वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
३५२ वरिवस्यारहस्ये
वाग्भवकूट का स्वरूप¹—यह 'कादिविद्या' से सम्बद्ध है । २. भगवती का
अपना शरीर वाक्तत्त्व, कामतत्त्व एवं शक्तिकूट द्वारा निर्मित है अतः 'वाग्भवकूट'
भगवती के किरीट के शीर्ष भाग से गले तक का शरीराङ्ग है—शरीराङ्ग-युक्त
पूर्णशरीर इस प्रकार है—
१. अत्र विद्यायां वाक्कूटेन आकण्ठात् कण्ठमभिव्याप्य अर्थात् किरीट
मारभ्यावयवशो विग्रहः प्रतिपाद्यः ।। (वाग्भवकूट)
२. कामराजकूटेन कण्ठाधः कटिपर्यन्तविग्रहः ।
३. शक्तिकूटेन कट्यधः पादाग्रान्तो देहः प्रतिपाद्यः इत्यर्थः ।। 'ललिता
सहस्रनाम' में इनके इस स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है—
'श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूप मुखपङ्कजा । "कूटत्रयकलेवरा"
कण्ठाधः कटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी ।। राजराजेश्वरी
शक्तिकूटैकतापन्नः कट्यधोभागधारिणी । त्रिपुरसुन्दरी देवी
मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेवरा ।।'
१. वाक्कूट, १. [ वाग्भवकूट = भगवती
(किरीट से कण्ठ) के मुकुट से कण्ठ
देवी के शरीराङ्ग तक का भाग
एवं कूटों का
२. कामराज कूट अन्तर्सम्बन्ध । २. [ कामराजकूट = कण्ठ
(कण्ठ से कटि) (देवी के शरीर से कटि तक का भाग
का रहस्यार्थ)
३. शक्तिकूट ३. [ शक्तिकूट = कटि से
(कटि से पादाग्र) पादाग्र तक का भाग
आचार्य भास्करराय ने भी कहा है—
“वाक्काम्-शक्तिकूटैरवयवशो विग्रहो मातुः ।
प्रतिपाद्योऽत्रा कण्ठादामध्यादा च पादाग्रात् ।।’’२
भगवती कूटत्रय कलेवरा है—मूलमन्त्रात्मिका है—
“मूलमंत्रात्मिकामूल कूटत्रयकलेवरा ।
कुलामृतैकरसिका कुलसङ्केतपालिनी ।।”
यह भी कहा गया है—कि 'वाग्भवकूट' देवी के शरीर का एक भाग है—
नेत्रोष्ठापरगलवर्णाशालिवाचां संभूतिर्मुखमिति वाग्भवाख्यकूटमिति ।।”³
१. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक १।१४) । २. ललितासहस्रनाम (१०३) ।
३. सौभाग्यभास्कर' में उद्धृत ।
द्वितीयोंऽशः ३५३
"कूटत्रय" पंचदशी के तीन खण्ड हैं अतः मंत्र के अवयव हैं। देवी स्वयं
मंत्र है अतः कूटत्रयात्मिका एवं मंत्रात्मिका दोनों हैं—
"सर्वशक्तिमयी सर्वमङ्गला सद्गतिप्रिया ।
सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमंत्रस्वरूपिणी ॥ १०३ ॥"
भगवती के इस कूटत्रयात्मक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए आचार्य
भास्करराय कहते हैं—
१. वाग्भव नामकं कूटं पंचक्षराणां समुदाय एवैकं मुख्य स्वं निजं रूपं यस्य
तादृशं मुखपङ्कजं यस्याः ।१
२. कण्ठस्याधः कटिपर्यन्तो यस्य मध्यभागः स एव मध्यस्थ कामराजाख्यस्य
षडक्षरसमूहस्य स्वं निजरूपमस्याः ॥ कहा भी गया है२—"कामस्ते हृदि वसतीति
कामराजं सृष्टत्वात्तदनुतवाम्ब शक्तिकूटमिति ।”
३. मूलस्य कूटत्रयमेवोक्तरीत्या कलेवरं स्थूलरूपं यस्याः, कूटत्रयमेव कलेवरं
सूक्ष्मरूपं यस्या इति वा ॥३
भगवती का 'मूलमंत्रात्मिकामूल कूटत्रय कलेवरा' कहकर 'ललिता सहस्रनाम'
में जो स्वरूप प्रस्तुत किया गया है यह तो मंत्रात्मक स्वरूप है इसी प्रकार उनके
स्वरूप का इस प्रकार भी स्थूल शरीर का वर्णन प्रस्तुत किया गया है४—
"कामकलायां तूर्ध्वबिन्दुरेकस्तदधस्तिर्यग्बिन्दु द्वयं तदधोसार्धकलेति त्रयोऽवयवा
गुरुमुखैक वेद्याः, त एव क्रमाद्विद्याकूट तया स्थूलरूपमुखाद्यवयवात्मना च परिणता
इति सूक्ष्मतरं कुण्डलिन्याख्यं सूक्ष्मतमं वररूपपरं नामद्वयं समष्टि व्यष्टि भेदेनेति
नाथचरणागमे विस्तरः ॥”५
यह भगवती का ब्रह्माण्डान्तर्गत रूप है—'एवं ब्रह्माण्डान्तर्गतरूपमुक्तवा
पिण्डान्तर्गतं कुण्डलिन्याख्यं रूपं वक्तुमुय क्रमते ॥
देवी के दो स्वरूप ————— |——— ब्रह्माण्डान्तर्गतरूप
|——— पिण्डान्तर्गत रूप६
पिण्डान्तर्गत रूप क्या है—"कुलामृतैक रसिकाकुल सङ्केत पालिनी ॥
कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुल योगिनी । अकुला समयान्तस्था समयाचार-
तत्प ॥”७ यह पिण्डगत रूप कुण्डलिनी रूप है—'साहि मूलाधाराख्ये चक्रे
सार्धत्रिवलयाकारेण सुप्ता सती योनिभिरुत्थाप्य षट्चक्राणि ब्रह्म-विष्ण्वादि ग्रंथींश्च
भेदयन्ती सहस्रारं नीत्वा सती तत्कर्णिकारूप चन्द्रमण्डलादमृतं स्रावयति ॥'८
ता एताः सकला अपि कामकला एव न ततो ऽन्याः ।
सामानाधिकरण्यादीकारेणायमर्थो ऽस्य९ ॥ ११६ ॥
१-८. भास्करराय—'प्रकाश' ९. ऽस्याः
२३ वरि.
३५४ वरिवस्यारहस्ये
(प्रथमकूट के छः वर्णों, तीन दम्पतियों एवं कामकला
में अभिन्नता का प्रतिपादन)
वे ये सभी (छः देवता) कामकला ही हैं अन्य नहीं । इसका यह अर्थ ईकार
के सामानाधिकरण्य से (सिद्ध) है ॥ ११६ ॥
- प्रकाश *
एता ब्रह्मादयः षट् । यद्यपि ब्रह्मादीनां पुंस्त्वेन भारतादीनां स्त्रीत्वेन तद्वाचकशब्दे
‘पुमान् स्त्रिया’ इत्येकशेषतः ‘एते’ इत्येव भाव्यम्; तथापि ब्रह्मविष्णुमहेश्वराणां
स्त्रीरूपताया भावार्थप्रकरणे कथितायाः स्मरणायैवमुक्तिः । सामानाधिकरण्यादेक-
विभक्तिकत्वरूपात् । प्रत्यक्षरं विद्यमानानां सुपां तु लोपः । वाक्ये संहिताया
अविवक्षणादीकारेण सह न संधिः ॥ ११६ ॥ - सरोजिनी *
‘ता एताः सकला अपि कामकला एव’ न ततोऽन्याः ॥ उपर्युक्त छः देवता
कामकलाऐं ईकार ही हैं उनसे अन्य नहीं हैं । १. ब्रह्मा-भारती २. विष्णु-लक्ष्मी ३.
