वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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द्वितीयोंऽशः ४०९
किन्तु वे भोग या विज्ञान नहीं दे सकते, ये अधिकार नहीं दे सकते। ये मुक्त तो
हो सकते हैं किन्तु दूसरों को मुक्त नहीं कर सकते । ऐसा गुरु 'ज्ञानी गुरु'
कहलाते हैं । ये योगी नहीं होते । ये सद्गुरु नहीं है । 'सद्गुरु' वे ही गुरु हैं जो
ज्ञानी एवं योगी दोनों हैं । ये शिष्य को भोग-मोक्ष, पूर्णत्व, एवं विज्ञान सभी प्रदान
कर सकते हैं ।
जैनानुशासन में जो मंत्र प्रसिद्ध हैं उसमें गुरुओं के ५ प्रकार बताए गए हैं
जो निम्न हैं-“णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आइरियाणं, णमो
उवज्झायाणं”१
सद्गुरु एवं असद्गुरु—'मालिनीविजय' में कहा गया है-“...सयियासुः
शिवेच्छया । भुक्ति-मुक्ति प्रसिद्धयर्थं नीयते सद्गुरुं प्रति ॥”२ सारांश यह कि सद्गुरु
का आश्रय ग्रहण किये बिना प्राणी भोग-मोक्ष दोनों की अभिन्नभाव से प्राप्ति नहीं
कर सकता । और पूर्णत्व (मुक्ति) प्राप्त नहीं कर सकता । भाव यह है कि-
सद्गुरु एवं भोग-मोक्ष का दान- 'गुरु' भोग-मोक्ष प्रदायक होता है । भोक्ता
जब भोग्य के साथ एकीभूत हो जाता है तब उस एकीभाव को 'भोग' कहते हैं
एवं उसी को 'मोक्ष' कहते हैं । भोग एवं मोक्ष की साम्यावस्था ही 'जीवन्मुक्ति' एवं
'परमपद' है-
'तस्या भोक्त्याः स्वतन्त्राया भोग्यैकैकार एव यः ।
स एव भोगः सा मुक्तिः स एव परमं पदम् ॥३
भोग एवं मोक्ष की अनुभूति का सामरस्य ही 'जीवन्मुक्ति' है । यही त्रिक
दर्शन की विशेषता है ।४ 'श्रीरत्नदेव' में भी कहा गया है-“भुक्तिर्वाप्यथ मुक्तिश्च
नान्यत्रैकपदार्थतः । भुक्तिमुक्तौ उभेदेवि! विशेषे परिकीर्तिते ॥” यह वह अवस्था है
जिसे विश्वात्मकता कहते हैं । विश्वात्मकता आत्मा का स्वभाव है तथा- 'सर्वो ममायं
विभवः' की आत्मानुभूति है । इस भोग एवं मोक्ष की एकता बौद्ध भी स्वीकार
करते थे । सहजिया कहते थे कि वायु के आवागमन-मार्ग तथा चन्द्र-सूर्य के पथ
को अवरुद्ध करने पर उस घोर तिमिर में बोधिचित्त (मन) को दीपक बनाया जा
सके तो 'महासुख' की प्राप्ति होती है । तब अवधूती जिन रत्न नामक अधऊर्ध्व
पद्म का स्पर्श करती है जिससे भव-निर्वाण दोनों की एक साथ सिद्धि होती है ।
(भवभोग = पञ्च प्रकारक काम गुण ॥ निर्वाण = महामुद्रासाक्षात्कारं ।)
सद्गुरु और पूर्णत्व—जो गुरु परमेश्वर के साक्षात्कार से समुत्पन्न ज्ञान के
साथ तादात्म्यभाव प्राप्त नहीं कर सका है-उसके साथ एकीभूत नहीं हो सका
१. जैनागम में 'पञ्चपरमेष्ठी' प्रसिद्ध है-१. अरिहन्त, २. सिद्ध, ३. आइरियाणं
(आर्य), ४. उवज्झायाणं (उपाध्याय), ५. सव्वसाहूणं (सर्वसाधु)
२. मालिनीविजय तन्त्र ३. प्रबोधपञ्चदशिका
४. महेश्वरानन्द- 'महार्थ मंजरी' (पृ० १७१)