वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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द्वितीयोऽंशः ४०१
यद्यपीमान्याव श्यकतरत्वादत्र ग्रन्थे निबद्धानि, तथापि पाण्डित्यबलादेतद्-
ग्रन्थावलोकनादेव गुरुमनपेक्ष्य स्वीकारः पापायेत्याह-
सद्गुरुकुलतः कृपया लब्धा कामानियं सूते ।
निजबुद्धिमात्रजन्या पापं कन्या यथा स्वीया ॥ १६५ ॥
('श्रीविद्या' की गुरु-परम्परा से प्राप्ति की अनिवार्यता)
सद्गुरु के कुल द्वारा उसकी अनुकम्पा से सम्प्राप्त यह श्रीविद्या निःशेष
कामनाओं की पूर्ति उत्पन्न करती है । अपनी बुद्धि मात्र से उद्भूत (बिना गुरु की
सहायता से उद्भूत) यह (श्रीविद्या) अपनी आत्मजा की भाँति पाप (उत्पन्न करती
है) ॥ १६५ ॥
- प्रकाश *
पापं सूत इत्यन्वयः । सद्गुरोः 'सुन्दरः सुमुखः स्वस्थः' इत्यादितन्त्रराजोक्त-
लक्षणविशिष्टस्य । कृपया सेवाजनितप्रसादेन,
'पारंपर्यविहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः ।
तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ॥'
इति वचनात् । मरीचयो डाकिन्यादयः । विकुर्वन्ति धातुविकारप्रापणेन
मारयन्तीत्यर्थः । कन्यापक्षे सद्गुरुः श्वशुरः ॥ १६५ ॥ - सरोजिनी *
श्रीविद्या को गुरु-परम्परा मात्र से ही प्राप्त करने पर बल दिया गया है
क्योंकि श्रीविद्या के रहस्यों का उद्घाटन करने एवं रहस्य-साक्षात्कार कराने में मात्र
गुरु ही समर्थ हैं क्योंकि वे ही गुरु भी हैं, शिव भी हैं, शिवा भी है और श्रीविद्या
भी हैं क्योंकि विश्व को उपदेश देने के लिए आदि गुरु भगवान् शिव ने अपने को
ही शिष्य एवं शास्ता के रूप में विभाजित करके शास्त्रोपदेश दिया—
'गुरु शिष्य पदे स्थित्वा स्वयं देवः सदाशिवः ।
प्रश्नोत्तरपरैर्वाक्यैस्तंत्रं समवतारयत् ।। (स्वच्छन्द तन्त्र)
ग्रंथकार का कथन है कि जो लोग पाण्डित्य-बल के अभिमान से श्रीविद्या को
ग्रंथावलोकन मात्र से प्राप्त करने का अभिमान रखते हैं और इसको प्राप्त करने हेतु
गुरु की आवश्यकता नहीं समझते वे पापभागी बनते हैं ।¹ शास्त्रों में कहा गया है
कि ऐसे अभिमानी लोग जो परंपरा-प्राप्य इस गुह्य विद्या को मात्र अपने बुद्धि-बल
से प्राप्त कर लेना चाहते हैं उन्हें डाकिनी आदि शक्तियाँ मार डालती हैं—
“पारंपर्य-विहीना ये ज्ञानमात्रेण गर्विताः ।
तेषां समयलोपेन विकुर्वन्ति मरीचयः ।।”
१. भास्कराचार्य—'प्रकाश'
२६ वरि.