एवं रुद्र-पार्वती—यह दिव्य मिथुनत्रिक ईकार (कामकला) से अभिन्न हैं ।
‘कामकला’—‘बह्वृचोपनिषद्’ में कहा गया है—“ॐदेवी ह्येकाग्र आसीत् ।
सैव जगदण्डमसृजत् । कामकलेति विज्ञायते । शृङ्गारकलेति विज्ञायते ॥”¹
विश्व-प्रसवित्री जगज्जननी को ही यहाँ ‘कामकला’ एवं ‘शृङ्गारकला’ दोनों कहा गया
है ।² बिन्दुत्रय—रक्तबिन्दु, शुक्लबिन्दु एवं मिश्रबिन्दु एवं मध्यस्थित महाबिन्दु चारों
मिलकर ‘कामकला’ को प्रकट करते हैं ‘शक्ति’ ‘महाबिन्दु’ से निःसृत होकर शृङ्गार
(सिंघाड़े) के समान त्रिकोणाकार धारण करती है ।
‘श्वेतबिन्दु’—शिवात्मक है । ‘रक्तबिन्दु’—शक्त्यात्मक है । ये दोनों परस्पर
एक दूसरे में प्रविष्ट होते रहते हैं । रक्त एवं श्वेतबिन्दु के समागम से तृतीय बिन्दु
‘मिश्रबिन्दु’ का आविर्भाव होता है । यही ‘अहं’ पद है । इसी में अकार से हकार
पर्यन्त समस्त वर्ण निहित रहते हैं । ‘मिश्रबिन्दु’ ही सूर्य बिन्दु’ कहलाता हैं । यह
बिन्दु अनन्त सौन्दर्य का केन्द्र है । “मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो ।
हरार्धं ध्यायेत् यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ॥”
१. ‘काम’—‘मिश्रबिन्दु’ (सूर्यबिन्दु) अतिकमनीय होने के कारण ‘कर्म’ भी
कहलाता है ।
२. ‘कला’—‘रक्तबिन्दु’ अग्नि एवं ‘श्वेतबिन्दु’ चन्द्रमा—ये दोनों ‘कला’
कहलाते हैं । मूल महाबिन्दु एवं त्रिकोण के तीनों बिन्दु सम्पूर्ण ‘कामकला’ के
स्वरूप का निर्माण करते हैं ।
३. ‘हार्दकला’ महाबिन्दु ही हैं । ‘योगिनीहृदय’ में कहा गया है—‘ज्येष्ठा
१. बह्वृचोपनिषद २. तत्रैव .
द्वितीयोऽंशः ३५५
कामकला—सूर्य
मुख ->
अग्नि -> स्तन [चित्र: कामकला यन्त्र] चन्द्र <- स्तन
हार्द्धकला
(योनि)
ज्ञानं क्रिया शेषमित्येवं त्रितयात्मकम् । चक्रं कामकलारूपं प्रसार परमार्थतः ॥१
'कामकला' में पहले तुरीय बिन्दु उसके नीचे 'काम' नामक बिन्दु एवं उसके
नीचे विसर्गाख्य बिन्दुद्वय एवं नीचे 'हार्द्धकला' स्थित है । १. 'काम' बिन्दु (संमिश्र
बिन्दु) २. विसर्ग (शोण+सित बिन्दु) एवं ३. हार्धकला—इन तीन अवयवों से युक्त
एक अखण्ड पदार्थ 'कामकला' कहलाता है । नित्या षोडशिकार्णव' (वि० ७) में
इसका स्वरूप इस प्रकार व्यक्त किया गया है—'मध्यबिन्दुविसर्गान्तः समास्थानमये
परे । कुटिलारूपके तस्याः प्रतिरूपं वियत्कले ॥'
भास्करराय एवं अमृतानन्द की दृष्टि में 'कामकला' तत्त्व—भास्करराय ने
'सेतुबंध' में 'कामकला' का जो स्वरूप प्रस्तुत किया है उससे अमृतानन्द द्वारा
प्रस्तुत स्वरूप भिन्न है । भास्करराय ने 'बिन्दु' सङ्कल्प्य वक्त्रंतु—(नित्या० षो० १
विश्राम, श्लोक २०१) की व्याख्या करते हुए इसे भिन्न रूप में दिखाया है—
“ऊर्ध्व कामाख्योबिन्दुरेकः तदधोग्नीषोमात्मक बिन्दुद्वितयरूपोन्यः । तदधो हकारार्ध-
रूपः कलाख्यस्तृतीयः तदिदंप्रत्याहारन्यायेन कामकलेत्युच्यते ।२ अमृतानन्द योगी
कहते हैं—"मध्यबिन्दुः ऊर्ध्वबिन्दुः अकार हकार सामरस्यरूपः । कामाख्यः । तदुक्त
'कामकलाविलासे'—बिन्दुरहंकारात्मा रविरेतन्मिथुनसमसाकारः । कामः कमनीय-
तया ॥'३ 'मुखं बिन्दुं' कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधोहारर्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते
मन्मथकलाम् (सौन्दर्यलहरी १९) में भी इससे भिन्नता लक्षित होती है । 'तुरीय
बिन्दु' अतितुर्य तत्त्व है ।
१. योगिनी हृदय २. सेतुबन्ध
३. योगिनीहृदय 'दीपिका' (पृ० ८५-८६)
३५६ वरिवस्यारहस्ये
अहन्तामय त्रिबिन्दु तत्त्वस्वरूप वर्णात्मा ‘कामकला’ त्रिगुणात्मक त्रिकोण रूप
में परिणत होकर जगज्जननी बनती है—
एवं कामकलात्मा त्रिबिन्दुतत्त्वस्वरूप वर्णमयी ।
सेयं त्रिकोणरूपं याता त्रिगुणस्वरूपिणी माता ॥ २५ ॥१
मिश्र, शुक्ल एवं रक्त बिन्दु—त्रिबिन्दुयुक्त, सिङ्गाड़े के आकार का सुन्दर
त्रिकोण है जिसे प्रणव कहते हैं—
बिन्दुत्रयात्मकं स्वात्म शृङ्गार विद्धि सुन्दरमं ।
मिश्रं शुक्लं च रक्तं च पुराणं प्रणवात्मकम् ॥२
कामकलाक्षर बिन्दुत्रयात्मक है और तीनों बिन्दुरूप—सूर्य-सोम-अग्निरूप है ।
सोम सूर्य एवं अग्नि अकार, उकार एवं मकार से अभिन्न हैं ।
‘कामकला’ भगवती महात्रिपुरसुन्दरी ही है—‘‘कामकला महात्रिपुरसुन्दरी ॥’’३
कहा भी गया है—‘इति कामकला विद्या देवीचक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन स
मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरीरूपः ॥४ प्रकाशस्वरूप ‘शिव’ स्फूर्तिरूपा, विमर्शस्वरूपा
‘शक्ति’ में प्रविष्ट होते हैं और ‘बिन्दु’ का आकार ग्रहण कर लेते हैं । शक्ति भी
शिव में प्रवेश करती है । इससे बिन्दु विकसित होता है । उससे ‘नाद’ (स्त्री तत्व)
उद्भूत होता है । बिन्दु एवं नाद मिलकर ‘मिश्रबिन्दु’ बन जाते हैं । इसे ‘काम’
कहा जाता है । श्वेत बिन्दु एवं रक्त बिन्दु (पुरुष-नारी के प्रतीक) पुनः ‘संयुक्त
बिन्दु’ बन जाते हैं । श्वेत-रक्त-मिश्र बिन्दु एक हो जाते हैं—और ‘कामकला’
कहलाते हैं । यहाँ पर ४ शक्तियों का सामरस्य हैं—१. मूलबिन्दु (विश्वोपादान) २.
