वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
भूमिका ६७
४. ऐसी कल्पना करनी चाहिए कि मेरे हृदय में अनाहत चक्र पर मेरे मन्त्र
के समस्त वर्ण स्थित हैं । मूलाधार से जाग्रत होकर कुण्डलिनी सुषुम्णा मार्ग से
आती है और मेरे मन्त्र को, कण्ठस्थित विशुद्धचक्र का भेदन करके, सहस्रार में ले
जा रही है । वहाँ सहस्रकमल की कर्णिका पर नाद-बिन्दु संयुक्त मन्त्र के समस्त
अक्षर स्थित हैं एवं चैतन्यरूप मन्त्र शक्ति स्फुरित हो रही है । मन्त्र का प्रत्येक
अक्षर चैतन्यशक्ति से ही निर्मित एवं ग्रथित है—ऐसी भावना करके मन्त्राक्षरों को
नाभि में स्थित मणिपूरकचक्र पर लाना चाहिए । फिर वहाँ से वे वाणी में आ रहे
हैं—ऐसा मानकर चिद्रूप से उनका जप करना चाहिए ।
५. पिण्डस्थ षट्चक्रों के प्रत्येक पद्म दल पर वर्ण अंकित हैं । ये कमल
एवं उनके दल वर्णरूप ही हैं । ये वर्ण सृष्टि-क्रम के अनुसार समस्त पद्मदल पर
आते हैं एवं संहारक्रम से कुण्डलिनी शक्ति के द्वारा अपने मूलस्थान में विलीन कर
दिये जाते हैं । इसके अनन्तर उनकी पुनः दिव्यरूप में सृष्टि होती है । अपने मन्त्र
को जो कि चिच्छक्ति या कुण्डलिनी शक्ति से ध्वनित हो रहा है—वर्णाभाव से परे
चैतन्य रूप में स्थित अनुभव करना, षट्चक्रों का भेदन करके सनातन शब्द रूप
में (नाद-बिन्दु संयुक्त) चैतन्य से एक कर देना और पुनः उन्हीं जीवन्त, जाग्रत,
दीप्तिमान चेतन वर्णों की समष्टि से निर्मित मन्त्र का साक्षात्कार करना भी
मन्त्र-चैतन्य की एक पद्धति है ।
३१. मन्त्रार्थ—
मन्त्रार्थ-ज्ञान के बिना मन्त्र-जप करने वाला उस गधे के समान माना जाता है
जिसके ऊपर चन्दन लादा गया है किन्तु वह चन्दन की महिमा तो नहीं केवल
उसके बोझ को जानता है—
“अर्थमजानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
उपमेयश्वक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥"१
पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—की कामना करने वाले लोगों को मन्त्र के
अर्थों का परिज्ञान आवश्यक है । अर्थों के प्रति अनादर भाव रखने वालों के लिए
अर्थ (काम्यपदार्थ) की प्राप्ति तो नहीं किन्तु अनर्थ की प्राप्ति अवश्य होती है—
“पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थापरिज्ञेयाः ।
अथानादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥"२
आचार्य भास्कर ने तो मन्त्रार्थ के पन्द्रह प्रकारों का प्रतिपादन किया है और
उनकी विशद व्याख्या भी की है जो भावार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, समस्तार्थ,
निगर्भार्थ, शाक्तार्थ, सामरस्यार्थ आदि हैं ।
मन्त्र सामान्यार्थक वर्ण नहीं हैं । उनमें दिव्यशक्ति निहित है । मन्त्र इष्टदेवता
एवं इष्टदेवता के अनुग्रह के अपर पर्याय है । मन्त्र जिस अर्थ को सङ्केतित करता
१-२. भास्कराचार्य—'वरिवस्यारहस्यम्'
६८ वरिवस्यारहस्ये
है वहीं साधक को ले जाना भी चाहता है—यदि साधक उस गन्तव्य लक्ष्य से
अवगत हो जाय तो साधक को अपनी यात्रा में सुविधा हो जाती है ।
योगदर्शन में ‘मन्त्रार्थभावना’ को ही ‘जप’ की आख्या दी गई है और
इसीलिए कहा गया है—‘तज्जपस्तदर्थ भावनम् । ‘भावना देना’ आयुर्वेद में भी
विशेषार्थ में प्रयुक्त है ।
‘बीजमन्त्रों’ के कतिपय उदाहरण अर्थ सहित नीचे लिखे हैं—
१. ‘हौं’ = प्रसाद बीज । ‘ह’ = शिव । औकार = सदाशिव । ‘बिन्दु’ =
दुःख का हरण ।। ‘हौं’ बीज का अर्थ—‘‘शिव एवं सदाशिव की अनुकम्पा एवं
प्रसाद से मेरे समस्त दुःख नष्ट हो जायँ ।।’’
२. ‘ह्रीं’ = ‘ह’ = शिव । ‘र’ = प्रकृति । ‘ई’ = महामाया । ‘नाद’ =
विश्वाम्बा । ‘बिन्दु’ = दुःखहरण । इस शक्तिबीज या मायाबीज का अर्थ = ‘‘शिव
समवेत विश्वाम्बा महामाया शक्ति मेरे दुखों का नाश करें ।’’
३. ‘श्रीं’ = श = महालक्ष्मी । र = धन । ई = तुष्टि । नाद = विश्वजननी
लक्ष्मीबीज (श्रीबीज) का अर्थ = ‘‘धन-वैभव, तुष्टि-पुष्टि की अधिष्ठात्री माता
महालक्ष्मी मेरे दुःखों का नाश करें ।।’’
४. ‘‘क्लीं’’ = क = कृष्ण या काम । ल = इन्द्र । ई = तुष्टि । बिन्दु =
सुखप्रद । इस कृष्णबीज या कामबीज का अर्थ = मन्मथ-मन्मथ श्रीकृष्ण सुख एवं
शान्ति दें ।
५. ‘हूँ’ = ह = शिव । अ = भैरव । नाद = सर्वोत्कृष्ट । बिन्दु =
दुःखहारी ।। इस वर्मबीज या कूर्चबीज का अर्थ = श्रेष्ठतम असुरों के लिए भयङ्कर
भगवान शिव मेरे दुःखों का नाश करें ।
६. ‘क्रीं’ = क = काली । र = ब्रह्म । ई = महामाया । नाद =
विश्वजननी ।। बिन्दु = दुःखहारक ।। इस कालीबीज या कर्पूरबीज का अर्थ =
‘ब्रह्मशक्तिस्वरूपिणी महामाया काली माता मेरे दुखों का नाश करें ।।
७. ‘दूं’ = द = दुर्गा । अ = रक्षा । बिन्दु = करो ।। दुर्गाबीज (दूँ) का
अर्थ = ‘हे माँ दुर्गे ! मेरी रक्षा करो ।।’
८. ‘ऐं’ = ऐ = सरस्वती । बिन्दु = दुःख का हरण । सरस्वतीबीज =
‘देवी सरस्वती मेरे दुःखों का नाश करें’—यही अर्थ है सारस्वत बीज का ।
९. ‘ग्लौं’ = ग = गणेश । बिन्दु = दुःखहरण । औ = तेज । ल =
व्यापक । गणेशबीज का अर्थ—‘परमव्यापक ज्योतिर्मय भगवान गणेश मेरे दुःखों
का नाश करें ।।’
‘स्त्रीं’ = स = दुर्गोत्तरण । त = तारक । र = मुक्ति । ई = महामाया ।
नाद = विश्वमाता । बिन्दु = दुःखहरण । वधूबीज का अर्थ—‘‘दुर्गोत्तारिणी
भूमिका ६९
मुक्तिस्वरूपा, विश्वाम्बा भगवती महामाया मेरी दुखों से रक्षा करें ॥"
'गं' = ग = गणेश । बिन्दु = दुःखहारक । गणेशबीज का अर्थ—"भगवान्
गणेश मेरे दुःखों का नाश करें ॥"
'क्ष्रौं' = क्ष = नृसिंह । र = ब्रह्मा । औ = ऊर्ध्वदत्त । बिन्दु = दुःखहारी ।
इस नृसिंह बीज का अर्थ—"ब्रह्मस्वरूप, ऊर्ध्वदत्त भगवान नृसिंह दुःखों से मेरी
रक्षा करें ॥"
'हं' = आकाश । 'यं' = वायु । 'रं' = अग्नि । 'वं' = जल, अमृत । 'लं'
= पृथ्वी । 'मं' = चन्द्रमा । (एकाक्षरीकोष से अन्य शब्दार्थों का भी अर्थावगाहन
किया जा सकता है ।)१
३२. मन्त्रार्थ का वास्तविक स्वरूप एवं साधना-पद्धति२—
