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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 530 में से

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पृष्ठ 79

भूमिका ६९
मुक्तिस्वरूपा, विश्वाम्बा भगवती महामाया मेरी दुखों से रक्षा करें ॥"
'गं' = ग = गणेश । बिन्दु = दुःखहारक । गणेशबीज का अर्थ—"भगवान्
गणेश मेरे दुःखों का नाश करें ॥"
'क्ष्रौं' = क्ष = नृसिंह । र = ब्रह्मा । औ = ऊर्ध्वदत्त । बिन्दु = दुःखहारी ।
इस नृसिंह बीज का अर्थ—"ब्रह्मस्वरूप, ऊर्ध्वदत्त भगवान नृसिंह दुःखों से मेरी
रक्षा करें ॥"
'हं' = आकाश । 'यं' = वायु । 'रं' = अग्नि । 'वं' = जल, अमृत । 'लं'
= पृथ्वी । 'मं' = चन्द्रमा । (एकाक्षरीकोष से अन्य शब्दार्थों का भी अर्थावगाहन
किया जा सकता है ।)१
३२. मन्त्रार्थ का वास्तविक स्वरूप एवं साधना-पद्धति२—
किसी भी मन्त्र का वास्तविक अर्थ तो केवल वही जान सकता है जिसे मन्त्र
एवं उस मन्त्र के देवता का साक्षात्कार हो चुका हो । 'सरस्वतीतन्त्र' में मन्त्रार्थ का
अवबोध एवं साक्षात्कार-प्राप्ति की निम्न पद्धति बताई गई है ।
१. साधक को चाहिए कि वह 'मूलाधारचक्र' में शुद्ध स्फटिक सङ्काश निर्मल
इष्टदेवता एवं मन्त्ररूप इष्ट विद्या का चिन्तन करें ।
२. अर्द्धमुहूर्तपर्यन्त ध्यान करके फिर 'नाभिचक्र' में इष्टदेवता एवं इष्टमन्त्र का
चिन्तन करे । यहाँ इष्टदेवता एवं इष्टमन्त्र का रङ्ग लाल रहेगा ।
३. इसके बाद दोनों का ध्यान मरकत मणि के स्वरूप में (हृदय में) करना
चाहिए । फिर इसी क्रम से विशुद्धादि चक्रों में ध्यान करते हुए सहस्रार में जाकर
दोनों तत्त्वों के एकीकृत होने का ध्यान करना चाहिए ।
४. जब साधक ध्यान करते-करते इतना तन्मय हो जाय कि स्वयं
मन्त्रदेवतात्मक ब्रह्म से पृथक न रह जाय तभी उसे मन्त्र के वास्तविक अर्थ का
ज्ञान प्राप्त हो पायेगा ।। इसीलिए भगवान् शङ्कर कहते हैं—
"ध्यानेन परमेशानि यद्रूपं समुपस्थितम् ।
तदेव परमेशानि मन्त्रार्थं विद्धि पार्वति ॥''३
३३. मन्त्रों का कुल्लुका—
मन्त्रों के जप के पूर्व उनकी कुल्लुका का ज्ञान भी आवश्यक है । जप के
पूर्व उस मन्त्र की कुल्लुका का मूर्द्धा में न्यास कर लेना चाहिए । कतिपय मन्त्रों
की कुल्लुकाएँ अगले पृष्ठ पर तालिका में दर्शायी गयी हैं—
अन्य देवों के अपने-अपने मन्त्र ही 'कुल्लुका' है ।
१. एकाक्षरी कोष २. साधना तन्त्र
३. सरस्वती तन्त्र