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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 530 में से

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पृष्ठ 504

४०२ वरिवस्यारहस्ये
(‘मरीचयो डाकिन्यादयः । विकुर्वन्ति धातु-विकारप्रापणेन मारयन्तीत्यर्थः ।’)१
सारे मंत्र एवं सारी विद्यायें गुरुक्रम से ही सम्प्राप्त हैं—‘गुरुक्रमेण संप्राप्तः
संप्रदायार्थ ईरितः ।।’ ‘तथा मंत्राः समस्ताश्च विद्यायामंत्र संस्थिताः ।’’२
ग्रंथकार ने ‘सद्गुरु कृपा’ का महत्व प्रदर्शित करते हुए कहा है कि यह
श्रीविद्या मात्र गुरु-प्रसाद मात्र से फलवती होती है अन्यथा नहीं । गुरु शब्द स्वयं
इसका द्योतक है । ‘गुरु’ शब्द में से ‘ग’ अक्षर सिद्धि का एवं ‘र’ शब्द पापदहन
का एवं ‘उ’ अक्षर शंभु का द्योतक है—‘‘गकारः सिद्धिदः प्रोक्तो रेक पापस्य
दाहकः । उकारः शंभुरित्युक्तस्त्रितयात्मा गुरुः स्मृतः ।।’’३ इसीलिए ब्रह्मानन्द गिरि
का कथन है कि श्रीविद्या को गुरुमुख से ही ग्रहण करना चाहिए एवं गुरु से
दीक्षित होकर ही मंत्र-साधना में प्रवृत्त होना चाहिए—
‘गुरोर्मुखान्महाविद्यां गृह्णीयात् पापनाशिनीम् ।
तस्माद् यत्नाद् गुरु कृत्वा मंत्रसाधनमाचरेत् ।।४
कहा तो यहाँ तक गया है कि अधर्म-संलग्न व्यक्ति भी द्विजगुरु के मुख से
दीक्षित होने पर समस्त सिद्धियाँ एवं देवत्व प्राप्त कर लेता है—
अधर्मनिरतो भूत्वा कृत्वा द्विजगुरोर्मुखात् ।
सर्वसिद्धिमवाप्नोति शीघ्रं देवत्वमाप्नुयात् ।।५
‘सद्गुरुकुलतः कृपया लब्धा’ = सद्गुरु कुल की कृपा से सम्प्राप्त समस्त
गुह्य आध्यात्मिक विद्यायें गुरु-परम्परा से ही प्राप्त हुई है । भगवान् भैरव भैरवी से,
इसी बात की पुष्टि करते हुए, कहते हैं—‘शृणु देवि महागुह्यं योगिनीहृदयं परम् ।
स्वप्रीत्या कथयाम्यद्य गोपनीयं विशेषतः । कर्णात्कर्णोपदेशेन सम्प्राप्तमवनीतलम् ।’६
कर्णाकर्णिकयैवेदं तंत्रमवनी तलं प्रति सम्यक् प्राप्तं ।।७
‘‘दिव्य-सिद्ध-मानव क्रमेण अतिरहस्यत्वात् कर्णपरम्परामात्र गम्यम् एव ।।’’८
‘मङ्गलादीनि मङ्गलमध्यानि मङ्गलान्तानि हि शास्त्राणि प्रथन्ते’ इति वचनादन्ते
मङ्गलमारचयति—
अकथासनं ह-लक्षान्तरं समासाद्य मामकं ज्ञानम् ।
मामकमेवानन्दं महं ददतो जयन्ति गुरुचरणाः ॥ १६६ ॥
(गुरु-चरणों की वन्दना)
अ क थ के आसन पर स्थित ह ल क्ष त्रिभुज के कोणों पर विद्यमान मदीय
आनन्द को ही मुझे प्रदान करने वाले मदीय गुरुचरणों की जय हो ॥ १६६ ॥
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१. भास्कराचार्य—‘प्रकाश’ २. दीपिका
३-५. शाक्तानन्द तरंगिणी ६. योगिनीहृदय
७. भास्करराय—‘सेतुबन्ध’ ८. अमृतानन्द योगी—‘दीपिका’