नाद ३. श्वेत पुरुषबिन्दु ४. रक्त स्त्रीबिन्दु । ये चारों तत्त्व मिलकर ‘कामकला’ का
रूप धारण कर लेते हैं । ग्रन्थान्तर में कहा गया है कि उच्चतमा देवी ‘कामकला’
है । संयुक्त बिन्दु (सूर्य) उसका मुख है । अग्नि-चन्द्र (रक्त + श्वेतबिन्दु) उसके
पयोधर हैं । हार्धकला उसकी योनि है । इसीसे सृष्टि होती है । ‘ह’ अर्धकला है,
ह के आकार का अर्धभाग (हार्धकला) है । अर्धकला या ‘ह’ ही शिव के प्रतीक
‘अ’ अक्षर से मिलकर कामकला (त्रिपुरसुन्दरी) का प्रतीकात्मक रूप है एवं
शिव-शक्ति के संयोग का फल है ।५
‘सामानाधिकरण्यादीकारेण’—‘कामकला’ एवं ईकार एक ही है—अभिन्न है।
अयमेव कूटयोरपि परयोरर्थः परं तु तार्तीये ।
द्वैतीयीकद्वैतीयीकहकारः सकारतः पूर्वः ॥ ११७ ॥
अन्वयितव्योऽक्षरशः शक्तेः शाक्तैर्विभाव्यत्वात् ।
वामेच्छादिशक्तिमयत्वोक्तेरेष शाक्तार्थः ॥ ११८ ॥
१-२. कामकलाविलास ३. चिद्वल्ली
४. कामकलाविलास
५. भण्डारकर—‘वै० शैव और अन्य धार्मिक मत’ (पृ० १६६)
द्वितीयोऽंशः ३५७
(शाक्तार्थ का स्वरूप)
अन्य दो (द्वितीय एवं तृतीय) कूटों का भी यही अर्थ है, तथापि द्वितीय कूट
के द्वितीय 'हकार' को तृतीय कूट के 'सकार' से सम्बंधित करना चाहिए ।
शाक्तों की विभावना (विचारणा) के अनुसार प्रत्येक अक्षर शक्त्यान्वित है एवं वे
(प्रत्येक अक्षर) 'वामा' 'इच्छा' आदि शक्तियों से युक्त (अभिन्न) हैं—यही 'शाक्तार्थ'
है ॥ ११८ ॥
- प्रकाश *
प्रथमकूटस्य यावानर्थस्तावनेव द्वितीयतृतीयकूटयोः । द्वितीयकूटे मध्यमहकारः
परं तृतीयकूटस्य प्रथमभागे ऽन्वययोग्यः । तस्य तत्र चतुर्थत्वे ऽपि सजातीययोर्मध्ये
द्वितीयत्वात्तथोक्तिः । तेन तयोरपि कूटयोः प्रातिस्विकं रेफान्ता वर्णाः षडेव संपद्यन्त
इति तेषामुक्तरीत्यैवार्थवर्णनम् । अत्र प्रत्यक्षरमेकैकत्र शक्तिः । तेन शक्तानामक्षराणा-
मर्थः शाक्तार्थः । स्वार्थे अण् । अथ वा शाक्तानामुपासकानामर्थः प्रयोजनम्, अथ वा
शक्तिसमूहः प्रतिपाद्यत इति त्रेधा निर्वचनम् । भावार्थेन सह पौनरुक्त्यपरिहारस्तु
पूर्वमेव कृतः ॥ ११७-११८ ॥ - सरोजिनी *
प्रत्येक अक्षर शक्ति-समन्वित होता है एवं प्रत्येक अक्षर 'वामा' 'इच्छा' आदि
शक्तियों से अभिन्न होता है । आचार्य भास्करराय कहते हैं—'अत्र प्रत्यक्षर मेकैकत्र
शक्तिः ॥ तेन शक्तानामक्षराणामर्थः शाक्तार्थः । स्वार्थे अण । अथवा शाक्ताना-
मुपासकानामर्थः प्रयोजनम् अथवा शक्ति समूहः प्रतिपद्यत इति वा निर्वचनम् ॥'१
चूँकि प्रत्येक अक्षर शक्ति-समन्वित है अतः शाक्त अक्षरों का अर्थ ही
'शाक्तार्थ' है ।२ शाक्त उपासकों का अर्थ या प्रयोजन भी 'शाक्तार्थ' है । शक्ति
समूह का यहाँ प्रतिपादन किया गया है इसलिए भी इसे शाक्तार्थ कहते हैं ।३
“वामा”– बीजभावस्थितं विश्वं स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी ।
'वामा' विश्वस्य वमनादंकुशाकारतां गता ॥ ३७ ॥४
प्रत्येक शब्द की शक्तिमत्ता का प्रतिपादन सभी तंत्रों में किया गया है—
१. ईकारं परमेशानि स्वयं परम्कुण्डली ।
ब्रह्मविष्णुमयं वर्णं तथा रुद्रमयं सदा ॥५
२. उकारं परमेशानि तारः कुण्डलिनी स्वयं ॥६
१-३. सेतुबन्ध
४. योगिनीहृदय— (क) सर्वं चराचरं विश्वं वर्णान्तु जायते ध्रुवम् ।
(ख) अक्षराज्जायते सर्वं परं ब्रह्म स्वयं शिवे ॥
५-६. कामधेनु तन्त्र
३५८ वरिवस्यारहस्ये
३. ॠकारं परमे शानि स्वयं परमकुण्डली ॥१
पञ्चप्राणमयं वर्णं पंचदेवमयं सदा।
पंचप्राणयुतं वर्णं तथा त्रयगुणात्मकं ॥२
४. ॡकारं परमेशानि कुण्डलीमूर्तिमान स्वयं ।
पञ्चप्राणमयं वर्णं चतुर्ज्ञानमयं सदा ॥३
५. ऐकारः परमं दिव्यं महाकुण्डलिनी स्वयं ॥
६. रक्तविद्युल्लताकारं औकारं कुण्डली स्वयं ॥
७. एकारं परमं दिव्यं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ॥४
८. ककारं परमेशानि कुण्डलीत्रयसंयुक्तं ॥
९. चवर्णं शृणु सुश्रोणि चतुर्वर्गप्रदायकं ।
कुण्डली सहितं देवी! स्वयं परमकुण्डली ॥५
पंचप्राणात्मकं वर्णं पंचप्राणमयं सदा ।
त्रिविन्दु सहितं वर्णं त्रिशक्तिसहितं सदा ॥
१०. लकारं चंचलापांगि कुण्डलीत्रयसंयुक्तं ॥
११. हकारं शृणु चार्वंगि चतुर्वर्गप्रदायकं ।
कुण्डलीत्रयसंयुक्तं रक्तविद्युल्लतोपमं ॥
१२. सकारं शृणु चार्वंगि शक्तिबीजं परात्परं ।
कोटिविद्युल्लताकारं कुण्डलीत्रय संयुक्तं ॥
१३. अकारादिक्षकारान्तं स्वयं परमकुण्डली ॥६
अथ सामरस्यार्थमाह—
कहयोर्लसयोर्थौ शिवशक्ती शुद्धयोरचोः शक्तिः ।
उभयोः समरसभावो हृल्लेखायाः परं ब्रह्म ॥ ११९ ॥
(श्रीविद्या के सामरस्यार्थ का स्वरूप)
‘क’ (कादि विद्या के तीन ककारों), ‘ह’ (दो हकारों), ‘ल’ (तीन लकारों)
एवं ‘स’ (दो सकारों) का अर्थ (क्रमशः) ‘शिव’ एवं ‘शक्ति’ हैं। शुद्ध स्वरों (ए
एवं इ) का अर्थ शक्ति है । हृल्लेखा (ह्रीं) का अर्थ शिव एवं शक्ति का सामरस्य
रूप (समरसभाव रूप) पर ब्रह्म है ॥ ११९ ॥
- प्रकाश *
कादिविद्यायां हि ककारास्त्रयो हकारौ द्वौ । तेषां शिव एवार्थः । एवं
