वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 87, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ७५
जप कोटि बार भी क्यों न अनुष्ठित किया जाय किन्तु वह सिद्ध नहीं होता प्रत्युत्
नरक ले जाता है—'भावतत्त्वं विनादेवि प्रजपेद् यदि कोटिधा। सर्वतस्य वृथा देवि !
नरकें च पदे पदे ॥" भाव-शून्य गुरु भी पशु है—"स कथं चञ्चलापांगि
दिव्यवीरगुरुर्भवेत् । पशुवत सर्वदा देवि स एव पशु गुरुः प्रिये ।"१ भावों में
आद्यभाव (दिव्यभाव) सर्वसिद्धिप्रद है—किन्तु 'वीरभाव' मध्यम एवं 'पशुभाव'
अतिनिन्दित है । यदि भाव न हुआ तो न्यास विस्तार, भूत शुद्धिप्रस्तार एवं
पूजनादि सभी व्यर्थ हैं । इन साधनाओं का कोई फल नहीं मिलता ॥२
४९. वर्णों की शक्त्यात्मकता एवं देव्यात्मकता—
मन्त्रशास्त्र यह मानता है कि वर्ण अचिन्त्य शक्ति सम्पन्न हैं—ये मूलतः
कुण्डलिनी शक्ति की ध्वन्यात्मकाभिव्यक्तियाँ हैं—शक्ति के नादात्मक स्वरूप का
प्रकाशन हैं । मन्त्र त्रिपुरसुन्दरी का मूर्तिमान वर्णविग्रह हैं—१. भगवत्याः स्वरूपं तु
पञ्चाशद्वर्णात्मिका मातृकैव । सेयं पञ्चाशद्वर्णात्मिका मातृकाऽष्ट वर्गात्मिका भवति ।
एवमष्ट वर्गात्मिका भगवती मातृका त्रिपुरसुन्दरी ।।" (लक्ष्मीधर) ।।
५०. मन्त्र-साधना के लिए उपयुक्त स्थान—
सिद्धपीठ, पुण्यक्षेत्र, नदीतट, गुहा, पर्वतशिखर, तीर्थ, सङ्गम, पवित्र जङ्गल,
एकान्तोद्यान, बिल्ववृक्ष, उपत्यका, तुलसीकानन, गोशाला, देवालय, अश्वत्थ वृक्ष,
आमलक वृक्ष के नीचे, पानी में मन्त्रानुष्ठान अधिक प्रशस्त है । सूर्य, अग्नि, गुरु,
चन्द्रमा, दीपक, जल, ब्राह्मण एवं गौओं के सामने बैठकर जप करना प्रशस्त है ।
श्रेष्ठतम स्थान वही है जहाँ बैठकर जप करने से चित्त की एकाग्रता बढ़ सके ।
स्थान की दृष्टि से—दस गुना गोष्ठ, सौ गुना जङ्गल, हजारगुना तालाब, लाख गुना
नदीतट, कोटिगुना पर्वत, अरबों गुना शिवालय, एवं अनन्त गुना गुरु का सन्निधान
श्रेष्ठतर है । यह भी सही है कि—
'जिह्वादग्धा परान्नेन मनोदग्धं परस्त्रिभिः ।'
५१. मन्त्र जप के समय निषिद्ध-कार्य—
आलस्य, जँभाई, निद्रा, छींक, थूकना, डरना, अपवित्र अङ्ग का स्पर्श,
क्रोध, मध्य में बातें करना, जप में जल्दीबाजी करना, विलम्बपूर्वक जप, गाकर
जप, सिर हिलाना, लिखित मन्त्र पढ़ना, मन्त्र का अर्थ न जानना, बीच-बीच में
मन्त्र भूल जाना, इष्ट-देवता-मन्त्र एवं गुरु को पृथक्-पृथक् मानना निषिद्ध कार्य है ।
५२. मन्त्र-जप के समय आवश्यक नियम—
भूमिशयन, ब्रह्मचर्य, मौन, गुरुसेवन, त्रिकालस्नान, पापकर्म परित्याग, नित्य
पूजा, नित्यदान, देवता की स्तुति एवं कीर्तन, नैमित्तिक पूजा, इष्टदेव एवं गुरु में
विश्वास, जपनिष्ठा ।
१. कामधेनु तन्त्र
२. ज्ञानानन्द परमहंस—'कौलावली निर्णय'