किसी भी मन्त्र का वास्तविक अर्थ तो केवल वही जान सकता है जिसे मन्त्र
एवं उस मन्त्र के देवता का साक्षात्कार हो चुका हो । 'सरस्वतीतन्त्र' में मन्त्रार्थ का
अवबोध एवं साक्षात्कार-प्राप्ति की निम्न पद्धति बताई गई है ।
१. साधक को चाहिए कि वह 'मूलाधारचक्र' में शुद्ध स्फटिक सङ्काश निर्मल
इष्टदेवता एवं मन्त्ररूप इष्ट विद्या का चिन्तन करें ।
२. अर्द्धमुहूर्तपर्यन्त ध्यान करके फिर 'नाभिचक्र' में इष्टदेवता एवं इष्टमन्त्र का
चिन्तन करे । यहाँ इष्टदेवता एवं इष्टमन्त्र का रङ्ग लाल रहेगा ।
३. इसके बाद दोनों का ध्यान मरकत मणि के स्वरूप में (हृदय में) करना
चाहिए । फिर इसी क्रम से विशुद्धादि चक्रों में ध्यान करते हुए सहस्रार में जाकर
दोनों तत्त्वों के एकीकृत होने का ध्यान करना चाहिए ।
४. जब साधक ध्यान करते-करते इतना तन्मय हो जाय कि स्वयं
मन्त्रदेवतात्मक ब्रह्म से पृथक न रह जाय तभी उसे मन्त्र के वास्तविक अर्थ का
ज्ञान प्राप्त हो पायेगा ।। इसीलिए भगवान् शङ्कर कहते हैं—
"ध्यानेन परमेशानि यद्रूपं समुपस्थितम् ।
तदेव परमेशानि मन्त्रार्थं विद्धि पार्वति ॥''३
३३. मन्त्रों का कुल्लुका—
मन्त्रों के जप के पूर्व उनकी कुल्लुका का ज्ञान भी आवश्यक है । जप के
पूर्व उस मन्त्र की कुल्लुका का मूर्द्धा में न्यास कर लेना चाहिए । कतिपय मन्त्रों
की कुल्लुकाएँ अगले पृष्ठ पर तालिका में दर्शायी गयी हैं—
अन्य देवों के अपने-अपने मन्त्र ही 'कुल्लुका' है ।
१. एकाक्षरी कोष २. साधना तन्त्र
३. सरस्वती तन्त्र
७० वरिवस्यारहस्ये
| देवता | मंत्र की कुल्लुका | देवता/मंत्र की कुल्लुका |
|---|---|---|
| तारा | ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं । | काली ॐ क्रीं हूं स्त्रीं ह्रीं फट । |
| छिन्नमस्ता | श्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं ह्रीं ह्रीं स्वाहा | वज्रवैरोचिनी ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं ह्रीं ह्रीं स्वाहा हूँ । |
| भैरवी | ह स रैं | त्रिपुरसुन्दरी—ॐ ऐं क्लीं ह्रीं त्रिपुरे भगवति स्वाहा अथवा क्लीं । |
| मञ्जुघोषा | ॐ अ र व च ल धीं | भुवनेश्वरी—ॐ ह्रीं । |
| विष्णु | ॐ नमो नारायणाय | मातङ्गी—ॐ ॐ ॥ |
| धूमावती | ॐ ह्रीं | षोडशी—ॐ स्त्रीं ॥ |
| लक्ष्मी | ॐ श्रीं | सरस्वती—ॐ ऐं ॥ |
| अन्नपूर्णा | ॐ क्रीं | शिव—ॐ हौं ॥ |
| ३४. मन्त्रसेतु— | ||
| मन्त्रों का सेतु—१. ब्राह्मण एवं क्षत्रियों के लिए—प्रणव २. वैश्यों के | ||
| लिए—'फट्' ३. शूद्रों के लिए—ह्रीं । जपारम्भ के पूर्व इसका हृदय में जप | ||
| आवश्यक है । | ||
| ३५. महासेतु— | ||
| जपारम्भ के पूर्व महासेतु का भी जप करना चाहिए । इसे करने से जापक | ||
| को सभी समय एवं सभी कालों में जप करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है । | ||
| इनका जप 'विशुद्धचक्र' (कण्ठस्थान) में करना चाहिए—त्रिपुरसुन्दरी का महासेतु— | ||
| 'ह्रीं', काली का 'क्रीं', एवं तारा का 'हूँ' है । अन्य सभी देवताओं का महासेतु | ||
| 'स्त्रीं' है । | ||
| ३६. निर्वाण— | ||
| इस पद्धति में साधक पहले प्रणव एवं इसके उपरान्त 'अ' आदि समस्त स्वर | ||
| वर्णों का उच्चारण करके तब अपना मन्त्र पढ़े । तदुपरान्त 'ऐं' एवं समस्त स्वर | ||
| वर्णों का और अन्त में प्रणव का जप करें । इस तरह सम्पुट करके इसका जप | ||
| 'मणिपूरक' चक्र में करना चाहिए । | ||
| ३७. मुख-शोधन— | ||
| मन्त्र जप के पूर्व मुख-शोधन भी अपरिहार्य है क्योंकि अशुद्ध जिह्वा से किया | ||
| गया जप हानि पहुँचाता है । जिह्वा पर स्थित मल—१. भोजन का मल २. मिथ्या | ||
| भाषण का मल ३. कलह का मलशोधन के पूर्व जिह्वा मन्त्रोच्चारण की |
भूमिका ७१
अधिकारिणी नहीं। मन्त्र जप के पूर्व दस बार मुख शोधन सम्बंधी मन्त्र-जप करना
चाहिए ।
३८. देवता एवं उनके मुखशोधन मन्त्र—
| देवता | मुखशोधन मंत्र | देवता | मुखशोधन मंत्र |
| त्रिपुरसुन्दरी — श्रीं ॐ श्रीं ॐ श्रीं ॐ | श्यामा — क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ॐ |
| तारा — ह्रीं हूँ ह्रीं । | ॐ क्रीं क्रीं क्रीं । |
| बगलामुखी — ऐं ह्रीं ऐं । | दुर्गा — ऐं ऐं ऐं । |
| लक्ष्मी — श्रीं । | मातङ्गी — ॐ ऐं ॐ । |
| धनदा — ॐ धूं ॐ । | धूमावती — ॐ । |
| विष्णु — ॐ हं । | गणेश — ॐ गं । |
अन्य देवताओं मात्र ॐ ही मुखशोधन का मन्त्र है । इसे मन्त्र जप के पूर्व
दस बार जप लेना चाहिए ।
३९. प्राणयोग—
यथा निष्प्राण शरीर निश्चेष्ट रहता है तद्वत प्राणहीन मन्त्र भी निश्चेष्ट रहता
है । माया बीज (ह्रीं) से संपुटित करके अपने मन्त्र का सात बार जप करना ही
प्राणयोग है ।
४०. दीपनी—
यथा दीपक का प्रकाश अंधकार दूर करके घर में रक्खी समस्त अंधकारावृत
वस्तुओं को प्रकाशित कर देती है उसी प्रकार दीपनी क्रिया से मन्त्र प्रकाश में आ
जाता है । जपारंभ के पूर्व स्वमन्त्र को प्रणव से सम्पुटित करके उसका सात बार
जप कर लेना चाहिए ।
४१. मन्त्रसिद्धि के अन्य उपाय—
श्रद्धा-विश्वास के साथ मन्त्रानुष्ठान करने पर भी मन्त्रसिद्धि न हो तो उसका
पुनः पुनः अनुष्ठान करना चाहिए तीन बार के अनुष्ठान से भी मन्त्र सिद्ध न हो
तो निम्न सात उपायों का अवलम्बन लेना चाहिए किन्तु एक साथ सातों क्रियाओं
का प्रयोग आवश्यक नहीं । एक करने पर मन्त्र सिद्ध न हो तो दूसरे का, दूसरे
से भी सिद्ध न हो तो तीसरे से, और इसी प्रकार चौथे, पाँचवें, छठवें एवं अन्त
में सातवें से ।
४२. मन्त्रसिद्ध के उपायों का नाम एवं साधन-प्रक्रिया—
इन उपायों का नाम है—१. भ्रामण, २. रोधन, ३. वश्य, ४. पीड़न,
५. पोषण, ६. शोषण, ७. दाहन ॥
७० वरिवस्यारहस्ये
| देवता | मंत्र की कुल्लुका | देवता/मंत्र की कुल्लुका |
|---|---|---|
| तारा | ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं । | काली ॐ क्रीं हूं स्त्रीं ह्रीं फट । |
