, अपनी
त्यागशीलता और भोगविलासों को प्रकट करे, मित्र की गोद में लेटकर अँगड़ाई और जम्हाई
लेता हुआ उसकी ओर भौंहें नचाये। धीरे से बोले और उसकी बातें सुनने का प्रयत्न करे। उसको
लक्ष्य करके बालक का चुम्बन और आलिङ्गन करे, बालक को जीभ से पान दे, तर्जनी अंगुलि
से उसके कपोलों को गुदगुदाये। समय और स्थान देखकर इन योगों में जिनका प्रयोग कर सके,
उनका प्रयोग करे ॥ ७ ॥
तस्याश्चाङ्कगतस्य बालस्य लालनं बालक्रीडनकानां चास्य दानं ग्रहणं तेन
सन्निकृष्टत्वात्कथायोजनं तत्संभाषणक्षमेण जनेन च प्रीतिमासाद्य कार्यं तदनुबन्धं च
गमनागमनस्य योजनं संश्रये चास्यास्तामपश्यतो नाम कामसूत्रसङ्कथा ॥ ८ ॥
नायिका की गोद में बैठे बालक को प्यार करे, उसे खेलने के लिये खिलौने दे और फिर
उन्हें ले ले। पास आकर उससे बातें करे। जो व्यक्ति उस नायिका से बातें कर सकता हो, उससे
सम्बन्ध स्थापित कर ले और अपना प्रयोजन सिद्ध करने का प्रयास करे। किसी काम का बहाना
निकालकर नायिका के घर आवागमन प्रारम्भ कर दे। एकान्त में बैठकर कामसूत्र की ऐसी
कथा-वार्ताएँ करे जिन्हें नायिका सुन सके, किन्तु यह न समझ पाये कि यह मुझे देखकर या
लक्ष्य कर ही ये रससिक्त कथा-वार्ताएँ कर रहा है ॥ ८ ॥
प्रसूते तु परिचये तस्या हस्ते न्यासं निक्षेपं च निदध्यात्। तत्प्रतिदिनं प्रतिक्षणं
चैकदेशतो गृह्णीयात्। सौगन्धिकं पूगफलानि च ॥ ९ ॥
आभ्यन्तर परिचय—परिचय बढ़ जाने पर उस नायिका के हाथ में न्यास और निक्षेप
कर दे। तत्पश्चात् प्रतिदिन या प्रतिक्षण अंशरूप में उससे ग्रहण करता चले। इत्र, सुपारी आदि
वस्तुएँ प्रतिदिन दी जाती हैं ॥ ९ ॥
तामात्मनो दारैः सह विस्रम्भगोष्ठ्यां विविक्तासने च योजयेत् ॥ १० ॥
उसे अपने घर की स्त्रियों के साथ एकान्त में वार्तालाप और खान पान में लगा दे ॥ १० ॥
नित्यदर्शनार्थं विश्वासनार्थं च ॥ ११ ॥
सदैव ऐसे प्रयत्न करे कि नायिका प्रतिदिन दीखती रहे तथा प्रेम और विश्वास बढ़ता
रहे ॥ ११ ॥
सुवर्णकारमणिकारवैकटिकनीलीकुसुम्भरञ्जकादिषु च कामार्थिन्यां
सहात्मनो वश्यैश्चैषां तत्सम्पादने स्वयं प्रयतेत ॥ १२ ॥
५. पारदारिक अधिकरण १२९
सुनार, रत्नकार, वैकटिक (रत्नपरिशोधक या रत्नों का शोधन करने वाले अथवा उन्हें
सुन्दर आकार देने वाले), नीलगार, रंगरेज, बढ़ई आदि से यदि नायिका का कोई काम पड़े, तो
नायक अपने परिचितों द्वारा उस कार्य को कराने का दायित्व स्वयं ले ले ॥ १२ ॥
तदनुष्ठाननिरतस्य लोकविदितो दीर्घकालं सन्दर्शनयोगः ॥ १३ ॥
ऐसे कार्य करते हुए नायक को नायिका के निकट आने का अवसर मिलता है और
निकटवर्ती लोग वास्तविकता को बहुत देर से समझ पाते हैं ॥ १३ ॥
तस्मिंश्चान्येषामपि कर्मणामनुसन्धानम् ॥ १४ ॥
नायिका का एक कार्य पूर्ण न होने पाये कि दूसरे कार्य को खोज ले ॥ १४ ॥
येन कर्मणा द्रव्येण कौशलेन चार्थिनी स्यात्तस्य प्रयोगमुत्पत्तिमागममुपायं
विज्ञानं चात्मायत्तं दर्शयेत् ॥ १५ ॥
उस नायिका को जिस कार्य, द्रव्य और कौशल की इच्छा हो, उसके प्रयोग, उत्पत्ति,
आगम, उपाय और विज्ञान को अपने अधीन दिखा दे ॥ १५ ॥
पूर्वप्रवृत्तेषु लोकचरितेषु द्रव्यगुणपरीक्षासु च तया तत्परिजनेन च सह
विवादः ॥ १६ ॥
पुरातन रीतिरिवाजों एवं वस्तुओं के गुणों की परीक्षा में उसके तथा उसके परिजनों के
साथ वादविवाद करे। इससे सङ्कोच दूर होता है ॥ १६ ॥
तत्र निर्दिष्टानि पणितानि तेष्वेनां प्राश्निकत्वेन योजयेत् ॥ १७ ॥
इस वादविवाद में वस्तु का जो मूल्य लगाया जाये, उसके पूछने के लिये नायिका को