लकारास्त्रयः सकारौ द्वौ, तेषां शक्तिः । अत एव मन्मथबीजे ककारलकारयोर्योगः,
१-६. कामधेनु तन्त्र
द्वितीयोऽंशः ३५९
पराप्रासादे हकारसकारयोः । शुद्धयोर्चोर्द्वितीयतृतीययोः शक्तिः । लज्जाबीजस्योभय-
सामरस्यात्मकं परं ब्रह्मार्थः । व्योमाग्नितुरीयस्वरबिन्दुभिः क्रमेण प्रकाशग्राससामरस्य-
तादात्म्यापन्नेत्र्यर्थस्य परब्रह्मैकरूपस्य षट्चत्वारिंशदुत्तरशततमश्लोकव्याख्यायां स्पष्टी-
करिष्यमाणत्वात् । शिवः शक्तिश्चेत्येतदुभयं ब्रह्मैवेति प्रतिकूटमर्थः । तदुक्तं
त्रिशत्याम्—
'कत्रयं हृद्वयं चैव शैवो भागः प्रकीर्तितः ।
शेषाणि शक्त्यक्षराणि ह्रींकार उभयात्मकः ॥'
- सरोजिनी *
१. 'क' (३ ककार) एवं 'ह' (२ हकार) = 'शिव' ॥ | “कत्रयं हृद्वयं
२. 'ल' (३ लकार) एवं 'स' (२ सकार) = 'शक्ति' ॥ | चैव शैवो भागः
३. शुद्ध स्वर 'ए' 'ई' = शक्ति ॥ | प्रकीर्तितः ।
४. ह्रींकार (ह्रीं = ३ ह्रींकार) = शिव-शक्ति | शेषाणि शक्त्य-
सामरस्य | क्षराणि ह्रींकार
= 'ह्रीं । ह्रीं । ह्रीं ।' | उभयात्मकः ॥'
रूप परब्रह्म ॥ | —'त्रिशती'
'क' = 'ककारान्मदनोदेवि शिवं चाष्टस्वरूपकं ।'
मोक्षस्य मूलं यज्ज्ञानं तस्य मूलं महेश्वरः ।
तस्य पंचाक्षरो मंत्रो मूलमंत्रं गुरोर्वचः ॥
मोक्ष का मूल ज्ञान है । ज्ञान का मूल महेश्वर है । महेश्वर का मूल पंचाक्षर मंत्र है ।
'कादिविद्या' में—(१) ३ककार (२) २ हकार हैं । इनका 'शिव' अर्थ है । (३) ३ लकार है (४) २ सकार हैं = उनका अर्थ है—'शक्ति'
'मन्मथ बीज' में ककारों एवं लकारों का योग है ।
द्वितीय एवं तृतीय कूट में स्थित शुद्ध स्वर 'शक्ति' हैं ।
'लज्जाबीज' (ह्रीङ्कार) उभयसामरस्यात्मक होने के कारण परब्रह्म का वाचक हैं—'लज्जाबीजस्योभयसामरस्यात्मकं परं ब्रह्मार्थः ॥ शिव एवं शक्ति दोनों ब्रह्म ही है—यही प्रत्येक कूट का अर्थ है—"शिवः शक्तिश्चेत्येतदुभयं ब्रह्मैवेति प्रतिकूटमर्थः ॥"१
१. 'क'— ककाराज्जायते सर्वं कामं कैवल्यमेव च ॥१
२. 'ह'— हकारं शृणु चार्वङ्गि चतुर्वर्गप्रदायकं । कुण्डलीत्रयसंयुक्तं ।
३. 'ल'— लकारं चंचलापाङ्गि कुण्डलीत्रयसंयुक्तं ॥३
१-३. कामधेनु तन्त्र
३६० वरिवस्यारहस्ये
४. 'स'— सकारं शृणु चार्वङ्गि शक्तिबीजं परात्परं ।
कोटिविद्युल्लताकारं कुण्डलीत्रय संयुतं ।।१
५. 'ए'— एकारं परमं दिव्यं ब्रह्म विष्णु शिवात्मकः ।।
६. 'ई'— ईकारं परमे शान्ति, स्वयं परम कुण्डली ।।२
'क' ककार— ककारः सर्ववर्णानां मूल प्रकृतिरेव च ।
ककारः कामदा कामरूपिणी स्फुरदव्यया ।।३
कामिनी या महेशानि स्वयं प्रकृतिसुन्दरी ।
माता सा सर्वदेवानां कैवल्यपददायिनी ।।
ऊर्ध्वकोणे स्थिता कामा ब्रह्म शक्तिरितीरिता ।
वामकोणे स्थिता ज्येष्ठा विष्णुशक्तिरितीरिता ।।
दक्षकोणे स्थिता बिन्दु रौद्री संहाररूपिणी ।४
एवं हि कामिनीं ज्ञात्वा ककारं दशधा जपेत् ।।५
'ल'— लकारः पृथिवी बीजं तेजो भू बिम्बमुच्यते ।।६
'स'— सकारश्चन्द्रमा भद्रे कलाषोडशात्मकः ।
'ह'— हकारः शिव उच्यते, अष्टमूर्तिः सदाभद्रे ।७
'ई'— इकारस्तु सदा माया भुवनानि चतुर्दश ।
पालयन्ती परात्साच्छक्र कोणं भवेत् प्रिये ।।८
ब्रह्मैव शिवः शक्तिश्चेति प्रत्येककूटार्थः ।
शिवशक्तिसामरस्याद्विद्याया एष सामरस्यार्थः ।। १२० ।।
(सामरस्यार्थ का स्वरूप)
(तीनो कूटों में से) प्रत्येक कूट का अर्थ (यही) है कि—'शिव एवं शक्ति के
सामरस्य के कारण ब्रह्म ही शिव एवं शक्ति दोनों ही हैं।'—श्रीविद्या का यही
सामरस्यार्थ है ।। १२० ।।
- सरोजिनी *
आचार्य भास्करराय कहते हैं कि जो 'वाग्भव' 'कामराज' एवं 'शक्ति' नामक
तीन कूट हैं उनमें से प्रत्येक कूट का एक ही अर्थ है और वह यह है कि—'शिव
एवं शक्ति के सामरस्य के कारण ब्रह्म ही शिव एवं शक्ति दोनों ही हैं।' यही
पंचदशाक्षरी मंत्र का सामरस्यार्थ भी है ।
'मन्मथबीज' में ककार-लकार दोनों का योग है मन्मथ बीजे ककारयोर्योगः
पराप्रासादे हकारसकारयोः । शुद्ध योरचोर्द्वितीयतृतीयोः शक्तिः । लज्जाबीजस्योभय-
सामरस्यात्मकं परं ब्रह्म अर्थः ।।'
१-५. कामधेनु तन्त्र ६-८. ज्ञानार्णव तन्त्र
द्वितीयोऽंशः ३६१
कादि विद्या में—(१) ३ ककार एवं (२) २ हकार हैं—‘कादिविद्यायां हि
ककारास्त्रयो हकारौ द्वौ ।’ और इनका अर्थ है—‘शिव’—‘‘तेषां शिव एवार्थः ।’’¹
इसी प्रकार इस ‘पंचदशाक्षरी विद्या’ में ३ लकार एवं २ सकार हैं । ये ही
दोनों शक्ति हैं—‘लकारास्त्रयः सकारौ द्वौ, तेषां शक्तिः ॥’²
ह्रींकार—‘लज्जाबीजस्योभयसामरस्यात्मकं परं ब्रह्मार्थः ॥’ अर्थात् इस मंत्र में
स्थित ‘ह्रीं’ का अर्थ है—‘उभय सामरस्यात्मक परब्रह्म’ । शिव एवं शक्ति दोनों ब्रह्म
ही हैं—यही प्रत्येक कूट का अर्थ है—‘शिवः शक्तिश्चेत्येतदुभयं ब्रह्मैवेति प्रतिकूट-
मर्थः । इसीलिए कहा गया है—
‘कत्रयं हद्वयं चैव शैवो भागः प्रकीर्तितः । शेषाणि शक्त्यक्षराणि ह्रींकार
उभयात्मकः ।’³ अर्थात्—
