वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
द्वितीयोऽंशः ३९१
'ऋषि' = हयग्रीव, अगस्त्य, लोपामुद्रा, मन्मथ, आदि आचार्य ही ऋषि हैं । २.
'छन्द' = पंक्त्यादि छन्द हैं । ३. 'देवता' = त्रिपुरसुन्दरी ॥ ४. विनियोग =
इष्टार्थजनकत्व ॥ ५. 'बीज' = वाग्भव आदि ॥ ६. 'शक्ति' = परा आदि देवता ॥
७. 'कीलकं' = कामराज आदि ॥ ८. 'न्यास' = ऋष्यादि न्यास जाल । ९.
'ध्यान' = 'अरुणां करुणातरंगिताक्षीम्' आदि स्तुतियों द्वारा किया गया ध्यान ।
१०. 'नियम' = पुण्ड्र-इक्षु, दण्डभक्षणवर्जन सङ्कल्पादिक नियम ॥ ११. 'पूजा' =
पात्र-आसन-शान्ति-स्तव आदि ॥ १२. 'आदीनि' = आदि-आदि । अर्थात् होम.
तर्पण आदि परिग्रह ॥ 'प्रायः'—प्रख्यात ॥¹
इन अङ्गों का एक उदाहरण लें—"अस्य श्रीललितासहस्र नामसहस्रनाम्स्तोत्र-
मालामन्त्रस्य वशिन्यादिवाग्देवता, अनुष्टप् छन्दः, श्रीललितापरमेश्वरी देवता,
श्रीमद्वाग्भवकूटेति मध्यकूटेति शक्तिः । शक्तिकूटेति कीलकम्, श्रीललिता महात्रिपुर-
सुन्दरीसिद्धि द्वारा चिन्तितकलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।।" 'ध्यान'—
सिन्दूरारुणविग्रहं त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुर
त्तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं बिभ्रतीं,
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत् परामम्बिकाम् ॥²
उपर्युक्त बहिरांगों में कतिपय का स्वरूप निम्नांकित है—
१. 'पूजा' = न पूजा बाह्यपुष्पादिद्रव्यैर्या प्रथिताऽनिशम् । महिमन्द्वये धाम्नि
सा 'पूजा' या परा स्थितिः ॥³
"तन्त्रालोक" में अभिनवगुप्तपादाचार्य पूजा के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश
डालते हुए कहते हैं—
'पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि सङ्गतिः ।
स्वतंत्र विमलानन्तभैरवीय चिदात्मना ॥ (४।१२१)
आचार्य भट्टउत्पल ने 'शिवस्तोत्रावली' में पूजा-विधि का वर्णन इस प्रकार
किया है—'ध्यानायासतिरस्कारसिद्ध स्वतत्स्पर्शनोत्सवः । पूजाविधिरिति ख्यातो भक्तानां
स सदाऽस्तु मे । (१७।४)४
'ध्यान' का स्वरूप क्या है—'ध्यानं निर्विषयं मनः ॥' मन की निर्विषयाकार
स्थिति ही ध्यान है । मन की देवाकर परिणति ही ध्यान है । बारह धारणाओं
से उत्पन्न मन की निर्विषयात्मक एकाग्रावस्था ही 'ध्यान' है । 'शक्ति' के दूसरे भी
अर्थ हैं ।५
१. भास्करराय—'प्रकाश' २. ललितासहस्रनाम
३. संकेतपद्धति ४. तन्त्रालोक
५. 'शक्ति' = वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, शान्ता, इच्छा, ज्ञान, क्रिया, अम्बिका,
कामेश्वरी-वज्रेश्वरी-भगमालिनी, महात्रिपुरसुन्दरी । आदि ॥
३९२ वरिवस्यारहस्ये
बाह्याङ्ग—
१. ‘ऋषि’—ऋषि उसे कहते हैं जिसने मंत्रों का दर्शन किया हो—‘ऋषयो मंत्र
द्रष्टारः’,१ ‘मध्यमाभूमि’ एवं ‘पश्यन्तीभूमि’ ऋषि भूमि है । ‘मध्यमा’ मन्त्र-
मयी भूमि है क्योंकि मंत्ररूप में ही ‘मध्यमावाक्’ आत्मप्रकाश करता है ।
चिद्-उन्मेष के अभाव के कारण मानवीय वाक् वैखरी भूमि को अतिक्रान्त
करके मध्यमा में प्रवेश नहीं कर सकता ।। चूँकि ‘मंत्र’ चिद् रश्मियुक्त है
अतः वैखरी भूमि में (चिद्भाव) गुप्त होने के कारण वैखरी के वर्णों की
मंत्रमयता कभी स्वीकार नहीं की जाती क्योंकि ‘मंत्र’ चेतन् तत्त्व की
रश्मियाँ हैं । ‘‘मंत्राश्चिन्मरीचयः । तद्वाचकत्वाद् वैखरी वर्ण विलासभूतानां
विद्यानां मननात् त्राणता ।।’’—इन चिद्रश्मि-सञ्जात, त्रिद्रूप, चेतन मंत्रों का
जो दर्शन करता है या जिसने इनका प्रथम बार साक्षात्कार किया हो वही
ऋषि कहलाता है । यही किसी भी मंत्र का प्रथम आचार्य है ।
‘ऋष’ का अर्थ है अपरोक्षदर्शन । ऋषि मंत्रों के आविष्कारक हैं
सृष्टिकर्ता नहीं—‘ऋषयोमंत्र द्रष्टारः स्मारकाः न तु कारकाः ।।' यथा—
२. ‘छन्द’—जिस पद्धति द्वारा जिस छन्द से जिस भाव का कम्पन उत्पन्न
करके साधक की साधना के उद्देश्य को पूरा कराया जाता है वह छन्द ही
उस निर्दिष्ट साधन-प्रणाली का छन्द है ।
३. ‘देवता’—दिव्धातु से निष्पन्न देवताशब्द क्रीडार्थक एवं प्रकाशार्थक है ।
प्रकृति के विभिन्न तत्त्वों में, विभिन्न स्तरों में, चैतन्य परमात्मा किस प्रकार
प्रकाशित एवं लीलारत हैं—यह देवता तत्त्व के अंतर्गत है । भगवच्चैतन्य
के विभिन्न प्रतिबिम्ब या विभूति—विभिन्न भाव के लीला भाव का नाम
देवता तत्त्व है । ‘देवता’ भक्त के देह स्थित होकर एवं भक्तों को वरदान
देकर उसके तापत्रय का नाश करता है—इसीलिए उसे देवता कहते हैं—
(‘दे’ = भक्त-देह । ‘व’ = वरदान ।। ‘ता’ = ताप त्रय से त्राण ।)—
‘देहमास्थायभक्तानां वरदानाच्च पार्वति । तापत्रयादिशमनाद्देवता
परिकीर्तिता ।।'२
४. ‘विनियोग’—कौन साधना किस भाव से अनुष्ठित हुई और उसे क्या
प्रयोजन सिद्ध हुआ—यही विनियोग तत्त्व है । ‘‘हमारा लक्ष्य क्या है?’’