| छिन्नमस्ता | श्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं ह्रीं ह्रीं स्वाहा | वज्रवैरोचिनी ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं ह्रीं ह्री स्वाहा हूँ । |
| भैरवी | ह स रें | त्रिपुरसुन्दरी—ॐ ऐं क्लीं ह्रीं त्रिपुरे भगवति स्वाहा अथवा क्लीं । |
| मञ्जुघोषा | ॐ अ र व च ल धीं | भुवनेश्वरी—ॐ ह्रीं । |
| विष्णु | ॐ नमो नारायणाय | मातङ्गी—ॐ ॐ ॥ |
| धूमावती | ॐ ह्रीं | षोडशी—ॐ स्त्रीं ॥ |
| लक्ष्मी | ॐ श्रीं | सरस्वती—ॐ ऐं ॥ |
| अन्नपूर्णा | ॐ क्रीं | शिव—ॐ ह्रौं ॥ |
३४. मन्त्रसेतु—
मन्त्रों का सेतु—१. ब्राह्मण एवं क्षत्रियों के लिए—प्रणव २. वैश्यों के
लिए—'फट्' ३. शूद्रों के लिए—ह्रीं । जपारम्भ के पूर्व इसका हृदय में जप
आवश्यक है ।
३५. महासेतु—
जपारम्भ के पूर्व महासेतु का भी जप करना चाहिए । इसे करने से जापक
को सभी समय एवं सभी कालों में जप करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है ।
इनका जप 'विशुद्धचक्र' (कण्ठस्थान) में करना चाहिए—त्रिपुरसुन्दरी का महासेतु—
'ह्रीं', काली का 'क्रीं', एवं तारा का 'हूँ' है । अन्य सभी देवताओं का महासेतु
'स्त्रीं' है ।
३६. निर्वाण—
इस पद्धति में साधक पहले प्रणव एवं इसके उपरान्त 'अ' आदि समस्त स्वर
वर्णों का उच्चारण करके तब अपना मन्त्र पढ़े । तदुपरान्त 'ऐं' एवं समस्त स्वर
वर्णों का और अन्त में प्रणव का जप करें । इस तरह सम्पुट करके इसका जप
'मणिपूरक' चक्र में करना चाहिए ।
३७. मुख-शोधन—
मन्त्र जप के पूर्व मुख-शोधन भी अपरिहार्य है क्योंकि अशुद्ध जिह्वा से किया
गया जप हानि पहुँचाता है । जिह्वा पर स्थित मल—१. भोजन का मल २. मिथ्या
भाषण का मल ३. कलह का मलशोधन के पूर्व जिह्वा मन्त्रोच्चारण की
भूमिका ७१
अधिकारिणी नहीं । मन्त्र जप के पूर्व दस बार मुख शोधन सम्बंधी मन्त्र-जप करना
चाहिए ।
३८. देवता एवं उनके मुखशोधन मन्त्र—
| देवता | मुखशोधन मंत्र | देवता | मुखशोधन मंत्र |
|---|---|---|---|
| त्रिपुरसुन्दरी | श्रीं ॐ श्रीं ॐ श्रीं ॐ | श्यामा | क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ॐ <br> ॐ क्रीं क्रीं क्रीं । |
| तारा | ह्रीं हूँ ह्रीं । | दुर्गा | ऐं ऐं ऐं । |
| बगलामुखी | ऐं ह्रीं ऐं । | मातङ्गी | ॐ ऐं ॐ । |
| लक्ष्मी | श्रीं । | धूमावती | ॐ । |
| धनदा | ॐ धूं ॐ । | गणेश | ॐ गं । |
| विष्णु | ॐ हं । | ||
| अन्य देवताओं मात्र ॐ ही मुखशोधन का मन्त्र है । इसे मन्त्र जप के पूर्व | |||
| दस बार जप लेना चाहिए । | |||
| ३९. प्राणयोग— | |||
| यथा निष्प्राण शरीर निश्चेष्ट रहता है तद्वत प्राणहीन मन्त्र भी निश्चेष्ट रहता | |||
| है । माया बीज (ह्रीं) से संपुटित करके अपने मन्त्र का सात बार जप करना ही | |||
| प्राणयोग है । | |||
| ४०. दीपनी— | |||
| यथा दीपक का प्रकाश अंधकार दूर करके घर में रक्खी समस्त अंधकारावृत | |||
| वस्तुओं को प्रकाशित कर देती है उसी प्रकार दीपनी क्रिया से मन्त्र प्रकाश में आ | |||
| जाता है । जपारंभ के पूर्व स्वमन्त्र को प्रणव से सम्पुटित करके उसका सात बार | |||
| जप कर लेना चाहिए । | |||
| ४१. मन्त्रसिद्धि के अन्य उपाय— | |||
| श्रद्धा-विश्वास के साथ मन्त्रानुष्ठान करने पर भी मन्त्रसिद्धि न हो तो उसका | |||
| पुनः पुनः अनुष्ठान करना चाहिए तीन बार के अनुष्ठान से भी मन्त्र सिद्ध न हो | |||
| तो निम्न सात उपायों का अवलम्बन लेना चाहिए किन्तु एक साथ सातों क्रियाओं | |||
| का प्रयोग आवश्यक नहीं । एक करने पर मन्त्र सिद्ध न हो तो दूसरे का, दूसरे | |||
| से भी सिद्ध न हो तो तीसरे से, और इसी प्रकार चौथे, पाँचवें, छठवें एवं अन्त | |||
| में सातवें से । | |||
| ४२. मन्त्रसिद्ध के उपायों का नाम एवं साधन-प्रक्रिया— | |||
| इन उपायों का नाम है—१. भ्रामण, २. रोधन, ३. वश्य, ४. पीडन, | |||
| ५. पोषण, ६. शोषण, ७. दाहन ॥ |
७२ वरिवस्यारहस्ये
१. 'भ्रामण'—वायुमन्त्र 'यं' द्वारा मन्त्र को ग्रथित करना चाहिए । यंत्र के
ऊपर एक वायुबीज एवं एक मन्त्राक्षर—इस क्रम से मन्त्र के समस्त अक्षरों को
सम्पुटित करके उसे शिलारस, कर्पूर, कुंकुम, खस एवं चन्दन मिलाकर उसी से
यन्त्र पर पूरा मन्त्र लिखना चाहिए । लिखित मन्त्र को दूध, घी, मधु एवं जल में
छोड़कर पूजा, जप एवं हवन करना चाहिए—मन्त्र शीघ्र सिद्ध होगा ॥
२. रोधन—वाग् बीज 'ऐं' द्वारा मन्त्र को सम्पुटित करके यथासाध्य जप
करने से रोधनक्रिया निष्पादित होती है ।
३. वशीकरण—अलक्तक, रक्तचन्दन, कुट, धतूरे का बीज एवं मैनशिल—
को एक में मिलाकर इसके द्वारा ही भोजपत्र पर अपना मन्त्र लिखकर गले में
धारण कर लेना चाहिए । यही है वशीकरण ॥
४. पीडन—अधरोत्तर योग से मन्त्र का जप करते हुए अधरोत्तर स्वरूपिणी
देवता की पूजा करनी चाहिए । फिर अकवन के दूध से मन्त्र लिखकर पैर से
दबाकर हवन करना चाहिए । यही है पीडन क्रिया ।
५. पोषण—मन्त्र के आदि एवं अन्त में 'स्त्रीं' मन्त्र जोड़कर जप करना
चाहिए एवं गाय के दूध से मन्त्र लिखकर हाथ में इसे पहनना चाहिए । इसी का
नाम है पोषण-क्रिया ।
६. शोषण—वायुबीज 'यं' के द्वारा मन्त्र को संपुटित करके जप करना एवं
यज्ञीय भस्म से भोजपत्र पर लिखकर गले में इसे धारण करना चाहिए । यही है
शोषण-क्रिया ।
७. दाहन—मन्त्र के प्रत्येक स्वर वर्ण के साथ अग्निबीज 'रं' जोड़कर जप
करना चाहिए एवं पलास बीज के तेल से मन्त्र लिखकर कंधे पर धारण करना
चाहिए । इसी क्रिया का नाम है—'दाहन' ॥
सातों प्रयोग एक साथ करना आवश्यक नहीं । एक करने से मन्त्र-सिद्धि न
होने पर ही अन्य साधन का उपयोग करना चाहिए ॥
'मन्त्र' का अर्थ है—'गुप्त परामर्श' ॥ 'मन्त्र' दिव्य परामर्श है ।
४३. गोपनीयता—
मन्त्र का अभिधेयार्थ ही है गुप्त परामर्श अतः मनन करने से वह त्राण करने
के अपने शब्दार्थ को तभी सिद्ध कर पायेगा जब उसे गोपनीय रक्खा जाय ॥
भगवान् शिव कहते हैं कि मन्त्र-जप से सिद्धि तो अवश्य मिलेगी किन्तु गोपनीयता
रखने पर ही—