लगा दे ॥ १७ ॥
तया तु विवदमानोऽत्यन्ताद्भुतमिति ब्रूयादिति परिचयकारणानि ॥ १८ ॥
नायिका के साथ विवाद करता हुआ उसे विदुषी और बुद्धिमती बताये। ये परिचय के
कारण हैं ॥ १८ ॥
कृतपरिचयां दर्शितेङ्गिताकारां कन्यामिवोपायतोऽभियुञ्जीतेति। प्रायेण तत्र
सूक्ष्मा अभियोगाः। कन्यानामसम्पयुक्तत्वात्। इतरासु तानेव स्फुटमुपदध्यात्।
.सम्पयुक्तत्वात् ॥ १९ ॥
अभियोगप्रकरण—जिस स्त्री से भलीभाँति परिचय हो गया हो, जिसने अनुकूल सङ्केत
और चेष्टाएँ दिखा दी हों, उसे कन्यासम्प्रयुक्तक अधिकरण में कहे गये कन्या को सिद्ध करने
के उपायों द्वारा ही प्राप्त करना चाहिये। क्योंकि कन्याएँ सम्भोग की हुई नहीं होतीं, इसलिये उन्हें
प्राप्त करने के लिये सूक्ष्म उपाय ही किये जाते हैं। किन्तु जो कन्याओं के अतिरिक्त हैं,
विवाहिताएँ हैं और सम्भोग कर चुकी होती हैं अथवा विवाह से पूर्व भी अनेक व्यक्तियों से
सम्भोग करा चुकी हैं, उन्हें प्राप्त करने के लिये प्रकट उपाय करने चाहियें ॥ १९ ॥
सन्दर्शिताकारायां निर्भिन्नसद्भावायां समुपभोगव्यतिकरे तदीयान्यु-
पयुञ्जीत ॥ २० ॥
जिस परकीया ने मुख और नेत्रों की प्रसन्नता और लालिमा से अपना हृदयस्थ अनुराग
१३० वात्स्यायन-कामसूत्र
प्रकट कर दिया हो, जिसका स्नेह सद्भाव प्रकट हो चुका हो, उसकी वस्तुओं का उपभोग प्रेमी
करे और प्रेमी की वस्तुओं का उपभोग वह स्वयं करे अर्थात् प्रेमी और प्रेमिका एक दूसरे की
वस्तुओं को उपभोग करें ॥ २० ॥
तत्र महार्हगन्धमुत्तरीयं कुसुमं स्यादङ्गुलीयकं च। तद्धस्ताद् गृहीतताम्बूलया
गोष्ठीगमनोद्यतस्य केशहस्तपुष्पयाचनम् ॥ २१ ॥
उपभोग की वस्तुओं का आदान-प्रदान प्रारम्भ होने पर नायक, नायिका से बहुमूल्य
सुगन्धित वस्तु (इत्र या सेंट), उत्तरीय (शाल या दुपट्टा), पुष्प और अँगूठी ग्रहण कर ले। जब
वह अपने हाथ से पान खा ले, तो गोष्ठी में जाने के लिये तैयार होकर उसके केशपाश (जूड़े)
में खोंसे गये सुगन्धित फूल (गजरा) माँगे ॥ २१ ॥
तत्र महार्हगन्धं स्पृहणीयं स्वनखदशनपदचिह्नितं साकारं दद्यात् ॥ २२ ॥
जब नायक बहुमूल्य सुगन्धित वस्तु (इत्र आदि) व अन्य मनोवांछित वस्तुएँ नायिका को
दे, तो उन पर अपने नखों एवं दाँतों के चिह्न अङ्कित कर दे ॥ २२ ॥
अधिकैरधिकैश्चाभियोगैः साध्वसविच्छेदनम् ॥ २३ ॥
नायक को चाहिये कि उत्तरोत्तर अधिकाधिक उपाय करता हुआ उसके भय को दूर कर
दे ॥ २३ ॥
क्रमेण च विविक्तदेशे गमनमालिङ्गनं चुम्बनं ताम्बूलस्य ग्रहणं दानान्ते
द्रव्याणां परिवर्तनं गुह्यदेशाभिमर्शनं चेत्यभियोगाः ॥ २४ ॥
आन्तरिक अभियोग—क्रमशः एकान्त में मिलना, आलिङ्गन, चुम्बन, पान लेना और
देना, वस्तुओं का परिवर्तन और नायिका के गुह्याङ्गों का स्पर्श—ये अभियोग होने
चाहिये ॥ २४ ॥
यत्र चैकाभियुक्ता न तत्रापरामभियुञ्जीत ॥ २५ ॥
अभियोगहेतु अनुपयुक्त स्थल—जिस स्थान पर एक परकीया से मिलन हो चुका हो,
उस स्थान पर दूसरी परकीया से नहीं मिलना चाहिये ॥ २५ ॥
तत्र या वृद्धानुभूतविषया प्रियोपग्रहैश्च तामुपगृह्णीयात् ॥ २६ ॥
गृहस्वामिनी की अनुकूलता अनिवार्य—जहाँ परकीया के साथ रमण करना हो, वहाँ
यदि कोई खेली खायी वृद्धा हो, तो दे दिलाकर उसे अवश्य अनुकूल बना लेना चाहिये ॥ २६ ॥
श्लोकावत्र भवतः—
अन्यत्र दृष्टसञ्चारस्तद्भर्ता यत्र नायकः।
न तत्र योषितं काञ्चित् सुप्रापामपि लङ्घयेत् ॥ २७ ॥
अनुपयुक्त घर—जिस घर में नायिका के पति ने किसी अन्य स्त्री का व्यभिचार देखा या