(क) ‘क त्रयं’ (तीनों कूटों में—‘‘क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं । स
क ल ह्रीं’’ मे से तीनों कूटों में, स्थित ककारत्रय)
(ख) ‘हद्वयं’—‘कामराजकूट’ में स्थित हद्विक (दो हकार)
(ग) ‘ह्रीं’—लज्जाबीज ।
१. क त्रयं ] ⎤ पंचदशाक्षरी
२. ह द्वय ] = ‘शैवभाग’ ⎥ मंत्र में
३. ए ई ल स, = ‘शक्त्यक्षर’ ⎥ स्थित
४. ह्रींकार (‘ह्रीं’) = शिवशक्त्यात्मक (उभयात्मक) ⎦ शिव-शक्ति
“शिवः शक्तिश्चेत्येतदुभयं ब्रह्मैवेति प्रतिकूटमर्थः ॥” अर्थात् प्रत्येक कूट का
अर्थ यही है कि—शिव एवं शक्ति दोनों ब्रह्म ही है या ब्रह्म ही शिव-शक्ति हैं ।
अथ समस्तार्थमाह—
कन दीप्ताविति धातोः प्रकाशकत्वं ककारार्थः ।
अध्ययनार्थकतेङः स्यादेकारस्तदीयकरणार्थः ॥ १२१ ॥
(‘ककार’ एवं ‘एकार’ का अर्थ)
‘कनदीप्तौ’ धातु से निष्पन्न ककार का अर्थ प्रकाश । अध्ययनार्थक इङ्धातु
से व्युत्पन्न एकार का अर्थ उसका साधन (अध्ययन का साधन) है ॥ १२१ ॥
- प्रकाश *
कन्यते प्रकाश्यते ऽनेनेति कं प्रकाशकम् । बाहुलको नलोपः । औणादिकः
‘गमन्ताड्डुः’ इति डप्रत्ययो वा । ‘इङ् अध्ययने’ इति धातुरधिपूर्वो ऽपि प्रकृत
──────────────────────────────────────────────
१-३. भास्करराय—‘प्रकाश’
आर्षत्वात्तद्द्विमोकः । अत एव ङः क्विबपि कृते, कित्त्वे ऽपि गुणः । विज्वा कार्यः ।
अधीयते अनेनेत्यध्ययनकरणं बुद्धिः । अनयोः कर्मधारयः । असंधिरार्षः । तत
ईकारेण षष्ठीतत्पुरुषः । लहरीत्यत्राकारलोपः । 'माङ् माने' इति धातोः क्विबपि
तल्लोपे 'प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमनिष्ठवच्च' इति णिचि 'णेरनिटि' इति टिलोपे च म्
इति सिध्यति । प्रकाशकत्वं सूक्ष्मत्वम् । तथा च सूक्ष्ममतिव्यापनाधिक्यं प्रथम-
कूटार्थः ॥ १२१-१२२ ॥
- सरोजिनी *
ककार एवं एकार का अर्थ—दीप्त्यर्थक 'कन् दीप्तौ' धातु से 'क' पद
निष्पन्न होता है । इसका अर्थ है—दीप्ति, प्रभा या प्रकाश ॥ अध्ययनार्थक इङ्
धातु से निष्पन्न एकार का अर्थ उसका करण है—अर्थात् एकार का अर्थ है
अध्ययन का करण या साधन ।
'क'—'पंचदशी मंत्र' का प्रथमाक्षर
द्वितीयोंऽशः ३६३
पंचदशी का लकार = 'लकारः क्षितितत्त्वं' ॥ सकार = 'सकारः चन्द्रबीजं' ।
'लकारः इन्द्रबीजं' ॥ 'ल' = पृथ्वी । इन्द्रबीज ॥ 'स' = चन्द्रबीज ॥¹
'क' = सृष्टि = विधायक ब्रह्मा ।
'ए' = स्थिति = स्थिति-संरक्षक, व्यवस्थापक = विष्णु ॥
'अ' = संहार = संहार विधायक शिव ॥
‘विधिऽहरि-शिव-वचना अपि ककार एकारकोऽकारः ।
सृष्टि-स्थिति भङ्गात्मकतत्तज्जनकत्वलाक्षणिकाः ॥ १४१ ॥
ईश्वरवाचीकारो वक्ति उकारः सदाशिवं ताभ्याम् ।
लक्षणकया तत्र तिरोधानानुग्रहण कृत्यता गदिता ॥ १४२ ॥²
ककार का अर्थ “वरेण्य” भी है—'ककारस्य वरेण्यमर्थः ॥'
ककार का अर्थ—'कामयते स ककारः कामो ब्रह्मैव तत्पदस्यार्थः—'ॐतत्
सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ॥’’³ 'तदिति ब्रह्म शाश्वतम्' के अनुसार
गायत्री का 'तत्' पद एवं पंचदशी का 'क' शब्द दोनों 'ब्रह्म' के वाचक है।
भास्करराय भी यही कहते हैं—'तत्पदार्थो ब्रह्म । तदेव च ककारार्थः ।' 'कं ब्रह्म'—
कहकर श्रुतियों ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की है ।
‘कामयते कामी जायते स एव निरञ्जनोऽकामत्वेनोज्जंभते कामोऽभिधीयते,
तत्परिभाषाया कामः ककारं व्याप्नोति ॥’’ (श्रुति) ॥ अतः 'क' का अर्थ है
‘कामेश्वर’—‘‘कामेश्वर इति तु पर्यवसितम् ॥’’४
प्रस्तुत श्लोक में आचार्य भास्कर ने 'क' का अर्थ मात्र ('कन् दीप्तौ', धातु
से निष्पन्न मानकर) प्रकाश कहा है । 'एकार' का अर्थ है—अध्ययन का साधन ॥
वर्णद्वयमेलनतः प्रकाशिका बुद्धिरित्यर्थः ।
ई व्याप्ताविति धातोस्तस्या व्याप्तिस्तृतीयवर्णार्थः ॥ १२२ ॥
(मंत्राक्षर 'क' 'ए' एवं 'ई' का अर्थ)
दोनों अक्षरों के सम्मिलन का अर्थ है प्रकाशिका बुद्धि । ‘ई व्याप्तौ’—इस
धातु से निष्पन्न तृतीयाक्षर ‘ई’ का अर्थ है ‘व्याप्ति’ ॥ १२२ ॥
- सरोजिनी *
दीप्ति अर्थ प्रदान करने वाले कन् धातु से ककार को निष्पन्न मानने पर 'क'
का अर्थ होगा प्रकाश का साधन—‘कन्यते प्रकाश्यते अनेनेति क प्रकाशकम् । 'क'
= प्रकाशक ॥ 'इङ्ग् अध्ययने' धातु से एकार व्युत्पन्न हुआ । एकार का अर्थ है—
१. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक १४१-१४२) २. भास्करराय—‘प्रकाश’ (६२-६३)
३. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक ६०) ४. भास्करराय—‘प्रकाश’ (६०)
३६४ वरिवस्यारहस्ये
अध्ययन का साधन (बुद्धि) । ‘क + ए’ = इन दोनों का सम्मिलित अर्थ हुआ—
प्रकाशिका बुद्धि ।
'वर्णद्वय मेलनतः प्रकाशिका बुद्धिरित्यर्थः ।।'
‘ई व्याप्तौ’ धातु से निष्पन्न तृतीय वर्ण ‘ई’ का अर्थ है—“व्याप्ति” ।।
तस्य लहर्याधिक्यं तन्निर्माणं मकारार्थः ।
हन हिंसायामिति हं शौर्य प्रत्यर्थिहननकरणत्वात् ॥ १२३ ॥
सं भोगसाधनं धनमुपभोगार्थात् स्यतेः सुनोतेर्वा ।
कमु कान्ताविति धातोरिच्छाविषयो ऽङ्गनादिः कम् ॥ १२४ ॥