(क) जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्न संशयः ॥ किन्तु—
(ख) गोपनीयं गोगपनीयं गोपनीयं मातृजारवत ॥ (अरब के साधकों ने इसे ही
'खिल्वतदर अञ्जुमन' कहा है ॥)
भूमिका ७३
(ग) 'मन्त्र कुरहिं जब करउ दुराऊ' (तुलसीदास)
(घ) 'तस्मात मन्त्रं महासेन रहस्यं न प्रकाशय ।' (वातुला० तन्त्र)
४४. सूतकोद्धार—
मन्त्र में सूतक—१. जातसूतक २. मृतसूतक । इन दोनों अपवित्रताओं का
दूरीकरण से ही मन्त्र-सिद्धि की संभावना है अन्यथा नहीं ।
सूतकोद्धार हेतु—जपारंभ के समय सबसे पूर्व १०८ बार (या कम से कम)
सात बार प्रणव से संपुटित करके अपने इष्ट मन्त्र का जप कर लेना चाहिए ।
योनिमुद्रा का अनुष्ठान भी कर लेना चाहिए ।
इसके विकल्प में 'भूतलिपि' का प्रयोग है । उसके द्वारा अनुलोम विलोम
संपुटित करके मन्त्र जप करने से भी मन्त्र शीघ्र सिद्ध होता है ।
४५. भूतलिपि का क्रम—
'अ इ उ ऋ लृ ए ऐ ओ औ ह य र व ल ङ क ख घ ग ञ च छ झ
ज ण ट ठ ढ ड न त थ ध द म प फ भ ब श ष स'—इनको पढ़कर फिर
इष्टमन्त्र एवं फिर—स ष श ब भ फ प म द ध थ त न ड ढ ठ ट ण ज झ
छ च ञ ग घ ख क ङ ल व र य ह औ ओ ऐ ए लृ ऋ उ, इ अ ॥'—
इसका एक मास तक जप करना चाहिए । ऐसा करने से—मन्त्रजागरण । इसको
करने से पूर्व एवं इसके पश्चात् ३-३ प्राणायाम कर लेना चाहिए ॥ चार मन्त्रों से
पूरक, सोलह मन्त्रों से कुंभक एवं आठ मन्त्रों से रेचक किया जाना चाहिए । जप
पूरा होने पर उसे ज्योतिस्वरूप में कल्पित करके इष्टदेव के दाहिने हाथ में जप
समर्पण कर देना चाहिए । देवीमन्त्र हो तो उस जप को बाएँ हाँथ में समर्पित
करना चाहिए । अनुष्ठान के अन्त में प्रतिदिन जप का दशांश हवन, हवन का
दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश अभिषेक एवं यथाशक्ति ब्राह्मणभोजन कराना
चाहिए । होम, तर्पण आदि में से जो अङ्ग पूरा न किया जा सके उसके लिए भी
जप कर लेना चाहिए । होम न कर सकने पर—(ब्राह्मण)—होम की संख्या से
चौगुना, (क्षत्रिय) छ गुना, (वैश्य) अठगुना जप करें । नारी भी वैश्यवत अठगुना
जप करें । (शूद्र) होम की संख्या से दसगुना (किन्तु यदि अन्य वर्ण के आश्रित
हो तो उस आश्रयदाता के लिए निर्दिष्ट संख्यानुसार) जप करणीय है । (अर्थात्
एक लाख का अनुष्ठान हो तो होम हेतु भी एक लाख जप करना होगा ।)
('योगिनीहृदय' के अनुसार—ब्राह्मण हेतु—होमसंख्या का दुगुना, क्षत्रियों के
लिए—तिगुना, वैश्यों के लिए चौगुना एवं शूद्रों के लिए पंचगुना जप उचित है ।)
४६. अनुष्ठान के पाँच अङ्ग हैं—'१. जप, २. होम, ३. तर्पण, ४.
अभिषेक, ५. ब्राह्मण भोजन । होम, तर्पण, अभिषेक न कर सकने पर केवल
ब्राह्मणों के आशीर्वाद से भी काम चल सकता है । नारियों के लिए तो ब्राह्मण
भोजन उतना आवश्यक भी नहीं । उन्हें न्यास, ध्यान, और पूजा की छूट है ।
७४ वरिवस्यारहस्ये
जपमात्र से ही उनके मन्त्र सिद्ध हो जाते हैं । अनुष्ठान में दीक्षित ब्राह्मणों को
खिलाना चाहिए । अनुष्ठान के पूरा होने पर गुरु, गुरुपुत्र, गुरुपत्नी या उनके
वंशजों को दक्षिण देनी चाहिए ।।
४७. गुरुतत्त्व—
साधना-जगत् में सिद्धि प्राप्त करने हेतु गुरु परमावश्यक है क्योंकि—'गुरु की
जै गहिला, निगुरा न राहिला गुरु बिन ज्ञान न पारलारे भाइला ।।'¹ 'गुरु' मन्त्र,
देवता, यन्त्र, मन्त्राक्षर, त्रिदेव एवं सभी मांत्री शक्तियों से तादात्म्य रखता है ।
उसकी कृपा से ही मन्त्र अपने को प्रकट करते हैं । इसीलिए कहा गया है कि—
'मन्त्रे चाक्षरबुद्धिस्स्याद गुरौ तु मानवः प्रिये । देवतायाः वरारोहे प्रतिमा बुद्धिस्तु
जायते । किं तस्य जपपूजायां सर्वं व्यर्थं कदर्थनम् ।।'² 'तारारहस्य' में कहा गया है
कि सर्वप्रथम ब्राह्ममुहूर्त बेला में उठकर 'योषदर्शन' (ज्योतिदर्शन) करके
स्वस्तिकासनस्थ उत्तराभिमुखी बैठकर अपने शिर में द्वादशार्णसरसीरुहोदरसहस्रदल-
कमलावस्थित श्वेतवर्ण, नानालङ्काराभूषित सद्गुरु को अपने वाम भाग में आसीन
रक्तवर्ण शक्ति से सुशोभित रूप में देखते हुए मानस पूजा करके 'ऐं' (वाग्भव
मन्त्र) का १०८ बार जप करके एवं जप समर्पित करते हुए निम्न मन्त्र कहे—
“ॐ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे
नमः ।।” 'नाभिस्थल पर हाथ रखकर सहस्रार में शक्ति समन्वित सद्गुरु शिव का
ध्यान करना चाहिए—'स्वनाभौ दक्षिणे हस्ते वामहस्तं प्रदापयेत् । भावयेच्च सहस्रारे
श्रीगुरुं शक्तियुक्तकम् ।।'
'गुरु' सिद्धिप्रद, पाप-दाहक, शंभुस्वरूप एवं त्रितयात्मा है इसीलिए 'गुरु'
कहलाता है । 'शाक्तानन्दतरंगिणी' में कहा गया है—'गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेफः
पापस्य दाहकः । उकारः शंभुरित्युक्त स्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ।। 'शाक्तानन्द तरंगिणी'
में ब्रह्मानन्द गिरि पुनः कहते हैं कि “गुरुः सर्वसुराधीशो” अर्थात् गुरु समस्त
देवताओं का स्वामी है अतः तीनों संध्याओं में गुरु का ध्यान, गुरु का पूजन एवं
गुरु का भावन, किया जाना चाहिए—
“त्रिसंध्यं श्रीगुरोर्ध्यानं त्रिसंध्यं पूंजनं गुरोः ।
त्रिसंध्यं भावयेन्नित्यं गुरुं परमकारणम् ।।” (शाक्तानन्दतरंगिणी)
४८. भावतत्त्व—
शास्त्रों में भावत्रय का वर्णन किया गया है जो निम्न है—१. 'पशुभाव', २.
'वीरभाव', ३. 'दिव्यभाव' ।। 'भाव' का द्वितीय अर्थ है—प्रेम, भक्ति एवं
निष्ठा-सङ्कलित एकनिष्ठ आराधना (उपासना) ।। बिना भाव के पूजा एवं मन्त्रजप
व्यर्थ है क्योंकि—'न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे च पार्वति । भावेषु विद्यते देवि !
भावो मोक्षस्वरूपकम् । दिव्यभावो वीरभावः सदैव सहसा भवेत् । अन्यथा पंचलापांगि
पशुभावमयः सदा ।। स्वभावेन विनादेवि ! कथं सिद्धिर्भवेत् प्रिये ।।'³ बिनाभाव का
१. गोरक्षनाथ २-३. कामधेनु तन्त्र
भूमिका ७५
जप कोटि बार भी क्यों न अनुष्ठित किया जाय किन्तु वह सिद्ध नहीं होता प्रत्युत्
नरक ले जाता है—'भावतत्त्वं विनादेवि प्रजपेद् यदि कोटिधा। सर्वतस्य वृथा देवि !