सुना हो, वहाँ सरलता से प्राप्त होने वाली किसी स्त्री के साथ भी नहीं मिलना चाहिये ॥ २७ ॥
शङ्कितां रक्षितां भीतां सश्वश्रूकां च योषितम्।
न तर्कयेत मेधावी जानन् प्रत्ययमात्मनः ॥ २८ ॥
५. पारदारिक अधिकरण १३१
अनुपयुक्त स्त्रियाँ—बुद्धिमान् पुरुष को चाहिये कि शङ्कित हृदय वाली, सशक्त पुरुषों
द्वारा रक्षित, पति से भयभीत एवं सास ससुर वाली स्त्री की भूल कर भी कामना न करे ॥ २८ ॥
परिचयकारणाभियोग प्रकरण नामक द्वितीय अध्याय सम्पन्न ॥
●
तृतीय अध्याय
भावपरीक्षाप्रकरण
अभियुञ्जानो योषितः प्रवृत्तिं परीक्षेत। तया भावः परीक्षितो भवति।
अभियोगाँश्च प्रतिगृह्णीयात् ॥ १ ॥
सूक्ष्म निरीक्षण आवश्यक—अभियोग करता हुआ नायक स्त्री की प्रवृत्ति की परीक्षा
करे, उसी से भाव की परीक्षा हो जाती है, और वह जो उपाय करे, उसका उत्तर दे ॥ १ ॥
मन्त्रमवृण्वानां दूत्यैनां साधयेत् ॥ २ ॥
प्रगल्भा दूती द्वारा ही साध्य—हृदय का भाव प्रकटित न करने वाली, धीर परकीया को,
रहस्य न कहने वाली, चतुर दूती से ही सिद्ध करना चाहिये ॥ २ ॥
अप्रतिगृह्णाभियोगं पुनरपि संसृज्यमानां द्विधाभूतमानसां विद्यात्। तां क्रमेण
साधयेत् ॥ ३ ॥
द्विधाग्रस्त—जो स्त्री नायक के अभियोग को अस्वीकार करके भी उससे पुनः मिलती
है, उसे दुविधा में फँसी हुई समझना चाहिये। उसे क्रमशः सिद्ध करना चाहिये ॥ ३ ॥
अप्रतिगृह्णाभियोगं सविशेषमलंकृता च पुनर्दृश्येत तथैव तमभिगच्छेच्च
विविक्ते बलाद् ग्रहणीयां विद्यात् ॥ ४ ॥
बलात् ग्राह्य—जो स्त्री नायक के अभियोगों को स्वीकार किये विना भी पहले की
अपेक्षा वस्त्राभूषणों से अधिक सज सँवरकर आये, तो नायक को उससे पहले के समान ही
मिलने का प्रयास करना चाहिये। यदि वह फिर भी हाथ न रखने दे और सज सँवर कर भी आती
रहे, तो उसे एकान्त में बलपूर्वक सम्भोग कराने वाली समझना चाहिये ॥ ४ ॥
बहूनपि विषहतेऽभियोगान्न च चिरेणापि प्रयच्छत्यात्मानं सा शुष्क-
प्रतिग्राहिणी परिचयविघटनसाध्या ॥ ५ ॥
अतिपरिचय से साध्य—जो स्त्री अनेक अभियोगों को सहन कर ले और चिरकाल तक
भी सम्भोग न होने दे, उसे नीरस अभियोग वाली जानना चाहिये। ऐसी स्त्री अतिपरिचय से ही
सिद्ध की जा सकती है ॥ ५ ॥
मनुष्यजातेश्चित्तानित्यत्वात् ॥ ६ ॥
मानव का चित्त अत्यन्त चञ्चल होता है, अतः वह परिचय टूटने पर पुनः परिचय कर
लेता है ॥ ६ ॥
१३२ वात्स्यायन-कामसूत्र
अभियुक्तापि परिहरति, न च संसृज्यते । न च प्रत्याचष्टे । तस्मिन्नात्मनि च
गौरवाभिमानात् । सातिपरिचयात् कृच्छ्रसाध्या । मर्मज्ञया दूत्या तां साधयेत् ॥ ७ ॥
मर्मज्ञ दूती से साध्य—कोई कोई स्त्री परपुरुष से कई कई बार मिलकर भी फिर मिलना
छोड़ देती है, न सम्भोग का अवसर ही देती है और न स्पष्ट ना ही करती है तथा इसी में अपना
गौरव समझती है। उसे अतिपरिचय से कठिनतापूर्वक सिद्ध किया जा सकता है या मर्मज्ञ दूती
द्वारा साधा जा सकता है ॥ ७ ॥
सा चेदभियुज्यमाना पारुष्येण प्रत्यादिशत्युपेक्ष्या ॥ ८ ॥
उपेक्षणीया—जो स्त्री नायक द्वारा अभियोग किये जाने पर निष्ठुरतापूर्वक उत्तर दे दे,
उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिये ॥ ८ ॥
परुषयित्वापि तु प्रीतियोजिनीं साधयेत् ॥ ९ ॥
विशेष बात—जो स्त्री कठोर वचन कहकर भी प्रेमसम्बन्ध बनाना चाहे, उसे अभियोगों
से सिद्ध कर लेना चाहिये ॥ ९ ॥
कारणात् संस्पर्शनं सहते नावबुध्यते नाम द्विधाभूतमानसा सातत्येन क्षान्त्या
वा साध्या ॥ १० ॥
अङ्गस्पर्श से साध्य—जो स्त्री किसी कारणवश अङ्गस्पर्श को इस प्रकार सहती हो मानो
