वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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है—वह 'गुरु' नहीं है । मुक्ति के दो पक्ष हैं—१. पशुत्व की निवृत्ति २. शिवत्व
की प्राप्ति ।। उपर्युक्त गुरु 'सद्गुरु' इसलिए नहीं हैं क्योंकि उनमें शिष्य की
पशुत्व-निवृत्ति की क्षमता नहीं होती किन्तु फिर भी शिष्य भगवान् की 'वामा'
नामक शक्ति की प्रेरणा से उस गुरु के प्रति प्रगाढ़ भक्ति में लीन रहता है ।
स्वस्वरूप प्राप्त करने के लिए व्याकुल साधक, भगवदिच्छा होने पर शक्तिपात के
कारण पवित्रीभूत होकर, भगवान् की 'ज्येष्ठा' नामक शक्ति की प्रेरणा से
सद्गुरु-प्राप्त्येच्छा से विह्वल होकर (इस सदिच्छा = 'शुद्धविद्या' के विकास या
'सत्तर्क'—की शक्ति से अनुप्राणित होकर) पूर्णत्वरूप मुक्ति प्राप्त करता है ।
आगम सम्मत यह 'पूर्णत्व' न तो सांख्य का कैवल्य है और न तो वेदान्त
की मुक्ति । वेदान्त की मुक्ति 'विज्ञान कैवल्य' के बराबर भी नहीं है ।१ वेदान्त की
मुक्ति सवेद्य प्रलयाकल की अवस्था के समतुल्य है क्योंकि वेदान्त की मुक्ति में
आणवमल विद्यमान रहता है । विज्ञान कैवल्य में आणवमल ध्वंसोन्मुख रहता है ।
न्याय आदि दर्शनों का 'अपवर्ग' आत्मा का सर्वविशेषोच्छेद होने के कारण अपवेद्य
प्रलयाकल के समान है तथा वैष्णवादि का मोक्ष आगम की दृष्टि में प्रलयाकल की
दशा के समान है । विज्ञान कैवल्य में केवली की कर्ममुक्ति होने के कारण
पुनरावृत्ति नहीं होती किन्तु वेदान्त के मोक्ष में पुनरावर्तन निवृत्त नहीं होता ।२
'सत्तर्क' मोक्ष का विधायक है । 'सत्तर्क' का प्राकट्य—१. गुरु द्वारा या २. शास्त्र
द्वारा या ३. स्वतः, होता है । स्वपरामर्श ही प्रधान है ।३
'अकथासनं'—अ क थ ही गुरु का आसन है । 'सहस्रार कमल' की
कर्णिका के मध्य स्थित त्रिकोण रेखा है ये आदि कादि थादि षोडशार्णत्रय रूप हैं।
उसके मध्य कोणों में हकारादित्रय स्थित हैं । यहीं गुरु का ध्यान करने का स्थान
है । यही है गुरु का आसन ।४
अ, क, थ—सहस्रदल कमल के दलों पर पञ्चाशत वर्ण अंकित हैं । उस
अक्षरकर्णिका में गोलाकार चन्द्रमण्डल है । उस चन्द्रमण्डल के ऊपर एक
ऊर्ध्वमुखी द्वादशदल कमल है । उसकी कर्णिका में अ-क-थ आसन स्थित है । यह
त्रिकोण यंत्र है । इस यंत्र के चारों ओर सुधासागर होने से यह मणिद्वीप सदृश है ।
इस द्वीप के मध्य में 'मणिद्वीप' है । इसमें नाद-बिन्दु के ऊपर 'हंसपीठ' है ।
'हंसपीठ' के ऊपर 'गुरुपादुका' है । यह स्थान ही गुरुदेव परमशिव का आसन है।
गुरु का महत्त्व—लोकत्रय में सर्वोच्च देवता ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश हैं ।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
१. जयरथ—तन्त्रालोक टीका (४।३१)
२. द्वैत एवं अद्वैत दोनों आगम इस तथ्य को स्वीकार करते हैं ।
३. शिष्य में गुरु वाक्य से जो बोध उत्पन्न होता है उसमें शिष्य की प्रज्ञा ही
मूल कारण है—'शिष्यप्रज्ञैव बोधस्य कारणं गुरुवाक्यतः' (योगवाशिष्ठ १।१२८-१६३)
४. भास्कराचार्य—'प्रकाश' (श्लोक १६६)