‘हम चाहते क्या हैं?’ इसका निर्धारण करके फिर यह पता लगाना चाहिए
कि इस लक्ष्य की सिद्धि करने वाला प्रथम पुरुष कौन था? यही व्यक्ति
मंत्र का ‘‘ऋषि’’ कहलाता है । जिस उपाय से सिद्धि प्राप्त होती है उसे
कहते हैं—‘छन्द’ ।। जिस स्नायुकेन्द्र में वह शक्ति निहित है । उस
स्नायुकेन्द्र में प्राणवायु एवं मनन शक्ति को एकाग्र करके, वहाँ की
प्रसुप्तशक्ति को जगाकर उस केन्द्र में उस शक्ति के प्रकाश एवं
१. यास्क—निरुक्त २. कुलार्णव तन्त्र
द्वितीयोंऽशः ३९३
कार्य-पद्धति को उपलब्ध करना ही उस साधन-पद्धति का 'देवता तत्त्व'
है। उसके बाद उस जाग्रत शक्ति को उद्देश्य साधन में नियुक्त करके
उद्देश्य को सफल करना 'विनियोग तत्त्व' है। ये ही हैं पूजा के प्रारंभिक
मूल तत्त्व ।३ 'कामधेनुतंत्र' में नौ तत्त्वों का विधान किया है जिसमें देवता
तत्त्व भी अंतर्भुक्त है—'देवतत्त्वं प्राणतत्त्वं बिन्दुतत्त्वं च सुन्दरि । ज्ञान तत्त्वं
शक्तित्त्वं योनितत्त्वं तथैव च ।।'५
५. बीजतत्त्व—बीज से ही देवता का आविर्भाव या जन्म होता है—देवतायाः
शरीरं तु बीजादुत्पद्यते ध्रुवम् ।।'६
६. ध्यान—ध्यान से ही सिद्धि होती है—ध्यानेन परमेशानि यद्रूपं
समुपस्थितम् । तदेव परमेशानि ! मंत्रार्थं विद्धि पार्वति ।।७ 'ध्यान' है
अभीष्टदेव का एकनिष्ठ, संयमप्राणित अनुचिन्तन—"यावदिन्द्रियसन्तापमनसा
संनियम्य च । स्वातेनाभीष्टदेवस्य चिन्तनं ध्यानमुच्यते ।।''८
७. 'शक्ति'—शतकोटिमहादिव्य योगिनी प्रतिकारणात् । तीव्रस्फूर्ति प्रदानाच्च
शक्तिरित्यभिधीयते ।।९
८. 'न्यास'—न्यायोपार्जितवित्तानामङ्गेषु विनिवेशनात् । सर्वरक्षा कराद्देवि! 'न्यास'
इत्यभिधीयते ।। 'न्यास' समस्त प्रकार की रक्षा करने की एक आध्यात्मिक
पद्धति है जिसमें कि मंत्र के प्रत्येक अक्षर को उपासक के प्रत्येक अङ्ग में
सथापित किया जाता है ।
'नि' पूर्वक 'अस्' धातु से न्यास शब्द साधित होता है ।
'अस्क्षेपणे स्थापने च', धातु से न्यास शब्द निर्मित होता है । अस्
धातु = क्षेपण करना एवं स्थापन करना । जिसका जो स्थान नहीं है यदि
वह बलपूर्वक वहाँ बैठ जाय तो उसको उस स्थान से हटाकर वहाँ के
प्रकृत स्वामी को बैठाने का नाम है—'न्यास' ।। 'स्वर्गात् निराकृता देवा
इन्द्रोऽभूत् महिषासुरः ।' (इन्द्र को स्वर्ग से निकाल कर महिषासुर स्वयं
इन्द्र बन गया) इसी प्रकार हमारी देह एवं इसके प्रत्येक अवयव एवं
सृजनतत्त्व हमारे नहीं भगवान् के हैं क्योंकि इनके स्वामी वही हैं हम
नहीं । मानव इन्हें 'मेरा' अपना, कहकर, मिथ्या कर्तृत्व का आवरण
डालकर उनसे अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है जिससे कि बंधन में
पड़ जाता है । 'अङ्गन्यास' इस अज्ञानात्मक बंधन को दूर करके शरीर के
प्रत्येक अङ्ग में विभिन्न देवों, भगवत्शक्तियों एवं मंत्राक्षरों की स्थापना करने
का विधान है । यथा—१. करन्यास—ऐं अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ ह्रीं
३. पूजा के त्रिविध रूप हैं—(क) नित्य, (ख) नैमित्तिक, (ग) काम्य-'नित्यं
नैमित्तिकं काम्यं त्रिविधं पूजनं स्मृतम् ।। (शा० त०)
४-५. कामधेनु तन्त्र ६. यामल
७. भूतशुद्धि तन्त्र ८-९. कुलार्णव तन्त्र
३९४ वरिवस्यारहस्ये
तर्जनीभ्यां नमः । ॐ क्लीं मध्यमाभ्यां नमः । ॐ चामुण्डायै
अनामिकाभ्यं नमः आदि ।। २. हृदयादि न्यास—ॐ ऐं हृदयायाय नमः ।
ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा । ॐ क्लीं शिखायै वषट् । ॐ विच्चे नेत्रत्रयाय
वौषट् आदि ।। ३. 'अक्षर न्यास'—ॐ ऐं नमः शिखायाम् । ॐ ह्रीं
नमः दक्षिण नेत्रे । ॐ क्लीं नमः वामनेत्रे, ॐ चां नमः दक्षिणकर्णे
आदि । ४. दिङ्न्यास—ॐ ऐं प्राच्यै नमः ॐ ऐं आग्नेय्यै नमः आदि ।।
५. ऋष्यादिन्यास—ब्रह्मविष्णु ऋषिभ्यो नमः शिरसि । गायत्र्युष्णिगनुष्टप्
छन्देभ्यो नमः मुखे ।। महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वती देवताभ्यो नमः हृदि ।।
ऐं बीजाय नमः गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादयोः । क्लीं कीलकायै नमः
नाभौ । 'मातृकान्यास' 'व्यापक न्यास' आदि अनेकविध न्यास-प्रकार है ।
९. 'मुद्रा'—मुद्रा भी पूजा का एक अङ्ग है । जो देवों को प्रसन्नता प्रदान
करता है और जो मन को तार देता है वही है मुद्रा । यह शरीराङ्गों द्वारा
प्रदर्शित भाव भंगिमा की एक पद्धति है ।१
१०. 'आसन'—सिद्धि प्रदान करने में विनिर्दिष्ट एवं सहायक शरीरावस्थान ही
आसन है—'आत्मसिद्धिप्रदानाच्च सर्वरोगनिवारणात् । नवसिद्धिप्रदानाच्च
आसनं कथितं प्रिये ।।२
दुर्लभमान्तरमङ्गं प्रायो ऽन्तर्मुखजनैस्तदादृत्यम् ।
तोषायैषा तेषामतः प्रदिष्टा रहस्यवरिवस्या ।। १६२ ।।
(श्रीविद्या की उपासना में आन्तरिक अङ्ग की प्रधानता)
आन्तरिक अङ्ग प्रायः दुष्प्राप्य (अविज्ञेय) हैं । इनका अन्तर्मुखी उपासकों द्वारा
सम्मान किया जाना चाहिए । उनकी संतुष्टि के लिए (ही) इस 'वरिवस्यारहस्यम्'
(नामक मेरा यह ग्रंथ) का उपदेश किया गया है ।। १६२ ।।
- प्रकाश *
अन्तर्मुखैर्विषयेष्वनासक्तचित्तैर्जनैः । प्रदिष्टोपदिष्टा, 'विद्ययोः पथि मुनिप्रदिष्टयोः'
इति कालिदासप्रयोगात् ।। १६२ ।। - सरोजिनी *
आचार्य भास्करराय—विद्या के आन्तर अङ्ग—वर्ण-संख्या, उद्धार, काल
(मात्रा), उच्चारण, स्थान, प्रयत्न, रूप, विभिन्न स्थितियाँ, आकार आदि को दुर्लभ
मानते हुए इसे सर्वाधिक महत्व प्रदान करते हैं । उनका कहना है कि मैंने विद्या के
इन्हीं आन्तरिक गुह्य अङ्गों के उद्घाटन एवं निरूपण के उद्देश्य से ही
'वरिवस्यारहस्यम्' ग्रन्थ लिखा ।
१-२. कुलार्णव तन्त्र
द्वितीयोऽंशः ३९५
श्रीविद्या के अङ्ग
बाह्य अङ्ग आन्तरिक अङ्ग
ऋषि छन्द देवता विनियोग बीज शक्ति कीलक न्यास ध्यान नियम पूजा
विद्या के विद्या का काल उच्चारण स्थान प्रयत्न रूप विभिन्न आकार
वर्णों की उद्धार (मात्रा) स्थितियाँ
संख्या
ऋषयश्च्छन्दो दैवतविनियोगा बीजशक्तिकीलािन ।। १६० ।।
न्यासा ध्यानं नियमाः पूजादीनि बहिरङ्गानि ।
बाह्यान्यङ्गानि पुनः प्रायो लोके प्रसिद्ध कल्पानि ।। १६१ ।।
'ऋषि' = हयग्रीव आदि ऋषि ।। 'छन्द' = पंक्ति आदि ।। 'दैवत' =
त्रिपुरसुन्दरी । 'विनियोग' = इष्टार्थजनन् । 'बीज' = वाग्भवादिक ।। 'शक्ति' परा
आदि ।। 'कीलक' = कामराज आदि ।। 'न्यास' = ऋष्यादिन्यास जाल ।।