कुछ जानती ही न हो, दुविधा में फँसी हुई ऐसी स्त्री को निरन्तर स्पर्श (आलिङ्गन आदि) से
सिद्ध किया जा सकता है ॥ १० ॥
समीपे शयानायाः सुप्तो नाम करमुपरि विन्यसेत् । सापि सुप्तेवोपेक्षते । जाग्रती
त्वपनुदेद् भूयोऽभियोगाकांक्षिणी ॥ ११ ॥
अधिक अभियोग चाहने वाली की पहचान—समीप में सोयी हुई सी नायिका के
ऊपर सोया हुआ सा नायक अपना हाथ रख दे। वह भी सोती हुई के समान उपेक्षा कर देगी,
किन्तु अधिक अभियोग की इच्छा रखने वाली नायक के हाथ को तुरन्त हटा देती है ॥ ११ ॥
एतेन पादस्योपरि पादन्यासो व्याख्यातः ॥ १२ ॥
पादन्यास—इसी कथन से पैर पर पर रखना भी कह दिया गया है ॥ १२ ॥
तस्मिन् प्रसुप्ते भूयः सुप्तसंश्लेषणमुपक्रमेत् ॥ १३ ॥
सुप्त आलिङ्गन—जब नायक निःशङ्क होकर नायिका के हाथ पर और पैर पर पैर रखने
लगे तो सोते हुए आलिङ्गन भी प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ १३ ॥
तदसहमानामुत्थितां द्वितीयेऽहनि प्रकृतिवर्तिनीमभियोगार्थिनीं विद्यात् । अदृ-
श्यमानां तु दूतीसाध्याम् ॥ १४ ॥
प्रगल्भा—यदि आलिङ्गन करते ही स्त्री उठ खड़ी हो और दूसरे दिन शान्त या सामान्य
ही हो, तो उसे अधिक अभियोग चाहने वाली समझे, अतएव उसकी प्राप्ति के लिये अभियोग
करे। यदि दूसरे दिन भी वह असामान्य या कुपित दिखायी दे, तो उसे दूती से सिद्ध करने का
प्रयास करे ॥ १४ ॥
५. पारदारिक अधिकरण १३३
चिरमदृष्टापि प्रकृतिस्थैव संसृज्यते कृतलक्षणां तां दर्शिताकारामुपक्र-
मेत् ॥ १५ ॥
आलिङ्गन को न सहकर शय्या से उठी हुई नायिका यदि बहुत दिनों बाद शान्तभाव से
मिलती है, तो उसके सङ्केत और हाव-भाव दिखाने पर पुनः अभियोग प्रारम्भ कर देना
चाहिये ॥ १५ ॥
अनभियुक्ताप्याकारयति। विविक्ते चात्मानं दर्शयति। सवेपथुगद्गदं वदति।
स्विन्नकरचरणाङ्गुलिः स्विन्नमुखी च भवति। शिरःपीडने संवाहने चोर्वोरात्मानं
नायके नियोजयति ॥ १६ ॥
अनुरागिणी—जो बिना अभियोग किये भी हाव-भाव दिखाती हो, एकान्त में अपने
गुह्याङ्गों को दिखाती हो, कम्पनयुक्त वाणी से गद्गद वचन बोलती हो, जिसके हाथ-पैर और
मुख पर पसीना आता हो, जो नायक के सिर और पैर दबाने लगती हो—उसे नायक की
अनुरागिणी समझना चाहिये ॥ १६ ॥
आतुरासंवाहिका चैकेन हस्तेन संवाहयन्ती द्वितीयेन बाहुना स्पर्शमावेदयति
श्लेषयति च। विस्मितभावा ॥ १७ ॥
कामातुर होकर वह एक हाथ से तो अपना पैर दबाती जाती है और विस्मृत सी हो कर
दूसरे हाथ से स्पर्श करने लगती है ॥ १७ ॥
निद्रान्धा वा परिस्पृश्योरुभ्यां बाहुभ्यामपि तिष्ठति। अलिकैकदेशमूर्वोरुपरि
पातयति। ऊरुमूलसंवाहने नियुक्ता न प्रतिलोमयति। तत्रैव हस्तमेकमविचलं
न्यस्यति। अङ्गसंदंशेन च पीडितं चिरादपनयति ॥ १८ ॥
अथवा नींद का बहाना करके दोनों हाथों से नायक का आलिङ्गन करके घुटनों के बल
खड़ी हो जाती है, अपने मस्तक को उसके घुटनों पर टिका देती है, नायक के पैर दबाती हुई
हाथों को उसकी जाँघों की ओर बढ़ाती है, नीचे की ओर नहीं लाती, एक हाथ को तो जाँघों के
मध्य में ही रखे रहती है और जब नायक उसके हाथ को जाँघों से बलपूर्वक दबाता है, तभी
नायक के अप्रसन्न होने के भय से कुछ देर बाद हाथ हटाती है ॥ १८ ॥
प्रतिगृह्यैवं नायकाभियोगान् पुनर्द्वितीयेऽहनि संवाहनायोपगच्छति ॥ १९ ॥
उस दिन इस प्रकार नायक के अभियोगों को ग्रहण कर अगले दिन वह पुनः नायक पैर
दबाने आ जाती है ॥ १९ ॥
नात्यर्थं संसृज्यते। न च परिहरति ॥ २० ॥
न अत्यधिक संसर्ग ही करती है और न नायक को छोड़ती ही है ॥ २० ॥
विविक्ते भावं दर्शयति निष्कारणं चागूढमन्यत्र प्रच्छन्नप्रदेशात् ॥ २१ ॥