नरकें च पदे पदे ॥" भाव-शून्य गुरु भी पशु है—"स कथं चञ्चलापांगि
दिव्यवीरगुरुर्भवेत् । पशुवत सर्वदा देवि स एव पशु गुरुः प्रिये ।"१ भावों में
आद्यभाव (दिव्यभाव) सर्वसिद्धिप्रद है—किन्तु 'वीरभाव' मध्यम एवं 'पशुभाव'
अतिनिन्दित है । यदि भाव न हुआ तो न्यास विस्तार, भूत शुद्धिप्रस्तार एवं
पूजनादि सभी व्यर्थ हैं । इन साधनाओं का कोई फल नहीं मिलता ॥२
४९. वर्णों की शक्त्यात्मकता एवं देव्यात्मकता—
मन्त्रशास्त्र यह मानता है कि वर्ण अचिन्त्य शक्ति सम्पन्न हैं—ये मूलतः
कुण्डलिनी शक्ति की ध्वन्यात्मकाभिव्यक्तियाँ हैं—शक्ति के नादात्मक स्वरूप का
प्रकाशन हैं । मन्त्र त्रिपुरसुन्दरी का मूर्तिमान वर्णविग्रह हैं—१. भगवत्याः स्वरूपं तु
पञ्चाशद्वर्णात्मिका मातृकैव । सेयं पञ्चाशद्वर्णात्मिका मातृकाऽष्ट वर्गात्मिका भवति ।
एवमष्ट वर्गात्मिका भगवती मातृका त्रिपुरसुन्दरी ।।" (लक्ष्मीधर) ।।
५०. मन्त्र-साधना के लिए उपयुक्त स्थान—
सिद्धपीठ, पुण्यक्षेत्र, नदीतट, गुहा, पर्वतशिखर, तीर्थ, सङ्गम, पवित्र जङ्गल,
एकान्तोद्यान, बिल्ववृक्ष, उपत्यका, तुलसीकानन, गोशाला, देवालय, अश्वत्थ वृक्ष,
आमलक वृक्ष के नीचे, पानी में मन्त्रानुष्ठान अधिक प्रशस्त है । सूर्य, अग्नि, गुरु,
चन्द्रमा, दीपक, जल, ब्राह्मण एवं गौओं के सामने बैठकर जप करना प्रशस्त है ।
श्रेष्ठतम स्थान वही है जहाँ बैठकर जप करने से चित्त की एकाग्रता बढ़ सके ।
स्थान की दृष्टि से—दस गुना गोष्ठ, सौ गुना जङ्गल, हजारगुना तालाब, लाख गुना
नदीतट, कोटिगुना पर्वत, अरबों गुना शिवालय, एवं अनन्त गुना गुरु का सन्निधान
श्रेष्ठतर है । यह भी सही है कि—
'जिह्वादग्धा परान्नेन मनोदग्धं परस्त्रिभिः ।'
५१. मन्त्र जप के समय निषिद्ध-कार्य—
आलस्य, जँभाई, निद्रा, छींक, थूकना, डरना, अपवित्र अङ्ग का स्पर्श,
क्रोध, मध्य में बातें करना, जप में जल्दीबाजी करना, विलम्बपूर्वक जप, गाकर
जप, सिर हिलाना, लिखित मन्त्र पढ़ना, मन्त्र का अर्थ न जानना, बीच-बीच में
मन्त्र भूल जाना, इष्ट-देवता-मन्त्र एवं गुरु को पृथक्-पृथक् मानना निषिद्ध कार्य है ।
५२. मन्त्र-जप के समय आवश्यक नियम—
भूमिशयन, ब्रह्मचर्य, मौन, गुरुसेवन, त्रिकालस्नान, पापकर्म परित्याग, नित्य
पूजा, नित्यदान, देवता की स्तुति एवं कीर्तन, नैमित्तिक पूजा, इष्टदेव एवं गुरु में
विश्वास, जपनिष्ठा ।
१. कामधेनु तन्त्र
२. ज्ञानानन्द परमहंस—'कौलावली निर्णय'
७६ वरिवस्यारहस्ये
५३. मन्त्र-जप के समय त्याज्य कर्म—
व्रात्य, नास्तिक, पतित आदि से संभाषण, उच्छिष्ट मुख से वार्तालाप,
असत्यभाषण, कुटिलभाषण, अनुष्ठान के समय-शपथ लेना, पहनने का वस्त्र
ओढ़कर जप करना, बिना आसन के जप करना, बिना माला ढके या सिर ढककर
जप करना, चलते या खाते समय जप करना, जूता पहनकर, पैर फैलाकर जप
करना आदि निषिद्ध कार्य हैं। शास्त्रकारों ने अन्त में यह निर्णय किया कि—
“अशुचिर्वा शुचिर्वा गच्छंस्तिष्ठन स्वपन्नपि । मन्त्रैकशरणो विद्वान् मनसैव
सदाभ्यसेत् । न दोषो मानसे जाप्ये सर्वदेशेऽपि सर्वदा ॥
५४. जप की श्रेष्ठता का तारतम्य—
पद्मपुराण एवं नारदपुराण में कहा गया है कि—समस्त यज्ञ वाचिक जप की
तुलना में सोलहवें हिस्से के बराबर हैं । वाचिक जप से सौ गुना उपांशु एवं
सहस्रगुना मानस जप श्रेष्ठतर है । 'मानस जप' = जिसमें अर्थ-चिन्तन करते हुए
मन से ही मन्त्र के वर्ण, स्वर एवं पदों की बार-बार आवृत्ति की जाती है । तीनों
जपों में इष्ट का चिन्तन आवश्यक है । स्तोत्र का मानसिक पाठ, या जोर-जोर से
मन्त्र-जप दोनो निषिद्ध हैं । गौतमीतन्त्र में कहा गया है—केवल वर्णों के रूप में
मन्त्र की स्थिति उसकी जड़ता एवं पशुता है । सुषुम्णा द्वारा उच्चारित होने पर
उसमें शक्ति-सञ्चार होता है । प्रथम भावना यह करनी चाहिए कि मन्त्र का एक-एक
अक्षर चिच्छक्ति से ओत-प्रोत है एवं परम् अमृतरूप चिदाकाश में उसकी स्थिति
है। इस भावना के साथ किया गया जप, होम आदि के बिना ही सिद्ध हो जाते
हैं। प्राणबुद्धि से सुषुम्णा के मूलदेश में स्थित जीवरूप से मन्त्र का चिन्तन करके
मन्त्रार्थ एवं मन्त्र-चैतन्य के साथ जप करना चाहिए ।। 'कुलार्णवतन्त्र' में कहा गया
है कि—मन एक स्थान पर, शिव दूसरे स्थान पर, शक्ति तीसरे स्थान पर, एवं
प्राण चौथे स्थान पर होने पर भला मन्त्रसिद्धि कैसे हो?
५५. मांत्री-दीक्षा एवं मन्त्राधिकार—
कौन सा मन्त्र किस साधक के अनुकूल है तथा साधक किस मन्त्र को ग्रहण
करने का अधिकारी है इस सम्बंध में निम्न कसौटियाँ हैं—१. कुलाकुल चक्र, २.