'ध्यान' = 'अरुणां करुणातरंगिताक्षीम्' आदि ।। 'नियम' = पुण्ड्रेक्षु दण्डभक्षणवर्जन
सङ्कल्पादिक ।। 'पूजा' = पात्र, आसान आदि शान्ति स्तव, नित्य कर्म ; परा
पूजा । केवल पूजा । 'आदि' = होम-तर्पण-परिग्रह ।। 'अन्तर्मुख' = अनासक्त चित्त
वाले लोग ।।
'विद्या के वर्ण'—
(क) 'वाग्भवकूट'—अ + क, ए, ई, अ + ल = (६)
(ख) 'कामराजकूट'—ह + अ, स + अ, क + उ, ह + अ, ल + अ =(१०)
(ग) 'शक्तिकूट'—स + अ, क + अ, ल + अ = (६)
| वर्णों की संख्या | वर्ण | ह्रीं | योग | |||
|---|---|---|---|---|---|---|
| १. 'वाग्भवकूट' के वर्ण | ६ | + | १२ | = | १८ | 'ह्रीं' (लज्जा बीज) तीनों कूटों के अन्त में है अतः उसके १२ अवयव सभी कूटो में जोड़े जायेंगे । |
| २. 'कामराजकूट' के वर्ण | १० | + | १२ | = | २२ | |
| ३. 'शक्तिकूट' के वर्ण | ६ | + | १२ | = | १८ |
३९६ वरिवस्यारहस्ये
विद्योद्धार—
क्रोधीशः श्रीकण्ठरूढः कोणत्रयं लक्ष्मी ।
मांसमनुत्तररुढं वाग्भवकूटं प्रकीर्तितं प्रथमम् ।। ९ . ।।
शिवहंसब्रह्मवियच्छका प्रत्येकमक्षरारुढा द्वित्तीयैक कूटं कथितं तत् काम-
राजाख्यम् ।। १० ।। शिवतो वियतो मुक्त तृतीयमिदमेव शक्तिकूटाख्यम् ।।
हल्लेखानां त्रितयं कूटत्रितयेऽपि योज्यमन्ते स्यात् ।। ११ ।।
कालमात्रा—(१) ई, ए = २ मात्रायें (२) 'ह्रीं' = (बिन्दुरहित) = ३
मात्रा (३) अन्य वर्णों के उच्चारण का काल = आधामात्रा सहित मात्राकाल
१(१/२) मात्रा । (४) बिन्दु का मात्रा-काल = अर्धमात्रा (५) उत्तरवर्ती वर्णों का
उच्चारण-काल अपने पूर्ववर्ती वर्ण का आधा ।
एतामुत्सृज्य जडैः क्रियमाणा बाह्याडम्बरोपारितः ।
प्राणविहीनेव तनुर्विगलितसूत्रेव पुत्तलिका ॥ १६३ ॥
(बाह्याडम्बरोपासना का खण्डन)
इसका परित्याग करके जड़ों के द्वारा जो बाह्याडम्बरों की उपासना की
नराधना की जाती है वह प्राण-विरहित कलेवर एवं सूत्र विरहित कठपुतली की
भाँति (अग्राह्य एवं निरर्थक) है ॥ १६३ ॥
- प्रकाश *
बाह्यो डम्बरो ऽङ्गविस्तारो यस्यां सा । प्राणसूत्रयोरन्तरङ्गत्वात् तदभावेन तथा
तयोर्न कार्यक्षमता तथेति भावः ॥ १६३ ॥ - सरोजिनी *
‘कुलार्णव तंत्र’ में समस्त बाह्योपचारों, बाह्याडम्बरों एवं बाह्योन्मुखी साधनाङ्गों
का प्रत्याख्यान करते हुए कहा गया कि—
१. सर्वोच्च साधना है—'ब्रह्मसद्भाव' (१)
२. मध्य साधना है—'ध्यान धारणाभाव' 'उत्तमो ब्रह्मसद्भावो ध्यानभावस्तु
३. अधमा साधना है—'जपभाव एवं स्तुति' मध्यमः । स्तुतिर्जपोधमो भावो
४. अधमाधमा साधना है—'बाह्यपूजा' बाह्यपूजा धमाधमा ।।'
सारांश यह कि बाह्यपूजा अधमाधमा
साधना है ।
(२)
१. उत्तमा साधना—सहजावस्था 'उत्तमा सहजावस्था मध्यमा
२. मध्यमा साधना—ध्यान-धारणा ध्यानधारणा । जपस्तुतिःस्याद
३. अधमा—शास्त्रचिन्तन धमा होमपूजाधमाधमा ।।'
४. अधमाधमा—लोकचिन्ता
द्वितीयांशः ३९७
(३)
१. उत्तमा—तत्त्वचिन्तन उत्तमा तत्त्वचिन्तास्याज्जप चिन्ता तु
२. मध्यमा—जप चिन्तन मध्यमा । शास्त्रचिन्ताऽधमा ज्ञेया ।
३. अधमसाधन—स्तुति, जप लोक चिन्ताधमाधमा ॥¹
४. अधमाधमसाधना—बाह्यपूजा
(४)
१. कोटि-पूजा के समान—१ स्तोत्र-पाठ पूजा कोटिसमं स्तोत्रं स्तोत्रकोटि
२. कोटि स्तोत्र पाठ—१ जप समञ्जपः । जपकोटि समं ध्यानं
३. कोटि जप—१ ध्यान ध्यान कोटि समोलयः ॥²
४. कोटि ध्यान—१ लय
(५)
१. परममंत्र—नाद नहि नादात् परो मंत्रो न देवः
२. परमदेव—आत्मा स्वात्मनः परः । नानुसंधेः परा
३. परापूजा—अनुसंधान पूजा, नहि तृप्तेः परम् फलम् ॥³
४. परमफल—तृप्ति
‘निरुत्तरतंत्र’ में मानसी पूजा को ही श्रेष्ठतम् कहा गया है—उत्तमा मानसी
पूजा बाह्यापूजा कनीयसी’⁴ ‘कामधेनुतंत्र’ में भावतत्त्व को इसीलिए प्राधान्य दिया
गया है क्योंकि इस तंत्र की मान्यता है कि भावतत्त्व के बिना जो भी साधना या
पूजा की जाएगी वह बाह्याडम्बर मात्र होगी । उसमें कहा गया है कि देवता न तो
काष्ठ में रहता है, न पाषाण में प्रत्युत् मात्र ‘भाव’ में रहता है अतः भाव
मोक्षस्वरूप है—‘न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे च पार्वति । भावेषु विद्यते देवि!
भावो मोक्षस्वरूपकम ॥’ ‘स्वभावेन विना देवी कथं सिद्धिर्यवेत् प्रिये ॥’⁵ भावतत्वं
विना देवि प्रजपेद् यदि कोटिधा । सर्वं तस्य वृथा देवि पर नरकं पदे पदे ॥’⁶
आडम्बर विहीन पूजा का स्वरूप निम्नांकित है—
'पूजा'— ‘न पूजा बाह्य पुष्पादि द्रव्यैर्या प्रथिताऽनिशम् ।
स्वे महिन्द्न्ये धाम्नि सा पूजा या परा स्थितिः ॥⁷
‘पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि सङ्गतिः ।
स्वतंत्रविमलानन्त भैरवीय चिदात्मना ॥⁸
'होम'— महाशून्यालये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् ।
हूयते मनसा सार्धं स होमश्चेतना सुचा ॥⁹
'स्नान'— स्वतंत्रानन्दचिन्मात्रसारः स्वात्मा हि सर्वतः ।
आवेशनं तत्स्वरूपे स्वात्मनः स्नानमीरितम् ॥¹⁰
१-३. कुलार्णव तन्त्र ४. निरुत्तर तन्त्र
५-६. कामधेनु तन्त्र ७. संकेत पद्धति
८. तन्त्रालोक (४।१२१) ९-१०. विज्ञान भैरव
? Wait, the dot is between मand the next character! Wait, look at the next character: Is itङ्गेषु? Let's look at standard Tantra quote: "न्यायोपार्जितवित्तानामङ्गेषु विनिवेशनात् । सर्वरक्षाकराद्देवि न्यास इत्यभिधीयते ॥" (Kulārṇava Tantra 17.55 / 17.68) Yes! In Kulārṇava Tantra: न्यायोपार्जितवित्तानामङ्गेषु विनिवेशनात् । सर्वरक्षाकराद्देवि न्यास इत्यभिधीयते ॥ In the image: न्यायोपार्जितवित्तानामङ्गेषु विनिवेशनात् । Wait, does it have an extra dot overम? Yes, there is a stray mark or dot over म, like मंङ्गेषुor just print defect/ink spot. Let's look closely: it'sन्यायोपार्जितवित्तानामङ्गेषु विनिवेशनात् ।orन्यायोपार्जितवित्तानामंङ्गेषु? It's मङ्गेषुwith maybe a small dot or ink smudge. Transcribingन्यायोपार्जितवित्तानामङ्गेषुorन्यायोपार्जितवित्तानामंङ्गेषु`?
द्वितीयोंऽशः ३९९
३. तत्वज्ञान— १. आगमोत्थ २. विवेकज में से कोई भी क्यों न हो किन्तु
मुक्ति के ये ही साधन है अन्य बाह्याचार नहीं। जब तक बाह्याचारों का त्याग नहीं
किया जाएगा तब तक किसी भी प्रकार तत्त्वज्ञान उदित नहीं होगा—
१. यावत् कामादि दीप्येत् यावत् संसार वासना ।
यावदिन्द्रिय चापल्यं तावत्तत्वकथा कुतः?