एकान्त में, अकारण ही, हाव भाव दिखाने लगती है और जनसमुदाय के मध्य प्रच्छन्न
रूप से भाव दिखाती है ॥ २१ ॥
सन्निकृष्टपरिचारकोपभोग्या सा चेदाकारितापि तथैव स्यात् सा मर्मज्ञया दूत्या
साध्या ॥ २२ ॥
१३४ वात्स्यायन-कामसूत्र
मर्मज्ञ दूती द्वारा साध्य—जो नायिका नायक के पास रहकर, सेवा करके भोगने योग्य
हो, वह हाव भाव दिखाने पर भी ज्यों की त्यों ही रहती है, वह उसके रहस्यों को जानने वाली
दूतों के द्वारा ही सिद्ध की जा सकती है ॥ २२ ॥
व्यावर्तमाना तु तर्कणीयेति भावपरीक्षा ॥ २३ ॥
सम्यक् परीक्षा आवश्यक—जो नायिका संकेत करती हुई भी मिलने से पीछे हट जाये,
उस पर विचार करना चाहिये कि यह आन्तरिक मन से सङ्केत कर रही है या नायक को मूर्ख
बनाने का आनन्द ले रही है। इस प्रकार भावपरीक्षा पूर्ण हुई ॥ २३ ॥
भवन्ति चात्र श्लोकाः—
आदौ परिचयं कुर्यात्ततश्च परिभाषणम्।
परिभाषणसम्मिश्रं मिथश्चाकारवेदनम् ॥ २४ ॥
उपसंहार—सर्वप्रथम नायिका से परिचय करना चाहिये। तत्पश्चात् वार्तालाप करना
चाहिये और इस वार्तालाप में ही भावों का आदान प्रदान और पहचान हो जानी चाहिये ॥ २४ ॥
प्रत्युत्तरेण पश्येच्चेदाकारस्य परिग्रहम्।
ततोऽभियुञ्जीत नरः स्त्रियं विगतसाध्वसः ॥ २५ ॥
नायक के सङ्केत करने पर नायिका सङ्केत द्वारा उत्तर दे दे तो नायक को निर्भय होकर उस
स्त्री की प्राप्ति हेतु अभियोग प्रारम्भ कर देना चाहिये ॥ २५ ॥
आकारेणात्मनो भावं या नारी प्राक्प्रयोजयेत्।
क्षिप्रमेवाभियोज्या सा प्रथमे त्वेव दर्शने ॥ २६ ॥
जो नायिका सङ्केत के साथ साथ अपने मनोभावों को भी जोड़ देती है, वह तो प्रथम दर्शन
में ही मिलन के लिये तैयार हो सकती है। अतएव ऐसी नायिका को प्रथम परिचय में ही प्राप्त
किया जा सकता है ॥ २६ ॥
श्लक्ष्णमाकारिता या तु दर्शयेत् स्फुटमुत्तरम्।
सापि तत्क्षणसिद्धेति विज्ञेया रतिलालसा ॥ २७ ॥
जो नायिका गुप्त सङ्केत का स्पष्ट उत्तर देती है, रतिलालसा वाली उस नायिका को तो उसी
समय सिद्ध समझना चाहिये अर्थात् उसे उसी समय भी प्राप्त किया जा सकता है ॥ २७ ॥
धीरायामप्रगल्भायां परीक्षिण्यां च योषिति।
एष सूक्ष्मो विधिः प्रोक्तः सिद्धा एव स्फुटं स्त्रियः ॥ २८ ॥
जो नायिका स्वभाव से गम्भीर हो, अपने मनोभावों को व्यक्त न होने दे और नायक की
अत्यधिक परीक्षा करती हो—ऐसी स्त्रियों के लिये ही यह सूक्ष्म विधि कही गयी है, क्योंकि वे
स्त्रियाँ सिद्ध हैं, यह तो स्पष्ट ही है ॥ २८ ॥
भावपरीक्षाप्रकरण नामक तृतीय अध्याय सम्पन्न ॥
५. पारदारिक अधिकरण १३५
चतुर्थ अध्याय
दूतीकर्मप्रकरण
दर्शिताङ्गिताकारां तु प्रविरलदर्शनामपूर्वां च दूत्योपसर्पयेत् ॥ १ ॥
दूतियों के कार्य—जिसने सङ्केत और चेष्टाओं से अनुकूलता दिखा दी हो, किन्तु कभी
कभी ही दीखे या अपरिचित स्त्री हो, उसे दूती के माध्यम से सिद्ध करना चाहिये ॥ १ ॥
सैनां शीलतोऽनुप्रविश्याख्यानकपटैः सुभगङ्करणयोगैर्लोकवृत्तान्तैः
कविकथाभिः पारदारिककथाभिश्च तस्याश्च रूपविज्ञानदाक्षिण्यशीलानु-
प्रशंसाभिश्च तां रञ्जयेत् ॥ २ ॥
दूती के सामान्य कार्य—दूती जिस स्त्री पर डोरे डालना चाहती हो, उसके घर अपने
उत्तम शीलस्वभाव का परिचय देकर प्रवेश करे। तत्पश्चात् कपटपूर्ण आख्यानों से, सौन्दर्यवर्धक
योगों से, लोकवृत्तान्तों से, कविकल्पित कथाओं से, परकीया और उपपति-विषयक शृङ्गार
सम्बद्ध कहानियों से और उस स्त्री के सौन्दर्य, ज्ञान, शील और चातुर्य की प्रशंसा कर, उसे
अनुरागिनी बना ले ॥ २ ॥
