वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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जपमात्र से ही उनके मन्त्र सिद्ध हो जाते हैं । अनुष्ठान में दीक्षित ब्राह्मणों को
खिलाना चाहिए । अनुष्ठान के पूरा होने पर गुरु, गुरुपुत्र, गुरुपत्नी या उनके
वंशजों को दक्षिण देनी चाहिए ।।
४७. गुरुतत्त्व—
साधना-जगत् में सिद्धि प्राप्त करने हेतु गुरु परमावश्यक है क्योंकि—'गुरु की
जै गहिला, निगुरा न राहिला गुरु बिन ज्ञान न पारलारे भाइला ।।'¹ 'गुरु' मन्त्र,
देवता, यन्त्र, मन्त्राक्षर, त्रिदेव एवं सभी मांत्री शक्तियों से तादात्म्य रखता है ।
उसकी कृपा से ही मन्त्र अपने को प्रकट करते हैं । इसीलिए कहा गया है कि—
'मन्त्रे चाक्षरबुद्धिस्स्याद गुरौ तु मानवः प्रिये । देवतायाः वरारोहे प्रतिमा बुद्धिस्तु
जायते । किं तस्य जपपूजायां सर्वं व्यर्थं कदर्थनम् ।।'² 'तारारहस्य' में कहा गया है
कि सर्वप्रथम ब्राह्ममुहूर्त बेला में उठकर 'योषदर्शन' (ज्योतिदर्शन) करके
स्वस्तिकासनस्थ उत्तराभिमुखी बैठकर अपने शिर में द्वादशार्णसरसीरुहोदरसहस्रदल-
कमलावस्थित श्वेतवर्ण, नानालङ्काराभूषित सद्गुरु को अपने वाम भाग में आसीन
रक्तवर्ण शक्ति से सुशोभित रूप में देखते हुए मानस पूजा करके 'ऐं' (वाग्भव
मन्त्र) का १०८ बार जप करके एवं जप समर्पित करते हुए निम्न मन्त्र कहे—
“ॐ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे
नमः ।।” 'नाभिस्थल पर हाथ रखकर सहस्रार में शक्ति समन्वित सद्गुरु शिव का
ध्यान करना चाहिए—'स्वनाभौ दक्षिणे हस्ते वामहस्तं प्रदापयेत् । भावयेच्च सहस्रारे
श्रीगुरुं शक्तियुक्तकम् ।।'
'गुरु' सिद्धिप्रद, पाप-दाहक, शंभुस्वरूप एवं त्रितयात्मा है इसीलिए 'गुरु'
कहलाता है । 'शाक्तानन्दतरंगिणी' में कहा गया है—'गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेफः
पापस्य दाहकः । उकारः शंभुरित्युक्त स्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ।। 'शाक्तानन्द तरंगिणी'
में ब्रह्मानन्द गिरि पुनः कहते हैं कि “गुरुः सर्वसुराधीशो” अर्थात् गुरु समस्त
देवताओं का स्वामी है अतः तीनों संध्याओं में गुरु का ध्यान, गुरु का पूजन एवं
गुरु का भावन, किया जाना चाहिए—
“त्रिसंध्यं श्रीगुरोर्ध्यानं त्रिसंध्यं पूंजनं गुरोः ।
त्रिसंध्यं भावयेन्नित्यं गुरुं परमकारणम् ।।” (शाक्तानन्दतरंगिणी)
४८. भावतत्त्व—
शास्त्रों में भावत्रय का वर्णन किया गया है जो निम्न है—१. 'पशुभाव', २.
'वीरभाव', ३. 'दिव्यभाव' ।। 'भाव' का द्वितीय अर्थ है—प्रेम, भक्ति एवं
निष्ठा-सङ्कलित एकनिष्ठ आराधना (उपासना) ।। बिना भाव के पूजा एवं मन्त्रजप
व्यर्थ है क्योंकि—'न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे च पार्वति । भावेषु विद्यते देवि !
भावो मोक्षस्वरूपकम् । दिव्यभावो वीरभावः सदैव सहसा भवेत् । अन्यथा पंचलापांगि
पशुभावमयः सदा ।। स्वभावेन विनादेवि ! कथं सिद्धिर्भवेत् प्रिये ।।'³ बिनाभाव का
१. गोरक्षनाथ २-३. कामधेनु तन्त्र