वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ६७
४. ऐसी कल्पना करनी चाहिए कि मेरे हृदय में अनाहत चक्र पर मेरे मन्त्र
के समस्त वर्ण स्थित हैं । मूलाधार से जाग्रत होकर कुण्डलिनी सुषुम्णा मार्ग से
आती है और मेरे मन्त्र को, कण्ठस्थित विशुद्धचक्र का भेदन करके, सहस्रार में ले
जा रही है । वहाँ सहस्रकमल की कर्णिका पर नाद-बिन्दु संयुक्त मन्त्र के समस्त
अक्षर स्थित हैं एवं चैतन्यरूप मन्त्र शक्ति स्फुरित हो रही है । मन्त्र का प्रत्येक
अक्षर चैतन्यशक्ति से ही निर्मित एवं ग्रथित है—ऐसी भावना करके मन्त्राक्षरों को
नाभि में स्थित मणिपूरकचक्र पर लाना चाहिए । फिर वहाँ से वे वाणी में आ रहे
हैं—ऐसा मानकर चिद्रूप से उनका जप करना चाहिए ।
५. पिण्डस्थ षट्चक्रों के प्रत्येक पद्म दल पर वर्ण अंकित हैं । ये कमल
एवं उनके दल वर्णरूप ही हैं । ये वर्ण सृष्टि-क्रम के अनुसार समस्त पद्मदल पर
आते हैं एवं संहारक्रम से कुण्डलिनी शक्ति के द्वारा अपने मूलस्थान में विलीन कर
दिये जाते हैं । इसके अनन्तर उनकी पुनः दिव्यरूप में सृष्टि होती है । अपने मन्त्र
को जो कि चिच्छक्ति या कुण्डलिनी शक्ति से ध्वनित हो रहा है—वर्णाभाव से परे
चैतन्य रूप में स्थित अनुभव करना, षट्चक्रों का भेदन करके सनातन शब्द रूप
में (नाद-बिन्दु संयुक्त) चैतन्य से एक कर देना और पुनः उन्हीं जीवन्त, जाग्रत,
दीप्तिमान चेतन वर्णों की समष्टि से निर्मित मन्त्र का साक्षात्कार करना भी
मन्त्र-चैतन्य की एक पद्धति है ।
३१. मन्त्रार्थ—
मन्त्रार्थ-ज्ञान के बिना मन्त्र-जप करने वाला उस गधे के समान माना जाता है
जिसके ऊपर चन्दन लादा गया है किन्तु वह चन्दन की महिमा तो नहीं केवल
उसके बोझ को जानता है—
“अर्थमजानानां नानाविधशब्दमात्रपाठवताम् ।
उपमेयश्वक्रीवान् मलयजभारस्य वोढैव ॥"१
पुरुषार्थों—धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—की कामना करने वाले लोगों को मन्त्र के
अर्थों का परिज्ञान आवश्यक है । अर्थों के प्रति अनादर भाव रखने वालों के लिए
अर्थ (काम्यपदार्थ) की प्राप्ति तो नहीं किन्तु अनर्थ की प्राप्ति अवश्य होती है—
“पुरुषार्थानिच्छद्भिः पुरुषैरर्थापरिज्ञेयाः ।
अथानादरभाजां नैवार्थः प्रत्युतानर्थः ॥"२
आचार्य भास्कर ने तो मन्त्रार्थ के पन्द्रह प्रकारों का प्रतिपादन किया है और
उनकी विशद व्याख्या भी की है जो भावार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ, समस्तार्थ,
निगर्भार्थ, शाक्तार्थ, सामरस्यार्थ आदि हैं ।
मन्त्र सामान्यार्थक वर्ण नहीं हैं । उनमें दिव्यशक्ति निहित है । मन्त्र इष्टदेवता
एवं इष्टदेवता के अनुग्रह के अपर पर्याय है । मन्त्र जिस अर्थ को सङ्केतित करता
१-२. भास्कराचार्य—'वरिवस्यारहस्यम्'