कथमेवंविधायास्तवायमित्थम्भूतः पतिरिति चानुशयं ग्राहयेत् ॥ ३ ॥
पति से विद्वेष कराना—'तुम जैसी रूपवती, कलानिपुण एवं व्यवहारकुशल को ऐसा
ग्राम्य एवं अरसिक पति कैसे मिला ?' यह कहकर उसके हृदय में पति के प्रति घृणा और द्वेष
उत्पन्न कर दे ॥ ३ ॥
न तव सुभगे दास्यमपि कर्तुं युक्त इति ब्रूयात् ॥ ४ ॥
'हे सुन्दरि ! यह तो तुम्हारा दास होने योग्य भी नहीं है'—ऐसा कहे ॥ ४ ॥
मन्दवेगतामीर्ष्यालुतां शठतामकृतज्ञतां चासम्भोगशीलतां कदर्यतां
चपलतामन्यानि च यानि तस्मिन् गुह्यान्यस्या अभ्याशे सति सद्भावेऽतिशयेन
भाषेत ॥ ५ ॥
'तुम्हारा पति मन्दवेग है, यह तुम्हारी अनुपम रूपमाधुरी से ईर्ष्या करता है, यह तुमसे
कपटपूर्ण आचरण रखता है, यह कृतघ्न है, यह भोगविलास में रुचि नहीं रखता, अपितु उससे
उदासीन रहता है, यह कदाचारी और चंचल है'—इन दोषों के अतिरिक्त भी जो अन्य गुप्त दोष
उसमें हों, उन सबको पत्नी से कहे। यदि वह विदग्ध और सच्चरित्र हो तो उसमें और भी
अधिक दोष दिखाये ॥ ५ ॥
येन च दोषेणोद्विग्नां लक्षयेत्तेनैवानुप्रविशेत् ॥ ६ ॥
जिस दोष को सुनकर नायिका को उद्विग्न देखे, उसी दोष से उसे पति से विमुख कर
दे ॥ ६ ॥
यदासौ मृगी तदा नैव शशतादोषः ॥ ७ ॥
दोषकथन में ध्यातव्य बातें—यदि नायिका मृगी जाति की हो तो पुरुष का शश जाति
का होना दोष नहीं है ॥ ७ ॥
१३६ वात्स्यायन-कामसूत्र
एतेनैव वडवाहस्तिनीविषयश्चोक्तः ॥ ८ ॥
इसी से वडवा और हस्तिनी का विषय भी कह दिया गया है ॥ ८ ॥
नायिकाया एव तु विश्वास्यतामुपलभ्य दूतीत्वेनोपसर्पयेत् प्रथमसाहसायां
सूक्ष्मभावायां चेति गोणिकापुत्रः ॥ ९ ॥
जो नायिका प्रथम बार परपुरुष से मिलने का साहस करती हो या जो अपने हृदयस्थ
भावों को प्रस्फुटित न कर रही हो, ऐसी नायिका की विश्वस्त बनकर दूती उसे दौत्यकर्म से
अपने घर बुलाये—यह आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ९ ॥
सा नायकस्य चरितमनुलोमतां कामितानि च कथयेत् ॥ १० ॥
नायक के प्रति अनुकूलन—वह दूती नायक की वैभवपूर्ण जीवनगाथा, उसकी सरलता
और रमण के आदि, मध्य एवं अन्त के भावों का वर्णन करे ॥ १० ॥
प्रसृतसद्भावायां च युक्त्या कार्यशरीरमित्थं वदेत् ॥ ११ ॥
यदि नायिका को रमणोत्सुक देखे तो युक्तिपूर्वक उससे इस प्रकार कहे ॥ ११ ॥
'शृणु विचित्रमिदं सुभगे, त्वां किल दृष्ट्वामुत्रासावित्थं गोत्रपुत्रो
नायकश्चित्तोन्मादमनुभवति। प्रकृत्या सुकुमारः कदाचिदन्यत्रापरिक्लिष्ट-
पूर्वस्तपस्वी। ततोऽधुना शक्यमनेन मरणमप्यनुभवितुम्'—इति वर्णयेत् ॥ १२ ॥
कथनपद्धति—'हे परमसुन्दरि! मैं तुम्हें एक विचित्र बात सुनाती हूँ, तुम उसे ध्यान से
सुनो। उस प्रसिद्ध परिवार का वह युवक उस स्थान पर तुम्हें देखकर कामोन्मत्त हो गया है। वह
स्वभाव से अत्यन्त सुकुमार है। उसने अभी तक जीवन में कभी कष्ट नहीं उठाया है। वह तो
तपस्वी है। यदि उसने तुम्हें नहीं पाया तो वह तड़प तड़प कर मर जायेगा'—इस प्रकार नायिका
से कहे ॥ १२ ॥
तत्र सिद्धा द्वितीयेऽहनि वाचि वक्त्रे दृष्ट्यां च प्रसादमुपलक्ष्य पुनरपि कथां
प्रवर्त्तयेत् ॥ १३ ॥
दूसरे दिन का कार्य—इन बातों में यदि दूती को सफलता मिल जाये अर्थात् नायिका
बातें रुचिपूर्वक सुनती रहे, तो दूती उसे दूसरे दिन फिर बुलाये और यदि उसके मुख और नेत्रों
पर प्रसन्नता झलकती हो तो उससे साधारण वार्तालाप प्रारम्भ कर दे ॥ १३ ॥
शृण्वत्यां चाहल्याविमारकशाकुन्तलादीन्यन्यान्यपि लौकिकानि च कथयेत्
तद्युक्तानि ॥ १४ ॥