राशिचक्र, ३. नक्षत्र चक्र, ४. अकडम चक्र, ५. अकथह चक्र, ६. ऋणि-धनि
चक्र । (स्थानाभाव के कारण इन पर विस्तार से प्रकाश डालना संभव नहीं है ॥)
५६. जप के प्रकार—
जप के अनेक प्रकार हैं यथा—१. 'वाचिक', २. 'उपांशु', ३. 'मानस' ।
आचार्य अभिनवगुप्त कहते हैं—'आत्मा न शृणुते यं स मानसो जप उच्यते ।
आत्मना शृणुते यस्य तमुपांशु विजानते ॥” (तन्त्रालोक) । नित्य, नैमित्तिक,
प्रायश्चित, भ्रामरी आदि अनेक जप होते हैं । 'वज्रजप' = प्राणवायु के शासन के
द्वारा, वायु को मध्यममार्ग में प्रविष्टकर चक्रों का भेदन किया जाता है और
'उष्णीश चक्र' में वायु पहुँचाकर योगी 'खसमावस्था' को प्राप्त होता है । प्राणवायु
के इस शासन को ही 'वज्रजप' कहा गया है । मात्र शब्दों का उच्चारण जप नहीं
है । प्राणवायु के अनुशासन की क्रिया के साथ-साथ जो जप किया जाता है । वही
फलप्रद जप है । यही है तान्त्रिक बौद्ध दृष्टि ॥ बौद्ध तान्त्रिक मन्त्रों के प्रकारों
में—ग्रथन मन्त्र, विदर्भमन्त्र, सम्पुटमन्त्र, रोधनमन्त्र, योग एवं पल्लवमन्त्र 'अभिचार'
से सम्बद्ध रखते हैं । क्रिया के तीन रूप हैं—१. वर्ण, २. मन्त्र, ३. पद ।
'मन्त्र' साक्षात् पराशक्तिस्वरूप हैं । पराशक्ति वाणी के रूप में स्फुरित होती
है अतः मन्त्रों के द्वारा सूक्ष्मा, सर्वातीता सत्ता या परावाक् (ओंकार) ही व्यक्त होता
है इसीलिए मन्त्रों में अचिन्त्यशक्ति मानी जाती है—'मन्त्राणामचिन्त्यशक्तिता ।'
('परशुरामकल्पसूत्र' सूत्र ८) । 'मन्त्र' किसी वर्ण का उच्चारण मात्र नहीं है प्रत्युत्
यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें गुरु, मन्त्र, देवता, मन आत्मा एवं प्राणवायु की
एकता स्थापित की जाती है । इस ऐक्य की अवस्था में ही मन्त्रोच्चारण होता है
अतः मन्त्र के साथ 'ध्यान' मिला रहता है । यह एकता 'भावना' से सिद्ध होती
है । भावना-शून्य मन्त्र जप निष्फल होता है । 'मन्त्र' नादात्मक होता है । इस
नाद का अनुसंधान ही शाक्त-साधना का लक्ष्य है । 'यौवनोल्लास' में अजपाजप,
'प्रौढोल्लास' में मानसजप एवं 'तदन्तोल्लास' में वाराहीमन्त्र का जप किया जाता है।
मन्त्र के दो भेद हैं—१. 'बीज' २. 'पिण्डात्मक' । प्रत्येक श्वास के साथ सहजगति
से सोऽहं-सोऽहं का जप ही 'सहजजप' है । यही है—'कालध्वा' या 'प्राणध्वा' ।
यंत्र एवं यंत्रोपासना भी मन्त्र-साधना का एक अङ्ग है । इसके बिना मन्त्र का
आराध्य देवता प्रसन्न नहीं होता—'विना यन्त्रेण पूजायां देवता न प्रसीदति ।'२
५७. 'यंत्र'—
'यंत्र' मन्त्र एवं देवता का रेखात्मक चित्रण है । यह ब्रह्माण्ड का संक्षिप्त
संस्करण है । 'यंत्र' मन्त्र की बाह्य अभिव्यक्ति है । 'यंत्र' देवता का विग्रह है ।
'यंत्र' देवता का आसन है । 'यंत्र' समस्त विश्व का एक ज्यामितीय रेखाचित्र है ।
'यंत्र' देवता का शरीर है । इसी कारण यंत्र को माध्यम बनाकर उसके द्वारा मन्त्र
के वाच्य(देवता) को व्यक्त करने की साधना की जाती है । इसीलिए कहा है—
'विना यन्त्रेण पूजायां देवता न प्रसीदति । सर्वेषामपि देवानां यंत्रे पूजा प्रशस्यते ॥'२
५८. 'ध्यान'—
मन्त्र-साधना का एक अपरिहार्य अङ्ग 'ध्यान' है क्योंकि मन्त्र-साधना का लक्ष्य
है देवता का साक्षात्कार । यह देवता ही मन्त्र का अर्थ है । “तज्जपस्तदर्थभावनम्"
कहकर योगसूत्रकार महर्षि पतञ्जलि ने भी इसकी पुष्टि की है । इसीलिए ब्रह्मानन्द
गिरि कहते हैं—
"आदौध्यानं ततो मन्त्रं ध्यानस्यान्ते मनुं जपेत् ।
ध्यान मन्त्र समायुक्तः शीघ्रं सिध्यति साधकः ॥"३
१-३. शाक्तानन्द तरंगिणी
७८ वरिवस्यारहस्ये
जिस मन्त्र का जो देवता है उसके आकार का स्मरण करते हुए—अर्थात्
देवाकार का ध्यान करते हुए—मन से जप करना चाहिए—
'यस्य यस्य च मन्त्रस्य उद्दिष्टा या च देवता ।
चिन्तयित्वा तदाकारं मनसा जपमाचरेत् ॥' १
५९. देवता—
प्रत्येक 'मन्त्र' वाचक है और वाच्य है 'देवता' । 'देवता' मन्त्र का अर्थ है ।
'तज्जपस्तदर्थ भावनम्' (यो०सूत्र) के दो अर्थ हैं—
(क) अभीष्ट देवता के मन्त्र का अर्थ-भावन ।
(ख) अभीष्ट मन्त्र के अर्थ (अर्थात् मन्त्र के देवता) का भावन ।
'वरिवस्यारहस्यम्' एवं भास्करराय का देवता भगवती त्रिपुरसुन्दरी हैं और
उनका 'यंत्र' श्रीचक्र है । 'त्रिपुरसुन्दरी' कौन हैं?
सहस्रदल कमल के मध्य स्थित जो चन्द्रमण्डल या बैन्दवस्थान है उसकी
चिन्मयी एवं आनन्दरूपा कला ही आत्मा कही जाती है और उसे ही 'त्रिपुरसुन्दरी'
कहते हैं । इस चन्द्रमा की प्रथमाकला प्रतिपदा है । यह प्रतिपदा की कला ही
त्रिपुरसुन्दरी कला है ।
'सुन्दरी' की उपासना की दो पद्धतियाँ हैं—१. 'बहिर्याग', २. 'अन्तर्याग' ।
आचार्य भास्कर ने वरिवस्यारहस्यम् में मन्त्रजप को श्रेष्ठतम माना है । भगवती
त्रिपुरा के तीन रूप हैं—१. 'स्थूल', २. 'सूक्ष्म', ३. 'पर' । 'अन्तर्याग' भी
त्रिविध है—१. 'सकल' २. 'सकल निष्कल', ३. 'निष्कल' । ('सेतुबंध' पृ० ५)
मन्त्र-जप को भास्कर ने श्रेष्ठतम साधना स्वीकार किया है । 'याग' द्विविध है । ये
दोनों साधना-पद्धतियाँ हैं । 'बहिर्याग'—'बहिर्यागः पात्रासनादि शान्तिस्तवन्तः कर्म-
समूहः । 'अन्तर्याग'—अन्तर्यागो नामाधाराद्ब्राजदन्तान्तं तेनस्तन्तोर्विभावनम् । मानसी
देवपूजा वा । ('सौभाग्यभास्कर' पृ० ५)
नादात्मक मन्त्र-साधना—श्वास-प्रश्वास अन्तर्मुख होकर 'नाद' में परिणत हो
जाते हैं । नाद के साथ प्राणायाम करने से इष्टमन्त्रोच्चार द्वारा मन्त्र क्रमशः नादमय
हो जाता है । प्राणवायु का नाद के आंकार में परिणत होकर क्रमशः बिन्दु में
स्थिति-लाभ करने से मन्त्रसिद्धि होती है । नादमय मन्त्र ही जाग्रत मन्त्र है । जप
का मन्त्र नादात्मक है । ब्रह्म के दो रूप हैं—१. 'शब्द', २. 'ज्योति' । 'नाद'—
इष्टमन्त्र का स्फुरण । 'ज्योति'—इष्टमूर्ति का आविर्भाव ।
त्रिपुरसुन्दरी का स्वरूप—देवी मूलमन्त्र, कूटत्रय एवं कुलामृत हैं । वे
मूलाधारैकनिलया, ब्रह्मग्रंथिविभेदिनी, मणिपूरान्तरुदिता, विष्णुग्रन्थिविभेदिनी, आज्ञा-
चक्रान्तरालस्था, रुद्रग्रंथिविभेदिनी सहस्राम्बुजारूढा एवं सुधासाराभिवर्षिणी हैं—
'मूलाधारैकनिलया ब्रह्मग्रंथिविभेदिनी । मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रंथिविभेदिनी । आज्ञा-
१. शाक्तानन्द तरंगिणी
भूमिका ७९
चक्रान्त रालस्था रूद्रग्रंथिविभेदिनी । सहस्राम्बुजारूढा सुधासाराभिवर्षिणी ।।' वे
'षट्चक्रों परिसंस्थिता महाशक्ति कुण्डलिनी' भी है । वे जगन्माता हैं । वे जगदात्मा
हैं । भास्करराय इन्हीं ललिताम्बिका राजराजेश्वरी महात्रिपुरसुन्दरी के उपासक थे । वे
कहते हैं— 'दयतां देशिकात्मा मे देवि श्रीललिताम्बिका । भगवती ललिता विश्वविग्रहा,
सर्वदेवात्मिका, सर्ववर्णात्मिका एवं मन्त्रात्मिका हैं ।
६०. यन्त्र—
'श्रीचक्र' — 'श्रीचक्र' नवयोन्यात्मक है । इसकी ९ योनियाँ, निम्न हैं—१.
'मध्यत्रिकोण', २. 'अष्टार', ३. 'अन्तर्दशार', ४. 'बहिर्दशार', ५. 'चतुर्दशार', ६.