२. यावत् प्रयत्नरोगोऽस्ति यावत् सङ्कल्प कल्पना ।
यावन्न मनसः स्थैर्यं ताव-तत्वकथा कुतः?
३. यावद्देहाभिमानश्च ममता यावदस्ति हि ।
यावन्न गुरु कारुण्यं तावत्तत्वकथा कुतः?
४. यावत्तपो व्रतं तीर्थं जपहोमार्चनादिकम् ।
वेद शास्त्रागम कथा तावत्तत्वकथा कुतः ?
५. तस्मात् सर्वप्रयत्नेन सर्वावस्थासु सर्वदा ।
तत्वनिष्ठो भवेद्देवि! यदीच्छेत सिद्धिमात्मनः ॥
६. न वेदाध्ययनान्मुक्तिर्न शास्त्र पठनादपि ।
ज्ञानादेव हि मुक्तिः स्यान्नान्यथा वीरवन्दिते ॥
७. मुक्तिदा गुरुवागेका विद्याः सर्वाविडम्बकाः ।
८. गुरुवक्त्रेण लभ्येत् नाधीतागम कोटिभिः ।
बीजान्मूलं मूलात् क्षेत्रस्यान्तःस्थबाह्यविस्तारौ ।
यद्यप्यनयोः साम्यं प्राधान्यमथापि चान्तरङ्गस्य ॥ १६४ ॥
(कामकला बीज से मूलमंत्र एवं मूलमंत्र से शरीर के बाह्य एवं
आन्तरिक विकास का विवेचन)
कामकला बीज से मूलमन्त्र का एवं मूलमन्त्र से शरीर के आन्तरिक एवं बाह्य
(अङ्गों) का विकास होता है । यद्यपि इन दोनों (आभ्यन्तर एवं बाह्य अङ्गों) में
समानता है तथापि आन्तरिक अङ्ग का ही प्रामुख्य है ॥ १६४ ॥
- प्रकाश *
बीजात् कामकलारूपाद्धान्यादिरूपाच्च । मूलं वृक्षपादो मन्त्रश्च । क्षेत्रस्य शरीरस्य
केदारस्य च । यद्यप्यनयोः साम्यं बीजजन्यत्वाविशेषात्; तथापि 'अन्तरङ्गनाशे
बाह्याङ्गसहितवृक्षनाशः, बाह्याङ्गमात्रनाशे ऽपि न वृक्षस्य न वान्तरङ्गस्य नाशः' इत्यस्य
प्रसिद्धत्वादिति भावः ॥ १६४ ॥ - सरोजिनी *
'बीजान्मूलं'—कामकला बीज से मूलमंत्र ॥ 'बीजं' का अर्थ है 'कामकला
बीज' । 'कामकलाविलास' में कहा गया है कि 'बिन्दु' जो अहङ्कार का रूप है वह
४०० वरिवस्यारहस्ये
श्वेत एवं लोहित बिन्दुओं का सामरस्य है। ‘सूर्य’ काम है । यह ‘काम’ इसलिए
कहा जाता है क्योंकि इसमें कमनीयता है । ‘कला’ बिन्दुद्वय है जो कि चन्द्रमा एवं
अग्नि के रूप में स्थित है । ‘कला’ चन्द्राग्निशरीरी बिन्दु है । यह ‘कामकला
विद्या’ है जो कि देवी के चक्रों के क्रम का वर्णन करती है । जो कोई इसे जानता
है वह मुक्त एवं महात्रिपुरसुन्दरी स्वरूप हो जाता है—
‘इति कामकला विद्या देवी चक्रात्मिका सेयम् ।
विदिता येन स मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरी रूपः ॥१
‘कामबीज’ का अतिशय महत्व है । देवी स्वयं कामबीजस्वरूपिणी है देव मंत्रों
में, विष्णु मंत्रों में परात्पर कामबीज विद्यमान है । कामबीज से विष्णु विग्रह का
प्रकटीकरण होता है—‘शून्यमध्ये स्थिता देवि काम बीज स्वरूपिणी । लकारसंयुता
या सा कृष्णमाता प्रगीयते । सर्वेषु विष्णुमंत्रेषु काम बीजं परात्परं । हृदि शून्ये
महेशानि विष्णोमंत्रं जपेत् प्रिये । ततो वै कामबीजान्तु जायते विष्णु विग्रहं ॥ अतः
काममदं विष्णुं हृदि भावय पार्वति ॥’२ ‘योगिनीहृदय’ में चक्र को भी कामकला
स्वरूप कहा गया है—‘चक्रं कामकलारूपं प्रसारपरमार्थतः ॥’
‘बीजात्’ = कामकलारूप बीज से यथा धान्यादि से । ‘मूलं’ = वृक्ष का
अंकुरादि भाग, जड़ एवं तना ॥ मंत्र ॥ ‘क्षेत्रस्य’ = शरीर का ॥ बीज—मूल—
वृक्षावयव (मानव का शरीराङ्ग) (बाह्य एवं आभ्यन्तर दोनों) । अन्तस्थ-बाह्य =
आन्तर भाग में स्थित एवं बाह्यभाग में स्थित । ‘विस्तारौ’ = “विस्तारो विग्रहो
व्यासः स च शब्दस्य विस्तरः’’ (अमरकोष) । स्तॄञ् आच्छादने (क्र्या० ३० से०)
‘प्रथने वाव शब्दे’ (३।३।३३) इति घञ् ॥
‘यद्यप्यनयोः’ = यद्यपि इन दोनों में । (आन्तर एवं बाह्य दोनों भागों में) ॥
‘साम्यं’ = समानता ॥ ‘समतुल्यः सदृक्षः सदृशः सदृक् । साधारणः समानश्च’
(अमर कोष) ॥ सादृश्य का भाव ॥ समानता का भाव ॥ ‘‘अन्तरङ्गनाशे
बाह्याङ्गसहित वृक्षनाशः, बाह्याङ्गमात्र नाशेऽपि न वृक्षस्य न वान्तरङ्गस्य नाशः ॥’’
‘प्राधान्यं’ = प्रधानता ॥ प्रामुख्य ॥ ‘प्रमुखं प्रथमेमुख्ये’ ।३
“प्रधानं स्यान्महामात्रे प्रकृतौ परमात्मनि ।
प्रज्ञायामपि च क्लीबमेकत्वे तूत्तमे सदा ॥’’४
क्लीबे प्रधानं प्रमुखं प्रवेकानुत्तमोत्त माः ।
मुख्यवर्यवरेण्याश्च प्रवह्रनिवरार्ध्यवत् ॥’’५
‘अङ्ग’ = शरीरावयव । ‘अङ्गंप्रतीकोऽवयवोऽपघनः ॥’ अगिगतौ’ (भ्वा० प०
से०) अच् (३।१।१३४)६ ‘अङ्गं’ गात्रे प्रतीकोपाययोः पुंभूम्नि नीवृति । क्लीबैकत्वे
त्वप्रधाने त्रिष्वङ्गवति चान्तिके ॥’’७
१. कामकलाविलास (पुण्यानन्दनाथ) २. कामधेनु तन्त्र (११ पटल)
३. हैम कोष ४. मेदिनी कोष
५-६. अमर कोष ७. मेदिनी कोष
द्वितीयोऽंशः ४०१
यद्यपीमान्याव श्यकतरत्वादत्र ग्रन्थे निबद्धानि, तथापि पाण्डित्यबलादेतद्-
ग्रन्थावलोकनादेव गुरुमनपेक्ष्य स्वीकारः पापायेत्याह-
सद्गुरुकुलतः कृपया लब्धा कामानियं सूते ।
निजबुद्धिमात्रजन्या पापं कन्या यथा स्वीया ॥ १६५ ॥
('श्रीविद्या' की गुरु-परम्परा से प्राप्ति की अनिवार्यता)
सद्गुरु के कुल द्वारा उसकी अनुकम्पा से सम्प्राप्त यह श्रीविद्या निःशेष
कामनाओं की पूर्ति उत्पन्न करती है । अपनी बुद्धि मात्र से उद्भूत (बिना गुरु की
सहायता से उद्भूत) यह (श्रीविद्या) अपनी आत्मजा की भाँति पाप (उत्पन्न करती
है) ॥ १६५ ॥
- प्रकाश *
पापं सूत इत्यन्वयः । सद्गुरोः 'सुन्दरः सुमुखः स्वस्थः' इत्यादितन्त्रराजोक्त-
लक्षणविशिष्टस्य । कृपया सेवाजनितप्रसादेन,
'पारंपर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः ।
तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥'
इति वचनात् । मरीचयो डाकिन्यादयः । विकुर्वन्ति धातुविकारप्रापणेन
मारयन्तीत्यर्थः । कन्यापक्षे सद्गुरुः श्वशुरः ॥ १६५ ॥ - सरोजिनी *
श्रीविद्या को गुरु-परम्परा मात्र से ही प्राप्त करने पर बल दिया गया है
क्योंकि श्रीविद्या के रहस्यों का उद्घाटन करने एवं रहस्य-साक्षात्कार कराने में मात्र
गुरु ही समर्थ हैं क्योंकि वे ही गुरु भी हैं, शिव भी हैं, शिवा भी है और श्रीविद्या
भी हैं क्योंकि विश्व को उपदेश देने के लिए आदि गुरु भगवान् शिव ने अपने को
ही शिष्य एवं शास्ता के रूप में विभाजित करके शास्त्रोपदेश दिया—
'गुरु शिष्य पदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः ।
प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तंत्रं समवतारयत् ।। (स्वच्छन्द तन्त्र)
ग्रंथकार का कथन है कि जो लोग पाण्डित्य-बल के अभिमान से श्रीविद्या को
ग्रंथावलोकन मात्र से प्राप्त करने का अभिमान रखते हैं और इसको प्राप्त करने हेतु
गुरु की आवश्यकता नहीं समझते वे पापभागी बनते हैं ।¹ शास्त्रों में कहा गया है
कि ऐसे अभिमानी लोग जो परंपरा-प्राप्य इस गुह्य विद्या को मात्र अपने बुद्धि-बल
से प्राप्त कर लेना चाहते हैं उन्हें डाकिनी आदि शक्तियाँ मार डालती हैं—
“पारंपर्य-विहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः ।
तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ।।”
१. भास्कराचार्य—'प्रकाश'
२६ वरि.