एषां गमनं प्रापणमोहाङ्-गत्यर्थधातुजन्यं हम् ।
तस्यातिशयो लहरी तत्र श्लिष्टः सवर्णदीर्घेण ॥ १२५ ॥
ईकारस्तस्यार्थः कीर्तिः सर्वासु दिक्षु दीप्तत्वात् ।
ई दीप्ताविति धातौर्निर्मितिरनयोर्मकारार्थः ॥ १२६ ॥
तदेव तावद्वदति—
वाग्भवकूटस्यार्थः सूक्ष्ममतिव्यापनाधिक्यम् ।
शौर्यधनस्त्रीयशसामाधिक्यं कामराजार्थः ॥ १२७ ॥
एते सम्यक् कलयति सकला हरतेर्हकारः स्यात्।
निखिलजगत्संहर्त्रीत्यर्थस्तस्यापि वर्णस्य ॥ १२८ ॥
ईकारः प्रश्लिष्टः सृष्टिस्थितिरूपदीप्तिकर्त्रर्थः ।
यद्वा हृदि खेदहरे प्रकाशते तेन माता ह्रीः॥ १२९ ॥
सकलान्तेन पदेन ह्रीकारे कर्मधारयः कार्यः ।
तस्य विशेष्यो मः स्यान्नादार्थः संविदर्थो वा ॥ १३० ॥
(लहरी, ह, क, ई, स, म कूटत्रय एवं ह्रीं
आदि का रहस्यार्थ)
उसकी (बुद्धि की) प्रमुखता ‘लहरी’ है । इस प्रमुखता का निर्माण—मकार का
अर्थ है । ‘हन हिंसायाम् धातु’ से निष्पन्न ‘ह’ शब्द शत्रु का हनन करने का कारण
होने के कारण शौर्यार्थक है ।। भोगार्थवाची षो या सु अभिषवार्थवाची सु से निष्पन्न
‘स’ शब्द भोग के साधन धन का वाचक है । ‘कमु कान्तौ’ धातु से निष्पन्न ‘क’
शब्द कामिनी आदि इच्छित पदार्थों का वाचक है ।। गमनार्थी ओहाङ् धातु से
निष्पन्न ‘ह’ का अर्थ इनका (भोगों का) गमन या प्राप्ति है । उनकी (इन सभी
की) प्रभूत प्राप्ति ‘लहरी’ है जिसके साथ ईकार की सवर्ण दीर्घ संधि हुई है ।
द्वितीयोंऽशः ३६५
'ई दीप्तौ' धातु से निष्पन्न 'ई' शब्द का अर्थ है कीर्ति और यह समस्त
दिशाओं में प्रकाशित है । 'म' का अर्थ है—इन दोनों (लहरी एवं ई) की उत्पत्ति।
'वाग्भवकूट' का अर्थ है—सूक्ष्मबुद्धि की विराट व्यापकता । 'कामराजकूट' का
अर्थ है—विक्रम, वित्त, नारी एवं यश की अतिशयता ।
(तृतीय कूटगत) 'स क ल' पद (उपर्युक्त मकारद्वय से प्रतिपादित) उनको
सङ्केतित करता है जो क्रियाओं का निष्पादन करते हैं ।
'ह हरणो' धातु से निष्पन्न “ह्रीं” पद हरणवाचक भी हो सकता है तथा उस
वर्ण का भी अर्थ होता है—'निःशेष संसार की संहर्त्री' ।
(उपर्युक्त ह के साथ) प्रश्लिष्ट संधि-उपहित 'ई' वर्ण—"सृष्टि स्थितिरूपात्मक
दीप्ति (प्रकाश) की विधायिका”—यह अर्थ द्योतित करता है । या 'ह्रीं' शब्द
'माता' का द्योतक है जो कि समस्त भयों को दूर करती हुई हृदय (दहराकाश) में
प्रकाशित होती है ।
'स क ल' वर्णों में पर्यवसित पद के साथ (स्थित) 'ह्रींकार' में कर्मधारय
समास लगाया जाना चाहिए ।। उसका विशेष्य 'मकार' नाद या संविद् (ज्ञान) अर्थ
का वाचक है ।। १२३, १३० ।।
- प्रकाश *
हन्यते ऽनेनेति हं शौर्यम् । 'अनुदात्तोपदेशवनतितनोत्यादीनामनुनासिकलोपो झलि
क्ङिति' इति नलोपः । 'षो अन्तकर्मणि' इति 'षुञ् अभिषवे' इति वा धातोः करणार्थे
डप्रत्यये सम् इति रूपम् । सीयत इति सूयत इति वा सं द्रव्यम् । काम्यत इति कं
स्रक्चन्दनवनितादिकम् । हसकानां द्वन्द्वः । ततो हकारेण प्राप्त्यर्थकेन षष्ठीतत्पुरुषः ।
ततो लहरीपदेन तत्पुरुषः । तत ईकारेण कीर्त्यर्थकेन द्वन्द्वः । ततो मकारेण तत्पुरुषः ।
तथा च शौर्यधनस्त्रीप्राप्त्यतिशयस्य कीर्तेश्च निर्माणं द्वितीयकूटार्थः ॥ १२३, १२६ ॥
तदेव तावद्वदति— स्पष्टम् ॥ १२७ ॥
कूटद्वयस्य द्वन्द्वः । एते निर्माणे सम्यक् कलयतीति सकला । मकारलोपः ।
हरतीति ह्र । 'ई दीप्तौ' इति धातोः ई दीप्तिः । दीप्तिर्नाम सृष्टिः स्थितिश्च । हकारे-
ङ्कारयोः कर्मधारये यणि कृते ह्रीः सृष्ट्यादिपञ्चकृत्यकर्त्रीत्युपलक्षणविधयार्थः । यद्वा,
हरति सर्वं विषयीकरोतीति हृ । क्विक्प् । आगमशास्त्रस्यानित्यत्वात् प्रकृते न तुक् ।
तच्च दहराकाशम् । तत्र प्रकाशत इति ह्रीः । ह्रीकारान्तपदस्य मकारेण कर्मधारयः ।
यद्यपि कूटत्रये ऽपि मकारो नास्त्येव, अनुस्वारस्यैव तन्त्रेषूद्धृतत्वात्; तथापि
मकारस्यैव लक्षणवशादनुस्वार इति कूटद्वये सुवचम् । चरमकूटे त्वनुस्वार एव
विशेष्यो ऽस्तु । ततश्च, बुद्धिशौर्यधनस्त्रीयशसामाधिक्यकर्तृ निखिलजगत्सृष्ट्यादिकर्तृ
दहराकाशवर्ति नादरूपं चिद्रूपं ब्रह्मेति मन्त्रार्थः सिद्धः । अयं चार्थो ब्रह्मसूत्राणां शक्ति-
परत्वेन योजनां प्रदर्शयद्भिस्तत्रभवद्भिर्भाष्यकारैर्विस्तरेण निरूपित इह संक्षिप्योक्तः ।
तत्र क्वचित् क्वचिद् व्याकरणविरोधः प्रतीयते । स च मन्त्रस्य मन्त्रार्थस्य
३६६ वरिवस्यारहस्ये
चर्षिप्रोक्तत्वेन प्रामाणिकत्वे सिद्धे 'प्रयोगशरणा वैयाकरणाः' इत्युक्तेरेतदनुसारेणैव
व्याकरणलक्षणानां कल्प्यत्वात् परिहार्यः ॥ १२८, १३० ॥
तत्प्रकारमेव प्रदर्शयति—
धातोर्बह्वर्थत्वाद् बहुलग्रहणात् पृषोदरादित्वात् ।
आकृतिगणपाठेन स्वेच्छानुगुणादुणादिकल्पनतः ॥ १३१ ॥
छन्दसि सर्वविधीनां वैकल्पिकतावशादमुष्य मनोः ।
सिद्धैः कथिते ऽर्थे ऽस्मिन् वैयाकरणानुशासनानुमतिः ॥ १३२ ॥
(सिद्धों द्वारा स्थापित मंत्रार्थों की व्याकरण द्वारा पुष्टि
की अनिवार्यता का प्रतिपादन)