जब वह बातें सुनने में लीन हो जाये तो उसे अहल्या, अविमारक और शकुन्तला की
कथाएँ तथा परकीय और उपपति (परपुरुष) से सम्बन्धित अन्यान्य लौकिक कथाएँ
सुनाये ॥ १४ ॥
वृषतां चतुःषष्टिविज्ञतां सौभाग्यं च नायकस्य। श्लाघनीयतां ( या ) चास्य
प्रच्छन्नं सम्प्रयोगं भूतमभूतपूर्वं वा वर्णयेत् ॥ १५ ॥
नायक की प्रबल सम्भोगशक्ति और चौंसठ कलाओं में निपुणता तथा नायिका की
५. पारदारिक अधिकरण १३७
सौभाग्यशालिता एवं उत्तमता का वर्णन कर, उसके पूर्वकाल में हुए या अनहुए (कल्पित)
सम्भोगों का वर्णन करे ॥ १५ ॥
आकारं चास्या लक्षयेत् ॥ १६ ॥
भावभङ्गिमाओं की परीक्षा—नायक के सम्भोगों की बातें सुनाते समय उसकी
भावभङ्गिमा की परीक्षा करती रहे ॥ १६ ॥
सविहसितं दृष्ट्वा सम्भाषते ॥ १७ ॥
भावबोधक व्यापार—देखकर मुसकाती हुई बोलती है ॥ १७ ॥
आसने चोपनिमन्त्रयते ॥ १८ ॥
सम्मानपूर्वक आसन पर बैठने के लिये कहती है ॥ १८ ॥
क्वासितं क्व शयितं भुक्तं क्व चेष्टितं किं वा कृतमिति पृच्छति ॥ १९ ॥
कल कहाँ बैठीं ? कहाँ सोयीं ? कल क्या खाना खाया ? अथवा कल दिनभर क्या करती
धरती रहीं ?—इत्यादि प्रश्न पूछती है ॥ १९ ॥
विविक्ते दर्शयत्यात्मानम् ॥ २० ॥
उससे एकान्त में बातें करती है या एकान्त में मिलती है ॥ २० ॥
आख्यानकानि नियुङ्क्ते ॥ २१ ॥
नायक की बातें स्वयं आरम्भ करती है ॥ २१ ॥
चिन्तयन्ती निःश्वसिति विजृम्भते च ॥ २२ ॥
कुछ सोचती हुई दीर्घोच्छ्वास और जँभाई लेती है ॥ २२ ॥
प्रीतिदायं च ददाति ॥ २३ ॥
प्रेमपूर्वक भेंट देती है ॥ २३ ॥
इष्टेषूत्सवेषु च स्मरति ॥ २४ ॥
इष्ट कार्यों और उत्सवों में उसे स्मरण करती है अर्थात् उत्सव आदि में उसे आमन्त्रित
करती है ॥ २४ ॥
पुनर्दर्शनानुबन्धं विसृजति ॥ २५ ॥
पुनः आने की शर्त पर ही घर से जाने देती है ॥ २५ ॥
साधुवादिनी सती किमिदमशोभनमभिधत्से इति कथामनुबध्नाति ॥ २६ ॥
'आप सदाचारिणी होकर ऐसी अशोभन बातें क्यों करती हैं?'—यह वार्तालाप के
अन्तर्गत कह देती है ॥ २६ ॥
नायकस्य शाठ्यचापल्यसम्बद्धान् दोषान् ददाति ॥ २७ ॥
नायक की चपलता और धूर्तता को कहती है ॥ २७ ॥
पूर्वप्रवृत्तं च तत्सन्दर्शनं कथाभियोगं च स्वयमकथयन्ती तयोच्यमानमाकां-
क्षति ॥ २८ ॥
१३८ वात्स्यायन-कामसूत्र
नायक की पूर्वप्रवृत्ति और उसके दर्शन से सम्बन्धित कथावार्ताओं को सङ्कोचवश स्वयं
न कहकर भी दूती से सुनने की इच्छा रखती है ॥ २८ ॥
नायकमनोरथेषु च कथ्यमानेषु सपरिभवं नाम हसति। न च
निर्वदतीति ॥ २९ ॥
नायक के मनोरथ कहे जाने पर तिरस्कारपूर्वक हँस देती है, लेकिन यह भी नहीं कहती
कि उसका मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा ॥ २९ ॥
दूत्येनां दर्शिताकारां नायकाभिज्ञानैरुपबृंहयेत् ॥ ३० ॥
अनुकूलित आकार का फल—पूर्वोक्त रीति से जिसके भावव्यञ्जक व्यापारों को देख
लिया हो, उसे दूती नायक की पुरानी बातों पर अनुरक्त करे ॥ ३० ॥
असंस्तुतां तु गुणकथनैरनुरागकथाभिश्चावर्जयेत् ॥ ३१ ॥
जिस नायिका का नायक के साथ परिचय न हो, उसे तो नायक के गुणों और उसकी
प्रेमकथाओं को सुना सुनाकर ही अनुरक्त करे ॥ ३१ ॥
नासंस्तुतादृष्टाकारयोर्दूत्यमस्तीत्यौद्दालकिः ॥ ३२ ॥
दूतीकर्म पर मतवैभिन्न्य—जो नायिका अपरिचित है और जिसके भावव्यञ्जक व्यापारों
की परीक्षा नहीं की गयी है, उसके साथ दूतीकर्म नहीं हो सकता—यह महर्षि श्वेतकेतु का मत
है ॥ ३२ ॥
असंस्तुतयोरपि संसृष्टाकारयोरस्तीति बाभ्रवीयाः ॥ ३३ ॥
अपरिचित होने पर भी यदि नायिका की अनुकूल चेष्टाएँ देख ली गयी हों, तो उसके साथ