४०२ वरिवस्यारहस्ये
(‘मरीचयो डाकिन्यादयः । विकुर्वन्ति धातु-विकारप्रापणेन मारयन्तीत्यर्थः ।’)१
सारे मंत्र एवं सारी विद्यायें गुरुक्रम से ही सम्प्राप्त हैं—‘गुरुक्रमेण संप्राप्तः
संप्रदायार्थ ईरितः ।।’ ‘तथा मंत्राः समस्ताश्च विद्यायामंत्र संस्थिताः ।’’२
ग्रंथकार ने ‘सद्गुरु कृपा’ का महत्व प्रदर्शित करते हुए कहा है कि यह
श्रीविद्या मात्र गुरु-प्रसाद मात्र से फलवती होती है अन्यथा नहीं । गुरु शब्द स्वयं
इसका द्योतक है । ‘गुरु’ शब्द में से ‘ग’ अक्षर सिद्धि का एवं ‘र’ शब्द पापदहन
का एवं ‘उ’ अक्षर शंभु का द्योतक है—‘‘गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेक पापस्य
दाहकः । उकारः शंभुरित्युक्तस्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ।।’’३ इसीलिए ब्रह्मानन्द गिरि
का कथन है कि श्रीविद्या को गुरुमुख से ही ग्रहण करना चाहिए एवं गुरु से
दीक्षित होकर ही मंत्र-साधना में प्रवृत्त होना चाहिए—
‘गुरोर्मुखान्महाविद्यां गृह्णीयात् पापनाशिनीम् ।
तस्माद् यत्नाद् गुरु कृत्वा मंत्रसाधनमाचरेत् ।।४
कहा तो यहाँ तक गया है कि अधर्म-संलग्न व्यक्ति भी द्विजगुरु के मुख से
दीक्षित होने पर समस्त सिद्धियाँ एवं देवत्व प्राप्त कर लेता है—
अधर्मनिरतो भूत्वा कृत्वा द्विजगुरोर्मुखात् ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति शीघ्रं देवत्वमाप्नुयात् ।।५
‘सद्गुरुकुलतः कृपया लब्धा’ = सद्गुरु कुल की कृपा से सम्प्राप्त समस्त
गुह्य आध्यात्मिक विद्यायें गुरु-परम्परा से ही प्राप्त हुई है । भगवान् भैरव भैरवी से,
इसी बात की पुष्टि करते हुए, कहते हैं—‘शृणु देवि महागुह्यं योगिनीहृदयं परम् ।
स्वप्रीत्या कथयाम्यद्य गोपनीयं विशेषतः । कर्णात्कर्णोपदेशेन सम्प्राप्तमवनीतलम् ।’६
कर्णाकर्णिकयैवेदं तंत्रमवनी तलं प्रति सम्यक् प्राप्तं ।।७
‘‘दिव्य-सिद्ध-मानव क्रमेण अतिरहस्यत्वात् कर्णपरम्परामात्र गम्यम् एव ।।’’८
‘मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि हि शास्त्राणि प्रथन्ते’ इति वचनादन्ते
मङ्गलमारचयति—
अकथासनं ह-लक्षान्तरं समासाद्य मामकं ज्ञानम् ।
मामकमेवानन्दं महं ददतो जयन्ति गुरुचरणाः ॥ १६६ ॥
(गुरु-चरणों की वन्दना)
अ क थ के आसन पर स्थित ह ल क्ष त्रिभुज के कोणों पर विद्यमान मदीय
आनन्द को ही मुझे प्रदान करने वाले मदीय गुरुचरणों की जय हो ॥ १६६ ॥
————————————————————————————————
१. भास्कराचार्य—‘प्रकाश’ २. दीपिका
३-५. शाक्तानन्द तरंगिणी ६. योगिनीहृदय
७. भास्करराय—‘सेतुबन्ध’ ८. अमृतानन्द योगी—‘दीपिका’
, त्+वा. Wait, what if it is मामकमप्याभिन्नम्? No, it's definitely त्. Wait, let's look at the letter before भिन्नम्: मामक-म-त्-म? Or मामक-म-त्-या? Wait, could it be मामकमन्त्राभिन्नम्? No, no 'न'. Could it be मामकमत्याभिन्नम्`?
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Let's read the Hindi text:
इस श्लोक में निम्न शब्द विशिष्टार्थक हैं अतः प्रथमतः उन पर ही प्रकाश
डाला जा रहा है—
'अकथासनं', 'हलक्षान्तर', 'गुरुचरण:'—गुरु का स्थान 'सहस्रार'
(ब्रह्मरंध्रसरसीरुह) के भीतर विद्यमान श्वेत वर्ण के बारह दलों से युक्त 'द्वादशदल
कमल' में है और इसीलिए भगवान् शिव ने इसका निरतिशय महत्त्वाङ्कन करते हुए
कहा है—
...
'पादुका पंचक' में “अ” “क” “थ” रेखाओं एवं गुरुचरणों के
४०४ वरिवस्यारहस्ये
ज्योतियों में श्रेष्ठ है तथा इसमें विश्व भी संनिहित है । इस त्रिकोण में 'वामारेखा'
अग्निरूपा, 'ज्येष्ठा' चन्द्ररूपा एवं 'रौद्री' सूर्यरूपा है । 'वामारेखा' दक्षिण से पूर्व
उत्तर पूर्व कोण तक 'ज्येष्ठा'- उत्तर पूर्व से आरंभ होकर उत्तर पश्चिम तक जाती
है एवं 'रौद्री' उत्तर-पश्चिम से आरंभ करके वामा रेखा में मिल जाती है । ये तीनों
बिन्दु 'त्रिपुरा' 'त्रिपुरसुन्दरी' के नाम से भी प्रख्यात है । गुरु के श्रीचरणों से लाल
रङ्ग के समान अमृत बराबर निकलता रहता है । जो साधक इस प्रकार गुरु के
चरण कमल में अपने आत्मा को लीन करता है वह सभी प्रकार के महाबंधनों
और पापों से मुक्त हो जाता है । गुरुश्री के चरण कमल वृक्ष के नये पत्ते के
समान लाल है और उनके नख चन्द्रमा के प्रकाश के समान प्रकाशमान है । यह
कमल अमृतरूपी सरोवर में प्रस्फुटित हुआ है ।
पंचक का संक्षिप्त परिचय निम्नानुसार है—१. द्वादश दल कमल २. अ,
क, थ मिश्रित त्रिकोण ३. नाद, बिन्दु एवं मणिपीठ ४. हंस ५. त्रिकोण या—
१. द्वादशदल कमल २. अ, क, थ से मिश्रित त्रिकोण ३. नाद, बिन्दु ४.
