वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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'दिव्यौघ' यथा प्रह्लादानन्दनाथ, सकलानन्दनाथ आदि ।। 'सिद्धौघ' = भगवान्
शिव ।। 'मानवौघ' = दीक्षागुरु ।।
गुरुओं के अन्य भेद—गुरुओं के अन्य भेद निम्नानुसार है—१. सांसिद्धिक
(अकल्पित) २. कल्पित ३. कल्पिताकल्पित ४. अकल्पितकल्पक ।।
१. 'सांसिद्धिक गुरु'—इन गुरुओं में 'सतर्क' ('शुद्धविद्या') ज्येष्ठा नाम्नी
भगवादिच्छा की प्रेरणा से शिष्य के चित्त में सद्गुरु प्राप्ति की शुभेच्छा । शुद्ध
विद्या का विकास स्वयमेव उत्पन्न हो जाता है । इन्हें बाह्य दीक्षा एवं बाह्य अभिषेक
की आवश्यकता नहीं होती । ये संवित्ति देवताओं द्वारा ही दीक्षित एवं अभिषिक्त
होते हैं । इन्हें बाह्य गुरु अपेक्षित नहीं है । शुद्ध विद्या की ज्योति के प्रभाव के
कारण ऐसा कोई तत्त्व या सत्य हो ही नहीं सकता जो कि इन्हें समझ में न आ
सके । यही प्रातिभ महाज्ञान इन्हें प्राप्त रहता है । इनका ज्ञान—स्वभावज ज्ञान,
स्वभावसिद्ध ज्ञान या 'भित्तिहीन' स्वयंभू ज्ञान कहलाता है । इनके समस्त बंधन
शिथिल हो जाते हैं । इनमें पूर्णशिवभाव का आविर्भाव होता है । इनका प्रयोजन
मात्र दूसरों पर अनुग्रह करना होता है । योगभाष्यकार का 'ईश्वर' के प्रति कथित
यह वाक्य—"तस्य आत्मानुग्रहाभावेऽपि भूतानुग्रह एव प्रयोजनम् ॥"१ चूँकि ये
किसी अन्य गुरु से दीक्षित होकर सिद्धि नहीं पाते प्रत्युत् स्वतः पा लेते हैं अतः
'अकल्पित' कहलाते हैं । 'प्रातिभ ज्ञान' एवं 'अकल्पित गुरु' दोनों अकृत्रिम हैं ।
बौद्ध संप्रदाय में श्रावक एवं 'अनाचार्यक' में यही भेद है कि 'अनाचार्यक' को ज्ञान
पाने के लिए किसी अन्य गुरु की अपेक्षा नहीं होती उसे अपने भीतर से स्वयं
ज्ञान प्राप्त हो जाता है । 'अकल्पित गुरु' अनाचार्यक से श्रेष्ठ होता है ।
२. 'अकल्पित कल्पक गुरु'—सांसिद्धिक गुरु होने पर भी जिनके स्वयंभू
ज्ञान में पूर्णता नहीं होती और स्वयं की प्रतिभा से शास्त्र ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं
उन्हें अकल्पित कल्पक गुरु कहते हैं ।
३. 'कल्पिताकल्पित गुरु'—जो 'कल्पित' होने पर भी गुरु की अपेक्षा न
रखते हुए अपनी प्रतिभा के बल पर लोकोत्तर शास्त्रीय तत्त्व का रहस्यावगाहन कर
लेते हैं वे 'कल्पिताकल्पित' कहलाते हैं इनमें कल्पितांश की अपेक्षा अकल्पितांश
ही प्रधान होता है ।
४. 'कल्पित गुरु'--किसी अकल्पित या अन्य गुरु से दीक्षा लेकर
शास्त्रार्थ-ज्ञान प्राप्त करने वाले और बाद में अभिषेक प्राप्त होने पर परानुग्रह आदि
का अधिकार पाने वाले एवं पाशोच्छेदन में समर्थ ये ही गुरु 'कल्पित' गुरु
कहलाते हैं । कल्पित एवं अकल्पित दोनों गुरु शिष्य का पाशोच्छेदन कर सकते
हैं तथापि 'अकल्पित गुरु' के समक्ष गुरु निष्क्रिय हो जाते हैं अतः 'अकल्पित
गुरु' ही श्रेष्ठतम् गुरु होता है ।
ऐसे भी गुरु होते है जो ज्ञान देकर शिष्य को माया से पार तो कर सकते हैं
१. योगसूत्र पर 'व्यासभाष्य'