दूतीकर्म हो सकता है—ऐसा बाभ्रव्य आचार्य के अनुयायियों (शिष्यों) का मत है ॥ ३३ ॥
संस्तुतयोरप्यसंसृष्टाकारयोरस्तीति गोणिकापुत्रः ॥ ३४ ॥
अपरिचित और बिना अनुकूल चेष्टाओं वाली नायिका के साथ भी दूतीकर्म हो सकता
है—यह इस अधिकरण के विशेषज्ञ आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ३४ ॥
असंस्तुतयोरदृष्टाकारयोरपि दूतीप्रत्ययादिति वात्स्यायनः ॥ ३५ ॥
दूती के विश्वास पर पूर्णतः अपरिचित और विना अनुकूल चेष्टाओं वाली नायिका के साथ
भी दूतीकर्म होता है—ऐसी महर्षि वात्स्यायन की व्यवस्था है ॥ ३५ ॥
तासां मनोहराण्युपायनानि ताम्बूलमनुलेपनं स्रजमङ्गुलीयकं वासो वा तेन
प्रहितं दर्शयेत् ॥ ३६ ॥
वस्तुप्रेषण—अपरिचित होने पर भी नायक उसे मनोहर भेंट, पान, अनुलेप, माला,
अँगूठी आदि भेजे ॥ ३६ ॥
तेषु नायकस्य यथार्थं नखदशनपदानि तानि तानि च चिह्नानि स्युः ॥ ३७ ॥
उन उपहार की वस्तुओं पर नायक के नखों और दाँतों के चिह्न अङ्कित हों ॥ ३७ ॥
वाससि च कुङ्कुमाङ्कमञ्जलिं निदध्यात् ॥ ३८ ॥
नायिका को उपहार में भेजे जाने वाले वस्त्रों पर केसर के थापे लगा दे ॥ ३८ ॥
५. पारदारिक अधिकरण १३९
पत्रच्छेद्यानि नानाभिप्रायाकृतीनि दर्शयेत्। लेखपत्रगर्भाणि कर्णपत्राण्या-
पीडांश्च ॥ ३९ ॥
पत्रों पर अनेक प्रकार की अभिप्रायबोधक आकृतियाँ बनाये। कर्णपत्र और आपीड
(माला) भी इस प्रकार बनाये कि उनके अन्दर प्रेमपत्र छिपाकर रखा जा सके ॥ ३९ ॥
तेषु स्वमनोरथाख्यापनम्। प्रतिप्राभृतदाने चैनां नियोजयेत् ॥ ४० ॥
उन प्रेमपत्रों में अपने मनोरथों को बताये और प्रेमपत्रों के निरन्तर आदान-प्रदान की
योजना बनाये ॥ ४० ॥
एवं कृतपरस्परपरिग्रहयोश्च दूतीप्रत्ययः समागमः ॥ ४१ ॥
इस प्रकार एक-दूसरे के हृदय में कामना उत्पन्न करके दूती के विश्वास पर समागम
होता है ॥ ४१ ॥
स तु देवताभिगमने यात्रायामुद्यानक्रीडायां जलावतरणे विवाहे यज्ञव्यसनो-
त्सवेष्वग्न्युत्पाते चौरविभ्रमे जनपदस्य चक्रारोहणे प्रेक्षाव्यापारेषु तेषु तेषु च
कार्येष्विति बाभ्रवीयाः ॥ ४२ ॥
मिलन का अवसर—वह समागम तो देवपूजा या देवयात्रा को जाते समय, वनविहार के
समय, जलविहार के समय, विवाह में सम्मिलित होते समय, आग लग जाने आदि उपद्रवों के
समय, चोरों को पकड़ने के कोलाहल में, राजा के परिवर्तन के समय, खेल-तमाशों के समय
और ऐसे ही अन्यान्य कार्यों के समय होता है—यह आचार्य बाभ्रव्य के अनुयायियों का मत
है ॥ ४२ ॥
सखीभिक्षुकीक्षपणिकातापसीभवनेषु सुखोपाय इति गोणिकापुत्रः ॥ ४३ ॥
मिलनस्थल—सखी, भिक्षुणी, संन्यासिनी और तपस्विनी—इनके घरों में नायक और
नायिका का मिलन सरलता से सम्भव है—यह आचार्य गोणिकापुत्र का मत है ॥ ४३ ॥
तस्या एव तु गेहे विदितनिष्क्रमप्रवेशे चिन्तितात्ययप्रतीकारे प्रवेशनमुपपन्नं
निष्क्रमणमविज्ञातकालं च तन्नित्यं सुखोपायं चेति वात्स्यायनः ॥ ४४ ॥
यदि प्रवेश करने और निकलने का मार्ग पता हो, तो उस नायिका के घर पर भी समागम
हो सकता है। यह नित्य और अविज्ञात होने से सुख का उपाय है—ऐसा आचार्य वात्स्यायन का
मत है ॥ ४४ ॥
निसृष्टार्था परिमितार्था पत्रहारी स्वयंढूती मूढदूती भार्यादूती मूकदूती वातदूती
चेति दूतीविशेषाः ॥ ४५ ॥
दूतीभेद—सामान्य रूप से दूतीकर्म बताकर अब दूतियों के भेद बताते हैं—निसृष्टार्था,
परिमितार्था, पत्रहारी, स्वयंढूती, मूढदूती, भार्यादूती, मूकदूती और वातदूती—ये दूतियों के
भेद हैं ॥ ४५ ॥
नायकस्य नायिकायाश्च यथामनीषितमर्थमुपलभ्य स्वबुद्ध्या कार्यसम्पादिनी
निसृष्टार्था ॥ ४६ ॥
काम० ११