मणिपीठ एवं मण्डल ५. इससे ऊपर 'हंसः' ।।१ शास्त्रों में कहा गया है कि अपने
गुरु का ध्यान करो । वे गुरु स्वयं भगवान् शिव हैं वे मंत्र (या मंत्रमाया) से युक्त
एवं प्रोद्दीप्त उस 'हंसपीठ' पर आसीन हैं जो द्वादशदल कमल की कर्णिका में
स्थित है । यह चन्द्रमण्डल के निकट एवं 'ह' 'ल' 'क्ष' वर्णों से संपूजित है । ये
'ह' 'ल' 'क्ष' वर्ण त्रिकोण में 'अ' 'क' 'थ' रेखायें हैं । गुरु का जो आसन
(मणिपीठ) है वह मंत्रमयपीठ है । इसका मंत्र गुरुमंत्र है जो वाग्भव बीज या 'ऐं'
के रूप में स्थित है । जिस 'द्वादशदल कमल' में गुरुदेव रहते हैं । उसके जो
बारह दल है वे निम्नलिखित हैं—स, ह, ख, फ्रें, ह, स, क्ष, म, ल, व, र, यूं
(अर्थात् इनमें से एक-एक वर्ण प्रत्येक कमल-दल पर अंकित है ।) 'गुरुगीता' में
कहा गया है कि जिस कमल में गुरु का ध्यान किया जाय यह भी भावना की
जाय कि उस कमल के चारों ओर 'हं' एवं 'सः' वर्ण उस कमल के दल के रूप
में उसे घेरे हुए हैं अर्थात् हं एवं सः वर्ण छ बार पुनरावृत्ति करते हुए उस कमल
के बारह दलों के रूप में प्रस्तुत होते हैं ।
'कङ्कालमालिनी' तंत्र में ब्रह्मरंध्र एवं गुरु का स्थान इस प्रकार बताया गया
है—१. सहस्रार की कर्णिका (Pericarp) में 'अन्तरात्मा' स्थित है । २. अन्तरात्मा
के ऊपर गुरु स्थित है । .३. गुरु के ऊपर 'सूर्यमण्डल', 'चन्द्रमण्डल' एवं
'महावायु' स्थित हैं । इसके ऊपर ब्रह्मरंध्र है । किन्तु सारांश यह है कि गुरुधाम
द्वादशदल पद्म है ।
एक हजार दलों वाले, वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण से सुशोभित एवं संपूजित,
अधोमुखी, उदयकालीन सूर्य के समान रक्ताभ मञ्जरियों वाले सहस्रदल कमल के
भीतर उसकी कर्णिका में जो 'द्वादशदलकमल' स्थित है वही गुरु का वास्तविक
धाम है । यह द्वादशदलपद्म 'चित्रीणी नाड़ी' (कुण्डलिनी के सहस्रार में जाने के
मार्ग) के अन्तिम भाग पर स्थित है ।
द्वितीयोंऽशः ४०५
'अ-क-थ'—'पादुकापंचक' में कहा गया है—
“तस्य कन्दलितकर्णिकापुटे, क्लृप्तरेखमकथादिरेखया ।
कोणलक्षित ह ल क्ष मण्डली, भावलक्ष्यम् बलालयं भजे ।।१
'अ' = अ से प्रारंभ होने वाले १६ स्वरों से—'वामा' = (अ से अः) ।।
'क' = क से प्रारंभ होने वाले १६ अक्षरों से—'ज्येष्ठा' = (क से त) ।।
'थ' = थ से प्रारंभ होने वाले १६ अक्षरों से—'रौद्री' = (थ से स) ।।
शक्ति का स्थान इन्हीं तीन रेखाओं से निर्मित (अ-क-थ रेखाओं से निर्मित)
त्रिकोण है । 'कामकला' त्रिकोणात्मक है । तीन शक्तियाँ—वामा, ज्येष्ठा एवं
रौद्री—ही त्रिकोण की तीन रेखायें हैं । ये तीनों रेखायें बिन्दुत्रय से उद्भूत होती
हैं। 'कामकला' शक्ति की निवास भूमि है—निलय है । यामल में कहा गया है
कि—'कामकला' बिन्दुत्रय है, शक्तित्रय है, त्रिमुख अभिव्यक्ति है । 'कामकला'
त्रिशक्तिरूपा (तीन शक्तियों से गठित) है ।२ ये तीन (अ, क, थ) वर्ण तीन
रेखायें हैं जो कि त्रिकोण के तीनों कोणों का निर्माण करती हैं । ('त्रिबिन्दुः सा
त्रिमूर्तिः सा त्रिशक्तिः सा सनातनी ।')
“ह लक्षान्तरं”—इस त्रिकोण (अ-क-थ रेखाओं से निर्मित त्रिकोण) के भीतर
ही 'ह' 'ल' 'क्ष' वर्ण स्थित हैं । 'सात्वत तंत्र' में कहा गया है—“अ-क-थ रेखायें
'ह' 'ल' एवं 'क्ष' वर्णों को चारों ओर से घेरे हुए हैं” यह त्रिकोण 'बिन्दु' (जिससे
समस्त विश्व की उत्पत्ति होती है) से उद्भूत होता है ।
'अ-क-थ' के विषय में काली ऊर्ध्वाम्नाय में कहा गया है कि—१. अ से
विसर्ग तक के वर्ण ब्रह्मा की रेखा (जो प्रजापति की रेखा है) का निर्माण करते
हैं । २. क से त तक के समस्त वर्ण विष्णु की परात्पर रेखा का निर्माण करते
हैं । ३. थ से स तक के समस्त वर्ण शिव की रेखा का निर्माण करते हैं । ये
तीनों रेखायें तीन बिन्दुओं से उद्भूत होती हैं ।
'जयन्ति गुरु चरणाः'—गुरुचरणों की जय हो । गुरु का इतना महत्व क्यों?
परमात्मा ही मूल गुरु है—पतञ्जलि ने योगसूत्रों में कहा है—“पूर्वेषामपि गुरुः
कालेनानवच्छेदात्”३ अर्थात् परमात्मा सबके पूर्वजों का भी गुरु है क्योंकि उसका
काल से अवच्छेद नहीं है । योगवार्तिककार कहते हैं—'पूर्वेषां पूर्वपूर्वसर्गाद्युत्पन्नानां
ब्रह्मविष्णुमहेश्वरादीनामपि गुरुः पिताऽन्तर्यामी विद्यया ज्ञानचक्षुः'४ आचार्य हयग्रीव का
कथन है कि “गुरु विष्णु, शङ्कर, ब्रह्मा, सूर्य एवं शक्ति युक्त है”—“हरिहर
ब्रह्मसूर्यशक्त्यात्मको गुरुः ।।'५ आचार्य अगस्त्य का कथन है कि—“गुरु ही समस्त
देवताओं की आत्मा हैं । गुरुशासन वेदशासन है । गुरुचरण तीर्थ एवं पवित्र गङ्गा
१. पादुका पंचक २. यामल
३. योगसूत्र (समाधिपाद १।२६) ४. विज्ञानभिक्षु—'योगवार्तिक'
५. शाक्तदर्शनम् (५।३)
४०६ वरिवस्यारहस्ये
है । गुरुपाद की धूल ही भस्म है । गुरु की पूजा ही समस्त देवताओं की पूजा
है । गुरु का स्मरण ही समस्त देवताओं का स्मरण है । गुरु समस्त आत्मोपहित
जीवों के मूल शिक्षक (उपदेशक) हैं । गुरु का दर्शन ही समस्त देवताओं का
दर्शन है । वे तारक एवं संसारोद्धारक हैं । यदि गुरु को संतुष्ट कर लिया जाय तो
सारे देवता संतुष्ट हो जाते हैं क्योंकि गुरु की तुष्टि सर्वदेवतुष्टि है । अपना सिर
गुरु के चरणों में, अपने कान गुरु के वाक्यों में, अपने नेत्र गुरु के दर्शन में एवं
अपनी वाणी पंचदशी मंत्र में, चित्त बीज में, हाथ तर्पण में एवं शरीर श्रीपादुका के
अर्चन में लगा रहना चाहिए ।।''१
एक स्थल पर कहा गया है कि गुरु सर्वकारणभूता शक्ति है—
“ॐ श्रीगुरुः सर्वकारणभूता शक्तिः ॥”
'योगिनीतंत्र' में कहा गया है कि जिसे आदिनाथ एवं महाकाल कहा गया है
वही, शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, ऐन्दव, महाशैव एवं सौर—आदि समस्त
सम्प्रदायों में एवं समस्त मंत्रों या मंत्रशास्त्रों में, गुरु कहा गया है ।
आदिनाथो महादेवि ! महाकालो हि यः स्मृतः ।
गुरुः स एव देवेशि ! सर्वमंत्रेऽधुना परः ।
शैवे शाक्ते वैष्णवे चं गाणपत्ये तथैन्दवे ।
