वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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१. 'भ्रामण'—वायुमन्त्र 'यं' द्वारा मन्त्र को ग्रथित करना चाहिए । यंत्र के
ऊपर एक वायुबीज एवं एक मन्त्राक्षर—इस क्रम से मन्त्र के समस्त अक्षरों को
सम्पुटित करके उसे शिलारस, कर्पूर, कुंकुम, खस एवं चन्दन मिलाकर उसी से
यन्त्र पर पूरा मन्त्र लिखना चाहिए । लिखित मन्त्र को दूध, घी, मधु एवं जल में
छोड़कर पूजा, जप एवं हवन करना चाहिए—मन्त्र शीघ्र सिद्ध होगा ॥
२. रोधन—वाग् बीज 'ऐं' द्वारा मन्त्र को सम्पुटित करके यथासाध्य जप
करने से रोधनक्रिया निष्पादित होती है ।
३. वशीकरण—अलक्तक, रक्तचन्दन, कुट, धतूरे का बीज एवं मैनशिल—
को एक में मिलाकर इसके द्वारा ही भोजपत्र पर अपना मन्त्र लिखकर गले में
धारण कर लेना चाहिए । यही है वशीकरण ॥
४. पीडन—अधरोत्तर योग से मन्त्र का जप करते हुए अधरोत्तर स्वरूपिणी
देवता की पूजा करनी चाहिए । फिर अकवन के दूध से मन्त्र लिखकर पैर से
दबाकर हवन करना चाहिए । यही है पीडन क्रिया ।
५. पोषण—मन्त्र के आदि एवं अन्त में 'स्त्रीं' मन्त्र जोड़कर जप करना
चाहिए एवं गाय के दूध से मन्त्र लिखकर हाथ में इसे पहनना चाहिए । इसी का
नाम है पोषण-क्रिया ।
६. शोषण—वायुबीज 'यं' के द्वारा मन्त्र को संपुटित करके जप करना एवं
यज्ञीय भस्म से भोजपत्र पर लिखकर गले में इसे धारण करना चाहिए । यही है
शोषण-क्रिया ।
७. दाहन—मन्त्र के प्रत्येक स्वर वर्ण के साथ अग्निबीज 'रं' जोड़कर जप
करना चाहिए एवं पलास बीज के तेल से मन्त्र लिखकर कंधे पर धारण करना
चाहिए । इसी क्रिया का नाम है—'दाहन' ॥
सातों प्रयोग एक साथ करना आवश्यक नहीं । एक करने से मन्त्र-सिद्धि न
होने पर ही अन्य साधन का उपयोग करना चाहिए ॥
'मन्त्र' का अर्थ है—'गुप्त परामर्श' ॥ 'मन्त्र' दिव्य परामर्श है ।
४३. गोपनीयता—
मन्त्र का अभिधेयार्थ ही है गुप्त परामर्श अतः मनन करने से वह त्राण करने
के अपने शब्दार्थ को तभी सिद्ध कर पायेगा जब उसे गोपनीय रक्खा जाय ॥
भगवान् शिव कहते हैं कि मन्त्र-जप से सिद्धि तो अवश्य मिलेगी किन्तु गोपनीयता
रखने पर ही—
(क) जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्जपात् सिद्धिर्न संशयः ॥ किन्तु—
(ख) गोपनीयं गोगपनीयं गोपनीयं मातृजारवत ॥ (अरब के साधकों ने इसे ही
'खिल्वतदर अञ्जुमन' कहा है ॥)