सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 508, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 508

४०६ वरिवस्यारहस्ये
है । गुरुपाद की धूल ही भस्म है । गुरु की पूजा ही समस्त देवताओं की पूजा
है । गुरु का स्मरण ही समस्त देवताओं का स्मरण है । गुरु समस्त आत्मोपहित
जीवों के मूल शिक्षक (उपदेशक) हैं । गुरु का दर्शन ही समस्त देवताओं का
दर्शन है । वे तारक एवं संसारोद्धारक हैं । यदि गुरु को संतुष्ट कर लिया जाय तो
सारे देवता संतुष्ट हो जाते हैं क्योंकि गुरु की तुष्टि सर्वदेवतुष्टि है । अपना सिर
गुरु के चरणों में, अपने कान गुरु के वाक्यों में, अपने नेत्र गुरु के दर्शन में एवं
अपनी वाणी पंचदशी मंत्र में, चित्त बीज में, हाथ तर्पण में एवं शरीर श्रीपादुका के
अर्चन में लगा रहना चाहिए ।।''१
एक स्थल पर कहा गया है कि गुरु सर्वकारणभूता शक्ति है—
“ॐ श्रीगुरुः सर्वकारणभूता शक्तिः ॥”
'योगिनीतंत्र' में कहा गया है कि जिसे आदिनाथ एवं महाकाल कहा गया है
वही, शैव, शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, ऐन्दव, महाशैव एवं सौर—आदि समस्त
सम्प्रदायों में एवं समस्त मंत्रों या मंत्रशास्त्रों में, गुरु कहा गया है ।
आदिनाथो महादेवि ! महाकालो हि यः स्मृतः ।
गुरुः स एव देवेशि ! सर्वमंत्रेऽधुना परः ।
शैवे शाक्ते वैष्णवे चं गाणपत्ये तथैन्दवे ।
महाशैवे च सौरे च स स गुरुर्नत्र संशयः ॥''२
'गुरुगीता' में गुरु के कुछ विशिष्ट लक्षण बताये गए हैं जो निम्न हैं—
१. गुरु केवल एक है ('एक एव गुरुर्देवि')
२. वे ही अनेक रूपों में विद्यमान हैं ('सर्वत्र परिगीयते') ॥
३. समस्त जगत् गुरु-मय है (सर्वं गुरुमयं जगत् ।)३
४. गुरु मात्र एक हैं और वे हैं भगवान् शिव ('गुरुरेकः शिवः प्रोक्तः')४
५. भगवती पार्वती (शक्ति) एवं मंत्र भी गुरु हैं ('गुरुस्त्वमसि देवेशि मन्त्रोऽपि
गुरुरुच्यते' ।)५
६. मंत्र, गुरु एवं देवता—इन तीनों में कोई भेद (पृथकता) नहीं है—(अतो
मंत्रे गुरौ देवे न भेदश्च प्रजायते ।)६
७. गुरु का ध्यान सदैव सहस्रारपद्म में ही करना चाहिए ('कदाचित्तु सहस्रार-
पद्मे ध्येयो गुरुः सदा ।।' 'शिरस्याधः सहस्रारे पद्मे निज गुरुं स्मरेत्' ।।)७
८. कभी-कभी गुरु का ध्यान हृदय में एवं कभी-कभी (गुरु के सन्मुख होने
पर) सामने दृष्टिमार्ग में भी कर लेना चाहिए (कदाचिद् हृदयांभोजे
१. अगस्त्य—'शक्तिसूत्र' २. योगिनी तन्त्र
३-७. गुरुगीता