धातुओं के अनेकार्थक होने के कारण, बहुल को (मान्य परम्परा के रूप में)
ग्रहण करने के कारण, पृषोदरादि में विभिन्न प्रकरणों को सम्मिलित करने के
कारण, (पाणिनीय व्याकरण में) आकृतिगणपाठ होने के कारण, उणादिसूत्रों के
अर्थों को स्वप्रयोजनार्थ स्वेच्छापूर्वक कल्पित करने के कारण, वैदिक ग्रंथों में समस्त
शास्त्रीय विधियों के विकल्पित होने के कारण सिद्धों द्वारा निर्धारित मंत्रों के अर्थ
को वैयाकरणों द्वारा भी स्वीकृति प्रदान की गई है ॥ १३१-१३२ ॥
- प्रकाश *
'कुर्दखूर्दगुर्दगुद क्रीडायामेव' इत्येवकारेण 'तनूकरणे तक्षः' इत्यत्रार्थनिर्देश-
बलाच्च सत्ताद्यर्थनिर्देशस्योपलक्षणमात्रत्वेन धातवो ऽनेकार्थाः । तेन स्यतेरन्तकर्म-
वाचकत्वे ऽप्युपभोगार्थकत्वमविरुद्धम् । अत एव चेडो ऽधिपूर्वत्वात् केवलप्रयोगासंभवे
ऽपि 'इट्किटक्टी गतौ' इत्यत्र प्रश्लिष्ट ईकार एवैतदर्थको भविष्यति, गत्यर्थानां
सर्वेषामपि ज्ञानार्थकत्वात् । बहुलेति ।
'क्वचित् प्रवृत्तिः क्वचिदप्रवृत्तिः क्वचिद् विभाषा क्वचिदन्य एव ।
विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति ॥'
इति बहुलपदार्थः । तेन ल्हीत्यत्राकारलोपः सिद्धः । 'रण्डः' इत्यादिसिद्ध्यर्थ-
मडितो ऽपि जमन्ताड्डस्य डित्त्वमपि सिद्धम्' गत्यन्तरमप्याह—पृषोदरादित्वादिति ।
'पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्' पृषोदरादयः शब्दा यथैव शिष्टैः प्रयुज्यन्ते तथैव साधवः, न
तत्र लक्षणान्तरं मृग्यमित्यर्थः । न चैवं सति स्थलान्तरे ऽपि ल्ह्रीति प्रयोगापत्तिः
पृषोदरशब्दवदिति वाच्यम्, अत्रैव साधुरिति नियमस्वीकारात् । अत एव 'गूढोऽऽत्मा'
इति न स्थलान्तरे प्रयुज्यते । अत एव च विष्णुसहस्रनामभाष्ये 'न्यग्रोधोदुम्बरो ऽश्वत्थः'
इत्यत्र पृषोदरादित्वात् संधिरित्युक्तं शङ्करभगवत्पादैः । गणपाठाभावे त्वाह—आकृतीति ।
षुञ्धातोर्डप्रत्ययादर्शनादाह—स्वेच्छेति ।
'संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे ।
कार्याद्विद्यादनूबन्धमेतच्छास्त्रमुणादिषु ॥'
द्वितीयोंऽशः ३६७
इति वचनाट्टिलोपार्थं डित्त्वकल्पनेत्यर्थः । छान्दसत्वसमाधानं तु निरङ्कुश-
मित्याह—छन्दसीति ॥ १३१-१३२ ॥
- सरोजिनी *
पंचदशी मंत्र के जो विभिन्न अर्थ बताए गए हैं उनकी पुष्टि अनेक प्रकार से
होती है यथा—
१. धातुओं के अनेकार्थक होने के कारण ।
२. बहुल को मान्य परम्परा के रूप में ग्रहण होने के कारण ।
३. पृषोदरादि में विभिन्न प्रकरणों को सम्मिलित करने के कारण ।
४. आकृतिगणपाठ होने के कारण ।
५. उणादि सूत्रों के स्वप्रयोजनार्थ स्वेच्छापूर्वक कल्पित करने के कारण ।
स्वच्छन्दता के अनेक उदाहरण हैं—“क्वचित् प्रवृत्ति क्वचिदप्रवृत्तिः क्वचिद्
विभाषा क्वचिदन्य एव । विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति ॥”
अतः मंत्रों के भी अनेक अर्थ भी हो सकते हैं । ‘बहुल’ का यही उदाहरण है ।
‘पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्’ के अनुसार पृषोदरादिक शब्दों को सभ्य एवं शिष्ट लोगों
द्वारा जिन अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है उन्हें उन्हीं अर्थों में समाज में स्वीकृति
मिल जाती है । ‘संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे । कार्याद्विद्यादनूबन्ध-
मेतच्छास्त्रमुपादिषु” के अनुसार टि के लोपार्थ डित्व की कल्पना की गई है ।
छान्दसत्वसमाधान निरंकुश, नियमों के संयम से परे है । ‘विष्णु सहस्रनाम’ के
भाष्य में ‘न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थः’—प्रसङ्ग में पृषोदरादि के कारण संधि है—ऐसा
शङ्कराचार्य ने स्वीकार किया है । गणपाठ में परिगणित न होने वालों को ‘आकृति’
कहकर स्मरण किया गया है ।
समस्तार्थपदनिरुक्तिपूर्वकमुपसंहरति—
बहुतरसमासयोगात् समस्तपुरुषार्थसाधनत्वोक्तेः ।
संक्षेपात् सारोक्तेः श्रीविद्यायाः समस्तार्थः ॥ १३३ ॥
(मंत्र के ‘समस्तार्थ’ के स्वरूप का विवेचन)
(श्रीविद्या के ‘समस्तार्थ’ के अन्तर्गत) अनेक पदों को समास-युक्त करने के
कारण, समस्त पुरुषार्थों का साधनत्व निष्पादित करने के कारण तथा संक्षिप्त
रूप में श्रीविद्या का सारांश बताने के कारण—इसे श्रीविद्या का ‘समस्तार्थ’ (कहा
गया) है ॥ १३३ ॥ - प्रकाश *
समस्तपदस्यार्थ इति वा, समस्ताः सकला अर्थाः पुरुषार्था यस्मिन्निति वा,
समस्तः संक्षिप्तो ऽर्थ इति वा निरुक्तिः ॥ १३३ ॥
"? It's "ब्रह्मविष्णुपरो" or "परौ"?
Wait, ककारैकारौ is dual masculine (dvandva, tau), so the adjective must be "ब्रह्मविष्णुपराै" -> "ब्रह्मविष्णुपरो" with an extra slant, i.e., "परौ". Wait, look at 'रो' in 'ककारैकारौ': 'रौ' has one vertical and two slants.
Look at 'परो' / 'परौ': it has one vertical and two slants! So it is "परौ"!
Wait, let's look at the first part: "ब्रह्मविष्णुपराै"? No, "ब्रह्मविष्णू"?
