वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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भूमिका ७१
अधिकारिणी नहीं । मन्त्र जप के पूर्व दस बार मुख शोधन सम्बंधी मन्त्र-जप करना
चाहिए ।
३८. देवता एवं उनके मुखशोधन मन्त्र—
| देवता | मुखशोधन मंत्र | देवता | मुखशोधन मंत्र |
|---|---|---|---|
| त्रिपुरसुन्दरी | श्रीं ॐ श्रीं ॐ श्रीं ॐ | श्यामा | क्रीं क्रीं क्रीं ॐ ॐ <br> ॐ क्रीं क्रीं क्रीं । |
| तारा | ह्रीं हूँ ह्रीं । | दुर्गा | ऐं ऐं ऐं । |
| बगलामुखी | ऐं ह्रीं ऐं । | मातङ्गी | ॐ ऐं ॐ । |
| लक्ष्मी | श्रीं । | धूमावती | ॐ । |
| धनदा | ॐ धूं ॐ । | गणेश | ॐ गं । |
| विष्णु | ॐ हं । | ||
| अन्य देवताओं मात्र ॐ ही मुखशोधन का मन्त्र है । इसे मन्त्र जप के पूर्व | |||
| दस बार जप लेना चाहिए । | |||
| ३९. प्राणयोग— | |||
| यथा निष्प्राण शरीर निश्चेष्ट रहता है तद्वत प्राणहीन मन्त्र भी निश्चेष्ट रहता | |||
| है । माया बीज (ह्रीं) से संपुटित करके अपने मन्त्र का सात बार जप करना ही | |||
| प्राणयोग है । | |||
| ४०. दीपनी— | |||
| यथा दीपक का प्रकाश अंधकार दूर करके घर में रक्खी समस्त अंधकारावृत | |||
| वस्तुओं को प्रकाशित कर देती है उसी प्रकार दीपनी क्रिया से मन्त्र प्रकाश में आ | |||
| जाता है । जपारंभ के पूर्व स्वमन्त्र को प्रणव से सम्पुटित करके उसका सात बार | |||
| जप कर लेना चाहिए । | |||
| ४१. मन्त्रसिद्धि के अन्य उपाय— | |||
| श्रद्धा-विश्वास के साथ मन्त्रानुष्ठान करने पर भी मन्त्रसिद्धि न हो तो उसका | |||
| पुनः पुनः अनुष्ठान करना चाहिए तीन बार के अनुष्ठान से भी मन्त्र सिद्ध न हो | |||
| तो निम्न सात उपायों का अवलम्बन लेना चाहिए किन्तु एक साथ सातों क्रियाओं | |||
| का प्रयोग आवश्यक नहीं । एक करने पर मन्त्र सिद्ध न हो तो दूसरे का, दूसरे | |||
| से भी सिद्ध न हो तो तीसरे से, और इसी प्रकार चौथे, पाँचवें, छठवें एवं अन्त | |||
| में सातवें से । | |||
| ४२. मन्त्रसिद्ध के उपायों का नाम एवं साधन-प्रक्रिया— | |||
| इन उपायों का नाम है—१. भ्रामण, २. रोधन, ३. वश्य, ४. पीडन, | |||
| ५. पोषण, ६. शोषण, ७. दाहन ॥ |