महाशैवे च सौरे च स स गुरुर्नत्र संशयः ॥''२
'गुरुगीता' में गुरु के कुछ विशिष्ट लक्षण बताये गए हैं जो निम्न हैं—
१. गुरु केवल एक है ('एक एव गुरुर्देवि')
२. वे ही अनेक रूपों में विद्यमान हैं ('सर्वत्र परिगीयते') ॥
३. समस्त जगत् गुरु-मय है (सर्वं गुरुमयं जगत् ।)३
४. गुरु मात्र एक हैं और वे हैं भगवान् शिव ('गुरुरेकः शिवः प्रोक्तः')४
५. भगवती पार्वती (शक्ति) एवं मंत्र भी गुरु हैं ('गुरुस्त्वमसि देवेशि मन्त्रोऽपि
गुरुरुच्यते' ।)५
६. मंत्र, गुरु एवं देवता—इन तीनों में कोई भेद (पृथकता) नहीं है—(अतो
मंत्रे गुरौ देवे न भेदश्च प्रजायते ।)६
७. गुरु का ध्यान सदैव सहस्रारपद्म में ही करना चाहिए ('कदाचित्तु सहस्रार-
पद्मे ध्येयो गुरुः सदा ।।' 'शिरस्याधः सहस्रारे पद्मे निज गुरुं स्मरेत्' ।।)७
८. कभी-कभी गुरु का ध्यान हृदय में एवं कभी-कभी (गुरु के सन्मुख होने
पर) सामने दृष्टिमार्ग में भी कर लेना चाहिए (कदाचिद् हृदयांभोजे
१. अगस्त्य—'शक्तिसूत्र' २. योगिनी तन्त्र
३-७. गुरुगीता
द्वितीयोंऽशः ४०७
कदाचित् दृष्टि गोचरे ।)१
९. गुरु के शरीर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, पार्वती, इन्द्रादिक देवता,
कुबेरादिक यक्षगण, सिद्धगण, गन्धर्वगण गंगादिक नदियाँ, नागगण एवं
समस्त स्थावरजंगम आदि सभी निवास करते हैं ।
१०. गुरु ही पिता, माता, देवता, महेश्वर हैं (गुरुः पिता गुरुर्माता गुरुर्देवो
महेश्वरः ।)२
११. यदि कोई गुरु को मनुष्य मान ले तो करोड़ों कल्पों में भी उसे साधना
में सफलता नहीं मिल सकती । (‘गुरौ मनुष्यता बुद्धिः शिष्याणां यदि
जायते । न हि तस्य भवेत् सिद्धिःकल्पकोटिशतैरपि’ ।)३
१२. मंत्र एवं गुरुदेव में कभी पृथकता नहीं माननी चाहिए (मंत्रे वा गुरुदेवे वा
न भेदं यस्तु कल्पयेत् ।)४
१३. न तो गुरु से बढ़कर कोई शास्त्र है न तो तप । न तो गुरु से बढ़कर
कोई मंत्र है और न तो कोई फल । न तो गुरु से बढ़कर कोई देवी है
और न तो शिव । न तो गुरु से बढ़कर कोई मुक्ति है औन न तो
जप—
‘‘न गुरोरधिकं शास्त्रं, न गुरोरधिकं तपः ।
न गुरोरधिकं मंत्रं, न गुरोरधिकं फलम् ।
न गुरोरधिका देवी, न गुरोरधिकः शिवः ।
न गुरोरधिका मुक्तिर्न गुरोरधिको जपः ।।’’५
इसीलिए 'गुरुगीता' में कहा गया है कि साधक का मूल कर्तव्य है—
गुरु-सेवा, गुरु-ध्यान, गुरु-स्तोत्र का पाठ, गुरु का जप, गुरु-पूजा, गुरु की तुष्टि
एवं 'गुरु की भक्ति—
‘‘गुरुसेवा गुरुध्यानं . गुरुस्तोत्रं गुरोर्जपः ।
गुरोः पूजा गुरोस्तृप्तिः गुरोर्भक्तिर्नृणां यदि ।।’’
क्योंकि—
‘‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुः देवो महेश्वरः ।
गुरुस्तस्माद् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः ।।’’
गुरु के प्रकार—कूर्मपुराण में दस प्रकार के गुरुओं का वर्णन किया है जो
निम्न है—‘‘उपाध्यायः पिता माता ज्येष्ठो भ्राता महीपतिः । मातुलः श्वशुरश्चैव
मातामहपितामहौ । वर्णज्येष्ठः पितृव्यश्च सर्वे ते गुरवः स्मृताः ।।'’६ कुलगुरु तीन
प्रकार के हैं—१. दिव्यौघ २. सिद्धौघ ३. मानवौघ ।।
──────────────────────────────────────────────
१-५. गुरुगीता ६. कौर्म० उत्तरा (१२।२६)
४०८ वरिवस्यारहस्ये
'दिव्यौघ' यथा प्रह्लादानन्दनाथ, सकलानन्दनाथ आदि ।। 'सिद्धौघ' = भगवान्
शिव ।। 'मानवौघ' = दीक्षागुरु ।।
गुरुओं के अन्य भेद—गुरुओं के अन्य भेद निम्नानुसार है—१. सांसिद्धिक
(अकल्पित) २. कल्पित ३. कल्पिताकल्पित ४. अकल्पितकल्पक ।।
१. 'सांसिद्धिक गुरु'—इन गुरुओं में 'सतर्क' ('शुद्धविद्या') ज्येष्ठा नाम्नी
भगवादिच्छा की प्रेरणा से शिष्य के चित्त में सद्गुरु प्राप्ति की शुभेच्छा । शुद्ध
विद्या का विकास स्वयमेव उत्पन्न हो जाता है । इन्हें बाह्य दीक्षा एवं बाह्य अभिषेक
की आवश्यकता नहीं होती । ये संवित्ति देवताओं द्वारा ही दीक्षित एवं अभिषिक्त
होते हैं । इन्हें बाह्य गुरु अपेक्षित नहीं है । शुद्ध विद्या की ज्योति के प्रभाव के
कारण ऐसा कोई तत्त्व या सत्य हो ही नहीं सकता जो कि इन्हें समझ में न आ
सके । यही प्रातिभ महाज्ञान इन्हें प्राप्त रहता है । इनका ज्ञान—स्वभावज ज्ञान,
स्वभावसिद्ध ज्ञान या 'भित्तिहीन' स्वयंभू ज्ञान कहलाता है । इनके समस्त बंधन
शिथिल हो जाते हैं । इनमें पूर्णशिवभाव का आविर्भाव होता है । इनका प्रयोजन
मात्र दूसरों पर अनुग्रह करना होता है । योगभाष्यकार का 'ईश्वर' के प्रति कथित
यह वाक्य—"तस्य आत्मानुग्रहाभावेऽपि भूतानुग्रह एव प्रयोजनम् ॥"१ चूँकि ये
किसी अन्य गुरु से दीक्षित होकर सिद्धि नहीं पाते प्रत्युत् स्वतः पा लेते हैं अतः
'अकल्पित' कहलाते हैं । 'प्रातिभ ज्ञान' एवं 'अकल्पित गुरु' दोनों अकृत्रिम हैं ।
बौद्ध संप्रदाय में श्रावक एवं 'अनाचार्यक' में यही भेद है कि 'अनाचार्यक' को ज्ञान
पाने के लिए किसी अन्य गुरु की अपेक्षा नहीं होती उसे अपने भीतर से स्वयं
ज्ञान प्राप्त हो जाता है । 'अकल्पित गुरु' अनाचार्यक से श्रेष्ठ होता है ।
२. 'अकल्पित कल्पक गुरु'—सांसिद्धिक गुरु होने पर भी जिनके स्वयंभू
ज्ञान में पूर्णता नहीं होती और स्वयं की प्रतिभा से शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं
उन्हें अकल्पित कल्पक गुरु कहते हैं ।
३. 'कल्पिताकल्पित गुरु'—जो 'कल्पित' होने पर भी गुरु की अपेक्षा न
रखते हुए अपनी प्रतिभा के बल पर लोकोत्तर शास्त्रीय तत्त्व का रहस्यावगाहन कर
लेते हैं वे 'कल्पिताकल्पित' कहलाते हैं इनमें कल्पितांश की अपेक्षा अकल्पितांश
ही प्रधान होता है ।
४. 'कल्पित गुरु'--किसी अकल्पित या अन्य गुरु से दीक्षा लेकर
शास्त्रार्थ-ज्ञान प्राप्त करने वाले और बाद में अभिषेक प्राप्त होने पर परानुग्रह आदि
का अधिकार पाने वाले एवं पाशोच्छेदन में समर्थ ये ही गुरु 'कल्पित' गुरु
कहलाते हैं । कल्पित एवं अकल्पित दोनों गुरु शिष्य का पाशोच्छेदन कर सकते
