वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयांशः ३९७
(३)
१. उत्तमा—तत्त्वचिन्तन उत्तमा तत्त्वचिन्तास्याज्जप चिन्ता तु
२. मध्यमा—जप चिन्तन मध्यमा । शास्त्रचिन्ताऽधमा ज्ञेया ।
३. अधमसाधन—स्तुति, जप लोक चिन्ताधमाधमा ॥¹
४. अधमाधमसाधना—बाह्यपूजा
(४)
१. कोटि-पूजा के समान—१ स्तोत्र-पाठ पूजा कोटिसमं स्तोत्रं स्तोत्रकोटि
२. कोटि स्तोत्र पाठ—१ जप समञ्जपः । जपकोटि समं ध्यानं
३. कोटि जप—१ ध्यान ध्यान कोटि समोलयः ॥²
४. कोटि ध्यान—१ लय
(५)
१. परममंत्र—नाद नहि नादात् परो मंत्रो न देवः
२. परमदेव—आत्मा स्वात्मनः परः । नानुसंधेः परा
३. परापूजा—अनुसंधान पूजा, नहि तृप्तेः परम् फलम् ॥³
४. परमफल—तृप्ति
‘निरुत्तरतंत्र’ में मानसी पूजा को ही श्रेष्ठतम् कहा गया है—उत्तमा मानसी
पूजा बाह्यापूजा कनीयसी’⁴ ‘कामधेनुतंत्र’ में भावतत्त्व को इसीलिए प्राधान्य दिया
गया है क्योंकि इस तंत्र की मान्यता है कि भावतत्त्व के बिना जो भी साधना या
पूजा की जाएगी वह बाह्याडम्बर मात्र होगी । उसमें कहा गया है कि देवता न तो
काष्ठ में रहता है, न पाषाण में प्रत्युत् मात्र ‘भाव’ में रहता है अतः भाव
मोक्षस्वरूप है—‘न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे च पार्वति । भावेषु विद्यते देवि!
भावो मोक्षस्वरूपकम ॥’ ‘स्वभावेन विना देवी कथं सिद्धिर्यवेत् प्रिये ॥’⁵ भावतत्वं
विना देवि प्रजपेद् यदि कोटिधा । सर्वं तस्य वृथा देवि पर नरकं पदे पदे ॥’⁶
आडम्बर विहीन पूजा का स्वरूप निम्नांकित है—
'पूजा'— ‘न पूजा बाह्य पुष्पादि द्रव्यैर्या प्रथिताऽनिशम् ।
स्वे महिन्द्न्ये धाम्नि सा पूजा या परा स्थितिः ॥⁷
‘पूजा नाम विभिन्नस्य भावौघस्यापि सङ्गतिः ।
स्वतंत्रविमलानन्त भैरवीय चिदात्मना ॥⁸
'होम'— महाशून्यालये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् ।
हूयते मनसा सार्धं स होमश्चेतना सुचा ॥⁹
'स्नान'— स्वतंत्रानन्दचिन्मात्रसारः स्वात्मा हि सर्वतः ।
आवेशनं तत्स्वरूपे स्वात्मनः स्नानमीरितम् ॥¹⁰
१-३. कुलार्णव तन्त्र ४. निरुत्तर तन्त्र
५-६. कामधेनु तन्त्र ७. संकेत पद्धति
८. तन्त्रालोक (४।१२१) ९-१०. विज्ञान भैरव