वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७० वरिवस्यारहस्ये
| देवता | मंत्र की कुल्लुका | देवता/मंत्र की कुल्लुका |
|---|---|---|
| तारा | ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं । | काली ॐ क्रीं हूं स्त्रीं ह्रीं फट । |
| छिन्नमस्ता | श्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं ह्रीं ह्रीं स्वाहा | वज्रवैरोचिनी ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं ह्रीं ह्री स्वाहा हूँ । |
| भैरवी | ह स रें | त्रिपुरसुन्दरी—ॐ ऐं क्लीं ह्रीं त्रिपुरे भगवति स्वाहा अथवा क्लीं । |
| मञ्जुघोषा | ॐ अ र व च ल धीं | भुवनेश्वरी—ॐ ह्रीं । |
| विष्णु | ॐ नमो नारायणाय | मातङ्गी—ॐ ॐ ॥ |
| धूमावती | ॐ ह्रीं | षोडशी—ॐ स्त्रीं ॥ |
| लक्ष्मी | ॐ श्रीं | सरस्वती—ॐ ऐं ॥ |
| अन्नपूर्णा | ॐ क्रीं | शिव—ॐ ह्रौं ॥ |
३४. मन्त्रसेतु—
मन्त्रों का सेतु—१. ब्राह्मण एवं क्षत्रियों के लिए—प्रणव २. वैश्यों के
लिए—'फट्' ३. शूद्रों के लिए—ह्रीं । जपारम्भ के पूर्व इसका हृदय में जप
आवश्यक है ।
३५. महासेतु—
जपारम्भ के पूर्व महासेतु का भी जप करना चाहिए । इसे करने से जापक
को सभी समय एवं सभी कालों में जप करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है ।
इनका जप 'विशुद्धचक्र' (कण्ठस्थान) में करना चाहिए—त्रिपुरसुन्दरी का महासेतु—
'ह्रीं', काली का 'क्रीं', एवं तारा का 'हूँ' है । अन्य सभी देवताओं का महासेतु
'स्त्रीं' है ।
३६. निर्वाण—
इस पद्धति में साधक पहले प्रणव एवं इसके उपरान्त 'अ' आदि समस्त स्वर
वर्णों का उच्चारण करके तब अपना मन्त्र पढ़े । तदुपरान्त 'ऐं' एवं समस्त स्वर
वर्णों का और अन्त में प्रणव का जप करें । इस तरह सम्पुट करके इसका जप
'मणिपूरक' चक्र में करना चाहिए ।
३७. मुख-शोधन—
मन्त्र जप के पूर्व मुख-शोधन भी अपरिहार्य है क्योंकि अशुद्ध जिह्वा से किया
गया जप हानि पहुँचाता है । जिह्वा पर स्थित मल—१. भोजन का मल २. मिथ्या
भाषण का मल ३. कलह का मलशोधन के पूर्व जिह्वा मन्त्रोच्चारण की