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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 530 में से

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पृष्ठ 85

भूमिका ७३
(ग) 'मन्त्र कुरहिं जब करउ दुराऊ' (तुलसीदास)
(घ) 'तस्मात मन्त्रं महासेन रहस्यं न प्रकाशय ।' (वातुला० तन्त्र)
४४. सूतकोद्धार—
मन्त्र में सूतक—१. जातसूतक २. मृतसूतक । इन दोनों अपवित्रताओं का
दूरीकरण से ही मन्त्र-सिद्धि की संभावना है अन्यथा नहीं ।
सूतकोद्धार हेतु—जपारंभ के समय सबसे पूर्व १०८ बार (या कम से कम)
सात बार प्रणव से संपुटित करके अपने इष्ट मन्त्र का जप कर लेना चाहिए ।
योनिमुद्रा का अनुष्ठान भी कर लेना चाहिए ।
इसके विकल्प में 'भूतलिपि' का प्रयोग है । उसके द्वारा अनुलोम विलोम
संपुटित करके मन्त्र जप करने से भी मन्त्र शीघ्र सिद्ध होता है ।
४५. भूतलिपि का क्रम—
'अ इ उ ऋ लृ ए ऐ ओ औ ह य र व ल ङ क ख घ ग ञ च छ झ
ज ण ट ठ ढ ड न त थ ध द म प फ भ ब श ष स'—इनको पढ़कर फिर
इष्टमन्त्र एवं फिर—स ष श ब भ फ प म द ध थ त न ड ढ ठ ट ण ज झ
छ च ञ ग घ ख क ङ ल व र य ह औ ओ ऐ ए लृ ऋ उ, इ अ ॥'—
इसका एक मास तक जप करना चाहिए । ऐसा करने से—मन्त्रजागरण । इसको
करने से पूर्व एवं इसके पश्चात् ३-३ प्राणायाम कर लेना चाहिए ॥ चार मन्त्रों से
पूरक, सोलह मन्त्रों से कुंभक एवं आठ मन्त्रों से रेचक किया जाना चाहिए । जप
पूरा होने पर उसे ज्योतिस्वरूप में कल्पित करके इष्टदेव के दाहिने हाथ में जप
समर्पण कर देना चाहिए । देवीमन्त्र हो तो उस जप को बाएँ हाँथ में समर्पित
करना चाहिए । अनुष्ठान के अन्त में प्रतिदिन जप का दशांश हवन, हवन का
दशांश तर्पण, तर्पण का दशांश अभिषेक एवं यथाशक्ति ब्राह्मणभोजन कराना
चाहिए । होम, तर्पण आदि में से जो अङ्ग पूरा न किया जा सके उसके लिए भी
जप कर लेना चाहिए । होम न कर सकने पर—(ब्राह्मण)—होम की संख्या से
चौगुना, (क्षत्रिय) छ गुना, (वैश्य) अठगुना जप करें । नारी भी वैश्यवत अठगुना
जप करें । (शूद्र) होम की संख्या से दसगुना (किन्तु यदि अन्य वर्ण के आश्रित
हो तो उस आश्रयदाता के लिए निर्दिष्ट संख्यानुसार) जप करणीय है । (अर्थात्
एक लाख का अनुष्ठान हो तो होम हेतु भी एक लाख जप करना होगा ।)
('योगिनीहृदय' के अनुसार—ब्राह्मण हेतु—होमसंख्या का दुगुना, क्षत्रियों के
लिए—तिगुना, वैश्यों के लिए चौगुना एवं शूद्रों के लिए पंचगुना जप उचित है ।)
४६. अनुष्ठान के पाँच अङ्ग हैं—'१. जप, २. होम, ३. तर्पण, ४.
अभिषेक, ५. ब्राह्मण भोजन । होम, तर्पण, अभिषेक न कर सकने पर केवल
ब्राह्मणों के आशीर्वाद से भी काम चल सकता है । नारियों के लिए तो ब्राह्मण
भोजन उतना आवश्यक भी नहीं । उन्हें न्यास, ध्यान, और पूजा की छूट है ।