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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 530 में से

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द्वितीयोंऽशः ४०७
कदाचित् दृष्टि गोचरे ।)१
९. गुरु के शरीर में ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, पार्वती, इन्द्रादिक देवता,
कुबेरादिक यक्षगण, सिद्धगण, गन्धर्वगण गंगादिक नदियाँ, नागगण एवं
समस्त स्थावरजंगम आदि सभी निवास करते हैं ।
१०. गुरु ही पिता, माता, देवता, महेश्वर हैं (गुरुः पिता गुरुर्माता गुरुर्देवो
महेश्वरः ।)२
११. यदि कोई गुरु को मनुष्य मान ले तो करोड़ों कल्पों में भी उसे साधना
में सफलता नहीं मिल सकती । (‘गुरौ मनुष्यता बुद्धिः शिष्याणां यदि
जायते । न हि तस्य भवेत् सिद्धिःकल्पकोटिशतैरपि’ ।)३
१२. मंत्र एवं गुरुदेव में कभी पृथकता नहीं माननी चाहिए (मंत्रे वा गुरुदेवे वा
न भेदं यस्तु कल्पयेत् ।)४
१३. न तो गुरु से बढ़कर कोई शास्त्र है न तो तप । न तो गुरु से बढ़कर
कोई मंत्र है और न तो कोई फल । न तो गुरु से बढ़कर कोई देवी है
और न तो शिव । न तो गुरु से बढ़कर कोई मुक्ति है औन न तो
जप—
‘‘न गुरोरधिकं शास्त्रं, न गुरोरधिकं तपः ।
न गुरोरधिकं मंत्रं, न गुरोरधिकं फलम् ।
न गुरोरधिका देवी, न गुरोरधिकः शिवः ।
न गुरोरधिका मुक्तिर्न गुरोरधिको जपः ।।’’५
इसीलिए 'गुरुगीता' में कहा गया है कि साधक का मूल कर्तव्य है—
गुरु-सेवा, गुरु-ध्यान, गुरु-स्तोत्र का पाठ, गुरु का जप, गुरु-पूजा, गुरु की तुष्टि
एवं 'गुरु की भक्ति—
‘‘गुरुसेवा गुरुध्यानं . गुरुस्तोत्रं गुरोर्जपः ।
गुरोः पूजा गुरोस्तृप्तिः गुरोर्भक्तिर्नृणां यदि ।।’’
क्योंकि—
‘‘गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुः देवो महेश्वरः ।
गुरुस्तस्माद् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरुवे नमः ।।’’
गुरु के प्रकार—कूर्मपुराण में दस प्रकार के गुरुओं का वर्णन किया है जो
निम्न है—‘‘उपाध्यायः पिता माता ज्येष्ठो भ्राता महीपतिः । मातुलः श्वशुरश्चैव
मातामहपितामहौ । वर्णज्येष्ठः पितृव्यश्च सर्वे ते गुरवः स्मृताः ।।'’६ कुलगुरु तीन
प्रकार के हैं—१. दिव्यौघ २. सिद्धौघ ३. मानवौघ ।।
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१-५. गुरुगीता ६. कौर्म० उत्तरा (१२।२६)