हैं तथापि 'अकल्पित गुरु' के समक्ष गुरु निष्क्रिय हो जाते हैं अतः 'अकल्पित
गुरु' ही श्रेष्ठतम् गुरु होता है ।
ऐसे भी गुरु होते है जो ज्ञान देकर शिष्य को माया से पार तो कर सकते हैं
१. योगसूत्र पर 'व्यासभाष्य'
द्वितीयोंऽशः ४०९
किन्तु वे भोग या विज्ञान नहीं दे सकते, ये अधिकार नहीं दे सकते। ये मुक्त तो
हो सकते हैं किन्तु दूसरों को मुक्त नहीं कर सकते । ऐसा गुरु 'ज्ञानी गुरु'
कहलाते हैं । ये योगी नहीं होते । ये सद्गुरु नहीं है । 'सद्गुरु' वे ही गुरु हैं जो
ज्ञानी एवं योगी दोनों हैं । ये शिष्य को भोग-मोक्ष, पूर्णत्व, एवं विज्ञान सभी प्रदान
कर सकते हैं ।
जैनानुशासन में जो मंत्र प्रसिद्ध हैं उसमें गुरुओं के ५ प्रकार बताए गए हैं
जो निम्न हैं-“णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो
उवज्झायाणं”१
सद्गुरु एवं असद्गुरु—'मालिनीविजय' में कहा गया है-“...सयियासुः
शिवेच्छया । भुक्ति-मुक्ति प्रसिद्धयर्थं नीयते सद्गुरुं प्रति ॥”२ सारांश यह कि सद्गुरु
का आश्रय ग्रहण किये बिना प्राणी भोग-मोक्ष दोनों की अभिन्नभाव से प्राप्ति नहीं
कर सकता । और पूर्णत्व (मुक्ति) प्राप्त नहीं कर सकता । भाव यह है कि-
सद्गुरु एवं भोग-मोक्ष का दान- 'गुरु' भोग-मोक्ष प्रदायक होता है । भोक्ता
जब भोग्य के साथ एकीभूत हो जाता है तब उस एकीभाव को 'भोग' कहते हैं
एवं उसी को 'मोक्ष' कहते हैं । भोग एवं मोक्ष की साम्यावस्था ही 'जीवन्मुक्ति' एवं
'परमपद' है-
'तस्या भोक्त्याः स्वतन्त्राया भोग्यैकैकार एव यः ।
स एव भोगः सा मुक्तिः स एव परमं पदम् ॥३
भोग एवं मोक्ष की अनुभूति का सामरस्य ही 'जीवन्मुक्ति' है । यही त्रिक
दर्शन की विशेषता है ।४ 'श्रीरत्नदेव' में भी कहा गया है-“भुक्तिर्वाप्यथ मुक्तिश्च
नान्यत्रैकपदार्थतः । भुक्तिमुक्तौ उभेदेवि! विशेषे परिकीर्तिते ॥” यह वह अवस्था है
जिसे विश्वात्मकता कहते हैं । विश्वात्मकता आत्मा का स्वभाव है तथा- 'सर्वो ममायं
विभवः' की आत्मानुभूति है । इस भोग एवं मोक्ष की एकता बौद्ध भी स्वीकार
करते थे । सहजिया कहते थे कि वायु के आवागमन-मार्ग तथा चन्द्र-सूर्य के पथ
को अवरुद्ध करने पर उस घोर तिमिर में बोधिचित्त (मन) को दीपक बनाया जा
सके तो 'महासुख' की प्राप्ति होती है । तब अवधूती जिन रत्न नामक अधऊर्ध्व
पद्म का स्पर्श करती है जिससे भव-निर्वाण दोनों की एक साथ सिद्धि होती है ।
(भवभोग = पञ्च प्रकारक काम गुण ॥ निर्वाण = महामुद्रासाक्षात्कारं ।)
सद्गुरु और पूर्णत्व—जो गुरु परमेश्वर के साक्षात्कार से समुत्पन्न ज्ञान के
साथ तादात्म्यभाव प्राप्त नहीं कर सका है-उसके साथ एकीभूत नहीं हो सका
१. जैनागम में 'पञ्चपरमेष्ठी' प्रसिद्ध है-१. अरिहन्त, २. सिद्ध, ३. आइरियाणं
(आर्य), ४. उवज्झायाणं (उपाध्याय), ५. सव्वसाहूणं (सर्वसाधु)
२. मालिनीविजय तन्त्र ३. प्रबोधपञ्चदशिका
४. महेश्वरानन्द- 'महार्थ मंजरी' (पृ० १७१)
४१० वरिवस्यारहस्ये
है—वह 'गुरु' नहीं है । मुक्ति के दो पक्ष हैं—१. पशुत्व की निवृत्ति २. शिवत्व
की प्राप्ति ।। उपर्युक्त गुरु 'सद्गुरु' इसलिए नहीं हैं क्योंकि उनमें शिष्य की
पशुत्व-निवृत्ति की क्षमता नहीं होती किन्तु फिर भी शिष्य भगवान् की 'वामा'
नामक शक्ति की प्रेरणा से उस गुरु के प्रति प्रगाढ़ भक्ति में लीन रहता है ।
स्वस्वरूप प्राप्त करने के लिए व्याकुल साधक, भगवदिच्छा होने पर शक्तिपात के
कारण पवित्रीभूत होकर, भगवान् की 'ज्येष्ठा' नामक शक्ति की प्रेरणा से
सद्गुरु-प्राप्त्येच्छा से विह्वल होकर (इस सदिच्छा = 'शुद्धविद्या' के विकास या
'सत्तर्क'—की शक्ति से अनुप्राणित होकर) पूर्णत्वरूप मुक्ति प्राप्त करता है ।
आगम सम्मत यह 'पूर्णत्व' न तो सांख्य का कैवल्य है और न तो वेदान्त
की मुक्ति । वेदान्त की मुक्ति 'विज्ञान कैवल्य' के बराबर भी नहीं है ।१ वेदान्त की
मुक्ति सवेद्य प्रलयाकल की अवस्था के समतुल्य है क्योंकि वेदान्त की मुक्ति में
आणवमल विद्यमान रहता है । विज्ञान कैवल्य में आणवमल ध्वंसोन्मुख रहता है ।
न्याय आदि दर्शनों का 'अपवर्ग' आत्मा का सर्वविशेषोच्छेद होने के कारण अपवेद्य
प्रलयाकल के समान है तथा वैष्णवादि का मोक्ष आगम की दृष्टि में प्रलयाकल की
दशा के समान है । विज्ञान कैवल्य में केवली की कर्ममुक्ति होने के कारण
पुनरावृत्ति नहीं होती किन्तु वेदान्त के मोक्ष में पुनरावर्तन निवृत्त नहीं होता ।२
'सत्तर्क' मोक्ष का विधायक है । 'सत्तर्क' का प्राकट्य—१. गुरु द्वारा या २. शास्त्र
द्वारा या ३. स्वतः, होता है । स्वपरामर्श ही प्रधान है ।३
'अकथासनं'—अ क थ ही गुरु का आसन है । 'सहस्रार कमल' की
कर्णिका के मध्य स्थित त्रिकोण रेखा है ये आदि कादि थादि षोडशार्णत्रय रूप हैं।
उसके मध्य कोणों में हकारादित्रय स्थित हैं । यहीं गुरु का ध्यान करने का स्थान
है । यही है गुरु का आसन ।४
अ, क, थ—सहस्रदल कमल के दलों पर पञ्चाशत वर्ण अंकित हैं । उस
अक्षरकर्णिका में गोलाकार चन्द्रमण्डल है । उस चन्द्रमण्डल के ऊपर एक
ऊर्ध्वमुखी द्वादशदल कमल है । उसकी कर्णिका में अ-क-थ आसन स्थित है । यह
त्रिकोण यंत्र है । इस यंत्र के चारों ओर सुधासागर होने से यह मणिद्वीप सदृश है ।
इस द्वीप के मध्य में 'मणिद्वीप' है । इसमें नाद-बिन्दु के ऊपर 'हंसपीठ' है ।
'हंसपीठ' के ऊपर 'गुरुपादुका' है । यह स्थान ही गुरुदेव परमशिव का आसन है।
गुरु का महत्त्व—लोकत्रय में सर्वोच्च देवता ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश हैं ।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
१. जयरथ—तन्त्रालोक टीका (४।३१)
२. द्वैत एवं अद्वैत दोनों आगम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं ।
३. शिष्य में गुरु वाक्य से जो बोध उत्पन्न होता है उसमें शिष्य की प्रज्ञा ही
मूल कारण है—'शिष्यप्रज्ञैव बोधस्य कारणं गुरुवाक्यतः' (योगवाशिष्ठ १।१२८-१६३)
४. भास्कराचार्य—'प्रकाश' (श्लोक १६६)