'अष्टदलपद्म', ७. 'षोडशदलपद्म', ८. 'वृत्तत्रय', ९. 'भूपूर' ।। इनमें अधोमुख ५
त्रिकोण 'शक्तित्रिकोण' एवं ४ त्रिकोण ऊर्ध्वमुख एवं 'शिवत्रिकोण' कहलाते हैं ।
'संहारक्रम' में 'शक्तित्रिकोण', 'ऊर्ध्वमुख' एवं 'शिवत्रिकोण' अधोमुख हो जाते हैं
तथा 'सृष्टिक्रम' में इसके विपरीत रहते हैं । उपर्युक्त त्रिकोणों में प्रथम ५ त्रिकोण
'शक्तिचक्र' एवं अन्तिम चार चक्र 'शिवचक्र' कहलाते हैं ।
'षोडशदल पद्म'—चन्द्रमा की षोडशकलाएँ एवं मध्य त्रिकोण 'मूलाधार' हैं,
अष्टार 'स्वाधिष्ठानं हैं, अन्तर्दशार 'मणिपूर' है एवं बहिर्दशार 'अनाहतचक्र' है ।
'विशुद्धचक्र'—अन्तर्दशार का प्रतिनिधि है । 'आज्ञाचक्र' शिव का स्थान (शिवचक्र)
'बैन्दवगृह' है । 'सूर्यखण्ड', 'सोमखण्ड' एवं 'अग्निखण्ड' के साथ पिण्डगत
षट्चक्रों एवं यंत्र के नौ चक्रों के साथ अभेद है । भूपूर 'सहस्रार' है एवं वृत्तत्रय
'बैन्दवस्थान' (सहस्रारस्थ चन्द्र-स्थान) हैं ।
६१. भोजन—
चन्द्रसूर्याग्निरूपिणी कुण्डलिनी को मूलाधार से आजिह्वान्त विभावित करके
शोधित भोज्य पदार्थों को जीभ के समक्ष देवी को प्रतिग्रास समर्पित करे । इससे
मन्त्र-सिद्धि होती है—क्योंकि 'भुज्यते कुण्डलीदेवी इति ः चिन्तापरोहि यः ।
मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य ज्ञानसिद्धिर्नचान्यथा ।।' ('मातृकाभेद तन्त्र') ।।
६२. 'अहंपरामर्श'—
अभिनवगुप्ताचार्य 'तन्त्रालोक' में कहते हैं कि, 'अ' एवं 'ह' ('अहं')
अहंपरामर्शात्मक हैं । इन दोनों से रहित और इनकी रहस्यात्मकता के ज्ञान से
रहित कोई भी मन्त्र सिद्ध नहीं होता प्रत्युत् व्यर्थ हो जाता है यथा शरद ऋतु का
बादल—'आदिमान्त्यविहीनास्तु मन्त्राः स्युः शरदभ्रवत्'
“आदिमोऽनुत्तरः, अन्त्योहकारः, तेन मन्त्रा अपि अहंपरामर्शरूपा
भ्यामादिमान्त्याभ्यां विहीनाः तद्रूपत्वेनापरिज्ञायमानाः शरदभ्रवत् स्युः अकिंतकरा
एवेत्यर्थः ।।"
कहा भी गया है—'आदिमान्त्यविहीनास्तु मूलयोनिमजा नतः । न ते सिद्धिकरा
मन्त्रा निष्फलाः शरदभ्रवत् । खपुष्पं निष्फलं यद्वच्छशकस्य विषाणकम् । वन्ध्यायाः
६ वरि. भू.
८० वरिवस्यारहस्ये
प्रसवो देवि क्लीबस्य द्रवमेव च । अग्निमुक्ता यदा विप्रास्तदा एते तु निष्फलाः ।
आदिमान्त्य विहीनानि मन्त्राणि च तथैव च । निष्फलानि भवन्त्येवं पिबतो
मृगतृष्णिकाम् ।¹
अहं परामर्शात्मक मन्त्र सभी लक्ष्यों की पूर्ति करने में समर्थ होते है—आचार्य
अभिनवगुप्त कहते है—"एतद्रूप परामर्शकृत्रिम मनाविलम् । अहमित्याहुरेषैव
प्रकाशस्य प्रकाशता । एतद्वीर्यं हि सर्वेषां मन्त्राणां हृदयात्मकम् । विनानेन जडास्ते
स्युर्जीवा इव बिना हृदा । अंकृत्रिमै तद्धृदया रूढो यत्किंचिदाचरेत् । प्राण्याद्वा
विमृशेद्रापि स सर्वोऽस्य जपो मतः ॥"²
वही गुरु भी है जो अहमात्मक परामर्श का ज्ञाता हो—
"गुरोर्लक्षणमेतावदादिमान्त्यं च वेद्येत् ।
पूज्यः सोऽहमिव ज्ञानी भैरवोदेवतात्मकः ॥"³
६२. 'मन्त्र' और कुण्डलिनी—
सारे मन्त्रों का मूल भगवती कुण्डलिनी है । वे परममन्त्र (मन्त्राधिराज) या
मूलमन्त्र ओंकार का स्वस्वरूप हैं । सारे वर्ण, सारे मन्त्रों के नाद, सारे मन्त्र, सारे
देवता, सारे पीठ, सारी वाणियाँ कुण्डलिनी के शरीर में ही स्थित हैं । 'मूलमन्त्र'
भगवती कुण्डलिनी अपने 'परावाक्' या 'शब्दब्रह्म' का स्वस्वरूप है । वे ही
जगज्जननी भी हैं और मातृका भी, वे ही नाद भी है और मन्त्र भी । वे ही
(मन्त्ररूप) वाचक भी है और वाच्य भी ।
[चित्र-विवरण:]
(दाहिनी ओर के विवरण:)
'महामन्त्रात्मिका कुण्डलिनी' ('विमर्श' शक्ति)
'प्रकाश' (सहस्रारस्थ परमशिव)
मूलमन्त्र (ओंकार)
देवी मातृका भी हैं—
'पराशक्तिस्तु मातृका' (यो०ह०)
वे मन्तरूपिणी भी हैं—
'ज्ञातृ ज्ञान मयाकार मननान्मंत्ररूपिणी' (यो०ह०)
(चित्र के भीतर वृत्त-स्तर:)
ॐ ॐ ॐ
परावाक् शब्दब्रह्म
ॐ ॐ ॐ
पश्यन्तीवाक्
मध्यमावाक्
वैखरीवाक्
(बाईं ओर के विवरण:)
ॐ
↓
पश्यन्ती
↓
मध्यमा
↓
वैखरी
'देवीं मन्त्रमयीं नौमि मातृका पीठरूपिणीम् ॥'
१. 'विवेक' में उद्धृत २. तन्त्रालोक (४।१९२-१९४)
३. तन्त्रालोक
भूमिका ८१
६३. वर्णात्मक 'मन्त्र' एवं ध्वन्यात्मक 'मन्त्र'—
'मन्त्र' के दो रूप हैं—१. वर्णात्मक, २. ध्वन्यात्मक ॥ वर्णात्मक नाम
(मन्त्र) वे हैं जो बोले जा सकते हैं, सुने जा सकते हैं, जपे जा सकते हैं और
लिखे जा सकते हैं । 'ध्वन्यात्मकमन्त्र' वे हैं जिसका न तो जीभ से जप किया जा
सकता है, न उन्हें लिखा जा सकता है, न उन्हें बोला जा सकता है और न उन्हें
सुना ही जा सकता है । यह वह ध्वनिमूलक एवं शक्तिपुञ्ज अक्षरसमष्टि है जो हृदय,
नाभि, मूलाधार आदि चेतन-केन्द्रों से स्वतः आविर्भूत होता है । यह नादात्मक है
और स्वयंभू है । 'मध्यमा', 'पश्यन्ती' एवं 'परावाक्' के केन्द्रों से इनका आविर्भाव
होता है । 'मन्त्र' जप करने की वस्तु नहीं है प्रत्युत् होने की वस्तु है ।
६४. 'मन्त्र' और देवता-पारस्परिक अन्तर्सबन्ध—
मन्त्र और देवता में तत्त्वतः अभिन्नता है । जो मन्त्र है वही देवता है और जो
देवता है वही मन्त्र है । दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । अन्तर केवल यह
है कि एक 'नाम' है और दूसरा 'नामी', एक वाचक है और दूसरा वाच्य ।
'देवता' वाच्य है—नामी है और 'मन्त्र' वाचक है—नाम है । 'वातुलशुद्धाख्यतन्त्र'
में कहा गया है कि 'मन्त्र देवतारूप है । और यह जगत् मन्त्ररूप है'—"मन्त्रस्तु
देवता रूपं मन्त्ररूपमिदं जगत् ॥"१
६५. 'मन्त्र' और उसका महत्व—
'मन्त्र' से ही जगत् की उत्पत्ति होती है, मन्त्र से ही जगत् का पालन होता
है और मन्त्र से ही जगत् का विनाश होता है । 'मन्त्र' ही जगत् की सृष्टि, स्थिति
एवं संहार तीनों का अधिष्ठान है । 'मन्त्र' से ही ३३ कोटि देवता, तीनों लोक,
चौदहों भुवन, चौदहों विद्याएँ, समस्त अण्ड (शाक्ताण्ड, मायाण्ड, प्रकृत्यण्ड,
ब्रह्माण्ड) देवत्रय, सप्तलोक (तल, अतल, रसातल आदि), समस्त वर्णमाला,
समस्त विद्याएँ एवं समस्त सत्ताएँ अस्तित्व में आती हैं ।
मारण, मोहन, उच्चाटन, विद्वेषण, स्तंभन, आकर्षण आदि समस्त क्रियाएँ
मन्त्र द्वारा ही संपादित हैं—'कर्षणादि क्रियाः सर्वामन्त्रेणैव प्रकीर्तिताः ॥'२
बिना 'मन्त्र' के कोई क्रिया संभव ही नहीं है—
'तस्मान्मन्त्र क्रियार्थत्वाद्विना मन्त्रं क्रिया न च ॥'३
'मन्त्र' के द्वारा ही देवों की स्थापना होती हैं, मन्त्रों के द्वारा ही यज्ञ आदि
क्रियाओं का निष्पादन होता है, मन्त्र द्वारा ही स्नान, आहुति, तर्पण, प्रायश्चित,
