सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 506, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 506

४०४ वरिवस्यारहस्ये
ज्योतियों में श्रेष्ठ है तथा इसमें विश्व भी संनिहित है । इस त्रिकोण में 'वामारेखा'
अग्निरूपा, 'ज्येष्ठा' चन्द्ररूपा एवं 'रौद्री' सूर्यरूपा है । 'वामारेखा' दक्षिण से पूर्व
उत्तर पूर्व कोण तक 'ज्येष्ठा'- उत्तर पूर्व से आरंभ होकर उत्तर पश्चिम तक जाती
है एवं 'रौद्री' उत्तर-पश्चिम से आरंभ करके वामा रेखा में मिल जाती है । ये तीनों
बिन्दु 'त्रिपुरा' 'त्रिपुरसुन्दरी' के नाम से भी प्रख्यात है । गुरु के श्रीचरणों से लाल
रङ्ग के समान अमृत बराबर निकलता रहता है । जो साधक इस प्रकार गुरु के
चरण कमल में अपने आत्मा को लीन करता है वह सभी प्रकार के महाबंधनों
और पापों से मुक्त हो जाता है । गुरुश्री के चरण कमल वृक्ष के नये पत्ते के
समान लाल है और उनके नख चन्द्रमा के प्रकाश के समान प्रकाशमान है । यह
कमल अमृतरूपी सरोवर में प्रस्फुटित हुआ है ।
पंचक का संक्षिप्त परिचय निम्नानुसार है—१. द्वादश दल कमल २. अ,
क, थ मिश्रित त्रिकोण ३. नाद, बिन्दु एवं मणिपीठ ४. हंस ५. त्रिकोण या—
१. द्वादशदल कमल २. अ, क, थ से मिश्रित त्रिकोण ३. नाद, बिन्दु ४.
मणिपीठ एवं मण्डल ५. इससे ऊपर 'हंसः' ।।१ शास्त्रों में कहा गया है कि अपने
गुरु का ध्यान करो । वे गुरु स्वयं भगवान् शिव हैं वे मंत्र (या मंत्रमाया) से युक्त
एवं प्रोद्दीप्त उस 'हंसपीठ' पर आसीन हैं जो द्वादशदल कमल की कर्णिका में
स्थित है । यह चन्द्रमण्डल के निकट एवं 'ह' 'ल' 'क्ष' वर्णों से संपूजित है । ये
'ह' 'ल' 'क्ष' वर्ण त्रिकोण में 'अ' 'क' 'थ' रेखायें हैं । गुरु का जो आसन
(मणिपीठ) है वह मंत्रमयपीठ है । इसका मंत्र गुरुमंत्र है जो वाग्भव बीज या 'ऐं'
के रूप में स्थित है । जिस 'द्वादशदल कमल' में गुरुदेव रहते हैं । उसके जो
बारह दल है वे निम्नलिखित हैं—स, ह, ख, फ्रें, ह, स, क्ष, म, ल, व, र, यूं
(अर्थात् इनमें से एक-एक वर्ण प्रत्येक कमल-दल पर अंकित है ।) 'गुरुगीता' में
कहा गया है कि जिस कमल में गुरु का ध्यान किया जाय यह भी भावना की
जाय कि उस कमल के चारों ओर 'हं' एवं 'सः' वर्ण उस कमल के दल के रूप
में उसे घेरे हुए हैं अर्थात् हं एवं सः वर्ण छ बार पुनरावृत्ति करते हुए उस कमल
के बारह दलों के रूप में प्रस्तुत होते हैं ।
'कङ्कालमालिनी' तंत्र में ब्रह्मरंध्र एवं गुरु का स्थान इस प्रकार बताया गया
है—१. सहस्रार की कर्णिका (Pericarp) में 'अन्तरात्मा' स्थित है । २. अन्तरात्मा
के ऊपर गुरु स्थित है । .३. गुरु के ऊपर 'सूर्यमण्डल', 'चन्द्रमण्डल' एवं
'महावायु' स्थित हैं । इसके ऊपर ब्रह्मरंध्र है । किन्तु सारांश यह है कि गुरुधाम
द्वादशदल पद्म है ।
एक हजार दलों वाले, वर्णमाला के प्रत्येक वर्ण से सुशोभित एवं संपूजित,
अधोमुखी, उदयकालीन सूर्य के समान रक्ताभ मञ्जरियों वाले सहस्रदल कमल के
भीतर उसकी कर्णिका में जो 'द्वादशदलकमल' स्थित है वही गुरु का वास्तविक
धाम है । यह द्वादशदलपद्म 'चित्रीणी नाड़ी' (कुण्डलिनी के सहस्रार में जाने के
मार्ग) के अन्तिम भाग पर स्थित है ।