दीक्षा आदि क्रियाएँ सम्पन्न की जाती हैं तथा मन्त्र द्वारा अणिमादिक सिद्धियाँ एवं
सालोक्य आदि मुक्तियाँ प्राप्त की जाती हैं—मन्त्रों द्वारा ही सारे पापों से मुक्ति प्राप्त
की जाती है ।
१-२. वातुल शुद्धाख्य तन्त्र
८२ वरिवस्यारहस्ये
'मन्त्रेण देवता स्थाप्या मन्त्रेण यजनादयः । स्नानं मन्त्रेण कर्तव्यं
मन्त्रेणाहुतितर्पणम् । प्रायश्चित्तं तु मन्त्रेण दीक्षामन्त्रेण चैव हि । अणिमादीनि मन्त्रेण
सालोक्यादि पदं तथा । मन्त्रेण पातकादीनि मुच्यन्ते सर्वजन्मिनाम् । सर्वमन्त्रक्रियाश्चैव
मन्त्र शृणु षडानन ।' १
'मन्त्र' मननधर्मा हैं । 'मन्त्र' त्राण का केन्द्र है । 'मनन' एवं 'त्राण'—इन
दोनों धर्मों के निष्पादन के कारण ही इन्हें 'मन्त्र' कहा जाता है—'मननं सर्वपेक्षेषु
त्राणं संसार सागरात् मननत्राणधर्म धर्मत्वात् मन्त्र इत्यभिधीयते ।।' २
६६. 'मन्त्र' और 'उपाय' तत्त्व—प्रत्यभिज्ञाशास्त्र (त्रिक् दर्शन) में मुक्ति के
साधनों को 'उपाय' कहा गया है । आचार्य अभिनवगुप्तपाद ने मुक्ति के साधनभूत
इन उपायों के निम्न प्रकारों का उल्लेख किया है—
(१) 'अनुपाय' = 'आनन्दोपाय' = शांभवोपाय का चरमरूप
(२) 'शांभवोपाय' = शांभवसमावेश = शांभवमार्ग = 'इच्छोपाय'
(३) 'शाक्तोपाय' = शाक्तसमावेश = 'ज्ञानोपाय'
(४) 'आणवोपाय' = 'क्रियोपाय' = 'क्रियोपाय'—'ज्ञानोपाय'
(क) 'शांभवोपाय' = अभेदोपाय । ⎫ 'अभेदोपायमंत्रोक्तं शांभवं शाक्त
(ख) 'शाक्तोपाय' = भेदाभेदात्मक । ⎬ मुच्यते । भेदाभेदात्मकोपायं
(ग) 'आणवोपाय' = भेदोपाय । ⎭ भेदोपायं तदाणवम् ।।३
(क) 'आणवोपाय' = ज्ञानोपाय ⎫ 'आणव' 'मायीय' एवं
(ख) ज्ञानोपाय = इच्छोपाय ⎬ 'कार्य' मलों के ध्वंस
(ग) इच्छोपाय = शांभवोपाय ⎭ के साधन ।।
'आणवमल'—'कार्ममल'—'मायीयमल' । 'मल' ही संसारांकुर है । संकुचित
ज्ञान ही 'मल' है—प्रच्छन्नज्ञानरूपता ही 'मल' है । यह पूर्णज्ञान की अख्याति है—
'मलमज्ञानमिच्छन्ति संसारांकुर कारणम् ।।'
'शिवसूत्र' में 'मन्त्र' को द्वितीयोन्मेष अर्थात् 'शाक्तोपाय के रूप में स्वीकार
करते हुए मन्त्र की निम्न परिभाषा दी गई है—'चित्तं मन्त्रः' (२।१) इसकी व्याख्या
करते हुए आचार्य क्षेमराज ने 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में कहा है—'चेत्यते विमृश्यते
अनेन परतत्त्वम् इति चित्तं, पूर्णस्फुरत्ता सततप्रसाद प्रणवादिविमर्शरूपं संवेदनम्,
तदेव मन्त्र्यते गुप्तम्, अन्तर भेदेन विमृश्यते परमेश्वररूपम् अनेन, इति कृत्वा
मन्त्रः । अतएव च पर स्फुरत्तात्मकमननधर्मात्मता, भेदमयसंसारप्रशमनात्मक त्राण-
धर्मता च अस्य निरूच्यते । अथ च मन्त्रदेवता विमर्शपरत्वेन प्राप्ततत्सामरस्यम्
आराधक चित्तमेव मन्त्रः न तु विचित्रवर्णसङ्घट्टमात्रकम् ।।' ४
१-२. वातुल शुद्धाख्य तन्त्र ३. अभिनवगुप्त—'तन्त्रालोक' (प्र.आ.)
४. क्षेमराज—'शिवसूत्रविमर्शिनी'
।`
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(क) मन्त्र का धर्म है—१. मनन, २. त्राण ।
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(ख) मन्त्र का बल है—निरावणा चित् शक्ति का उल्लास ।
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अर्थात् 'पराशक्ति' । उसी शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से
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उद्बोधित होकर प्रदीप्त होते हैं । उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । जब
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सिद्ध व्यक्ति उनका प्रयोग करता है तब वे 'अनुग्रह' एवं 'निग्रह' करने में सक्षम हो
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जाते हैं ।
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'त्रिकसार' में कहा गया है कि—"वर्णातीत निराकार परमतत्त्व का बोध हो
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जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के किङ्कर हो जाते हैं (वशीभूत हो जाते हैं ।) यदि ऐसा
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१. श्रीमत्ज्ञानोत्तर २. वरदराज—'शिवसूत्र वार्तिक'
`३. श्रीकण्ठी संहिता ४. तन्त्रसद्
प्रथम विश्राम: पञ्चदशाक्षरी मन्त्र का वाच्यार्थ एवं अधिदैविक अर्थ
८४ वरिवस्यारहस्ये
नहीं हुआ तो कठोर अध्यवसाय करने पर भी वे कठपुतली के समान निष्फलचेष्ट
ही रहते हैं क्योंकि चिच्छक्ति के बल के स्पर्श न होने पर वे केवल वर्णमात्रा
अर्थात् जड़ अक्षरमात्र रह जाते हैं ।।"
‘हंसपारमेश्वर’ में कहा गया है कि—“केवल वर्णरूप मन्त्र ‘पशुभाव’ में स्थित
है । सुषुम्णामार्ग से उच्चारण करने पर वे ‘पशुपति’ हो जाते हैं ।
‘तत्त्वरक्षाविधान’ में कहा गया है कि—“आत्मसंवित् या परमपद में मन्त्र का
प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि वह शक्ति एवं क्रियाशून्य है । शक्ति के विषय में
ही मन्त्र का प्रयोग करना चाहिए । वहीं जप सफल होता है ।”
‘श्रीवैहायसी’ में कहा गया है कि नादोर्ध्वध्वनि से बोधित जप करना चाहिए ।
शक्ति के ताने-बाने से हुए मन्त्राक्षरों का ध्यान करना चाहिए । उक्त रीति से जप
करने पर ‘मन्त्र’ अपने स्वरूप को प्रकट कर देता है ।
उत्पलाचार्य कहते हैं कि साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं । जब
शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप किया
जाता है तो वह लक्ष बार किए गए जप के समान हो जाता है ।
‘स्पन्दकारिका’ में कहा गया है—
“तदाक्रम्य बलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः ।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः ॥”
‘मालिनीविजय’ का मत है कि—जिस अवस्था में जीत अन्याधार—विनिर्मुक्त
होकर स्वरूप में लीन होता है वही सम्पूर्ण मन्त्रों की उत्पत्ति का क्षेत्र है ।
‘चित्तं मन्त्रः’, ‘कथा जपः’—कहकर ‘शिवसूत्र’ में ‘मन्त्र’ एवं ‘जप’ की
अवधारणा को अत्यधिक वैज्ञानिक, यथार्थपरक, व्यावहारिक एवं बाह्याडम्बर तथा
बाह्याचार-विनिर्मुक्त करने का प्रयास किया गया है । भास्करराय ने भी यही प्रयास
किया है । ‘कुलार्णवतन्त्र’ में भी इसी दृष्टि को उपन्यस्त करते हुए साधकों से
प्रश्न किया गया है कि—
जिह्वादग्धा परान्नेन हस्तौ दग्धौ प्रतिग्रहात् ।
मनोदग्धं परस्त्रीभिः कार्यसिद्धिं कथं भवेत् ?॥
अर्थात् इन विपरीत परिस्थितियों में—‘मन्त्रसिद्धिं कथं भवेत् ?’
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