Look at 'विष्णु': it's 'विष्णु' with short u? No, look at the hook below 'ष्ण': it's short u: "ब्रह्मविष्णुपराै" or "ब्रह्मविष्णुपरो"?
Wait, let's look at L28 again:
"इति चैकाक्षरनिघण्टूक्तब्रह्मविष्णुपरो ककारैकारौ" or "ब्रह्मविष्णुपराै ककारैकारौ"? It looks like "ब्रह्मविष्णुपराै" with a typo or "ब्रह्मविष्णुपरो". Let's look at the matra: it's definitely 'ौ' or 'ो' - wait, in "ककारैकारौ", it has 'ौ'. Before that, "ब्रह्मवि
द्वितीयोंऽशः ३६९
इत्यत्र वज्रपाणिशब्देन लकार एवोद्धृतो न ळकारः तथापि लळयोरभेदाभिप्रायेणेदम् ।
अत एव क्वचित्तन्त्रे त्रिखण्डीगतास्त्रयो ऽपि मोहार्णपदेन ळकारा एवोद्धृताः ।
नपुंसकमिति । अव्ययमित्येव युक्तम्, स्वरादेराकृतिगणत्वात् । अत एव त्रिशत्यामेकोन-
शततमस्य नाम्नो नमोयोगे चतुर्थ्यां प्राप्तायामपि 'ह्रीं नमः' इत्येव सांप्रदायिकानां
प्रयोगः सङ्गच्छते ॥ १३४-१३६ ॥
- सरोजिनी *
“कः प्रजापतिरुद्दिष्टः” = ‘क’ = ब्रह्मा ॥
“एकार उच्यते विष्णुः ॥” = ‘ए’ = विष्णु ॥
“अकारो ब्रह्मविष्ण्वीशकमठेषु” = ‘अ’ = ईश ॥
प्रथमकूट = ऋग्वेदात्मक । “कामराजकूट” = यजुर्वेदात्मक ॥
तृतीयकूट = सामवेदात्मक ॥
अनुत्तर अकार
२४ वरि.
३७० वरिवस्यारहस्ये
‘अ’ = १. परमात्मा । परमशिव
२. आत्मा
३. चराचर जगत का बीज
४. समस्त वर्णमाला में अनुस्यूत एवं उसका जनक
५. वर्णमाला की आत्मा एवं सर्वसार तत्त्व
६. शब्द ब्रह्म ] तान्त्रिक योग की चरमोपलब्धि है—‘अहं’ =
७. प्रथम स्पन्द ] ‘पूर्णहन्ता’ । ‘पूर्णहन्ता’ है—पूर्ण ‘अ + ह’
८. शिव + शक्ति से अभिन्न अहं ही मन्त्र है । यही अहं अपरिमेय
पूर्णहन्ता में परिणत हो जाता है ।
अबिन्दुविसर्गं च अकारं जपतो महान् ।
उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥ (विज्ञान भैरव)
हसकं तु हसद्वदनं मतं ककारस्य वदनवाचित्वात् ।
यद्वा हस आनन्दः कः सूर्यो हस्तु चन्द्रः स्यात् ॥ १३७ ॥
एतौ लौ नयने यस्य तत्तु कहलं रवीन्दुनेत्रमिति ।
तेन प्रकाशकत्वाच्चिद्रूपत्वं च निगदितं भवति ॥ १३८ ॥
विधिहरिगिरिशेड्यत्वे हेतू एते हसत्वकहलत्वे ।
तेनात्यमितानन्दं चिद्ब्रह्मेति द्वितीयकूटार्थः ॥ १३९ ॥
(ह स क ह ल का अर्थ)
ककार के मुखार्थक होने के कारण ‘ह स क’ (वर्णों) का अर्थ ‘हँसता हुआ
मुख’ समझना चाहिए । या ‘ह स’ का अर्थ ‘आनन्द’, ‘क’ का सूर्य एवं ‘ह’ का
अर्थ चन्द्रमा हो (है) । ये दोनों (क एवं ह अर्थात् सूर्य एवं चन्द्रमा) जिसके नेत्र
(ल) हैं वह सूर्यचन्द्रनयनी ‘क ह ल’ है । अतः प्रकाशक होने के कारण (उसकी)
चैतन्यरूपता कही गई है ।
ये दोनों ‘हसत्व’ एवं ‘कहलत्व’ (ही) ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र के द्वारा ब्रह्म के
स्तुत्य होने में (मूलभूत) कारण हैं । अतः द्वितीयकूट का अर्थ हुआ—‘अपरिमेय
आनन्द एवं चिद्रूप ब्रह्म’ ॥ १३७-१३९ ॥
- प्रकाश *
हसो हास्यम् । अर्शादित्वान्मत्वर्थीयो ऽच् । ततः ककारेण मुखवाचकेन
बहुव्रीहिः । हसः को यस्य तदिति विग्रहः । यद्वा हासस्यानन्दजन्यत्वादानन्दे हसपदस्य
लक्षणा । कश्च हश्च कहौ, कहौ लौ यस्य तत् कहलम् । ‘मुखे सूर्ये ऽपि कः स्मृतः’
‘हः कोपे वरुणे चन्द्रे’ ‘इन्द्रे ऽपि लोचने लः स्यात्’ इत्येकाक्षरनिघण्टुः । हसपद-
द्वितीयोऽंशः ३७१
कहलपदयोः कर्मधारयः । एतदर्थप्रतिपादकं मूलमाह—हेतू इति । यतो ह्रीं हसकहलँ
ततो ह्रीं कएईलमित्यन्वयः ॥ १३७-१३९ ॥
- सरोजिनी *
इन श्लोकों में द्वितीयकूट का अर्थ समझाया गया है । 'ह स क' =
हँसता हुआ मुख ॥ 'ह स' = आनन्द । 'क' = सूर्य ॥ 'ह' = चन्द्रमा ॥
'क + ह' = (सूर्य एवं चन्द्र) जिसके नेत्र हों वही है = सूर्यचन्द्रनयनी
अर्थात् 'क ह ल' । 'क ह ल' = सूर्यचन्द्रनयनी ॥ (प्रकाशक)
द्वितीयकूट का सम्पूर्ण अर्थ—'अपरिमेय आनन्द एवं चिद्रूप ब्रह्म ।'
सकलकलाभिः सहितं सकलं ब्रह्म तु तृतीयकूटार्थः ।
इत्थं गुणगणकथनाद्विद्याया एष सगुणार्थः ॥ १४० ॥
(तृतीयकूट एवं सगुणार्थ के स्वरूप का विवेचन)
समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म 'स क ल' है—यही तृतीय कूट का अर्थ है ।
इस प्रकार (समस्त) गुणसमूह के कथन द्वारा विद्या का यह 'सगुणार्थ' (कहा गया)
है ॥ १४० ॥ - प्रकाश *
— अत्र सर्वत्र सुलोपः । स्पष्टमन्यत् ॥ १४० ॥ - सरोजिनी *
प्रस्तुत श्लोक में 'तृतीयकूट' का अर्थ समझाया गया है । और विद्या के
'सगुणार्थ' की व्याख्या की गई है ।
“स क ल”—समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म ।
चरमोद्दिष्टं महावाक्यार्थमाह—
विधिहरिशिववचना अपि ककार एकारको ऽकारः ।
सृष्टिस्थितिभङ्गात्मकतत्तज्जनकत्वलाक्षणिकाः ॥ १४१ ॥
ईश्वरवाचीकारो वक्ति डकारः सदाशिवं ताभ्याम् ।
लक्षणया तत्र तिरोधानानुग्रहणकृत्यता गदिता ॥ १४२ ॥
(मंत्रगत 'ककार', 'एकार' एवं 'अकार' की त्रिदेवों से तदात्मता का प्रतिपादन)
ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव शब्द भी ककार, एकार एवं अकार से अभिन्न हैं
(उनका), सृष्टि-स्थिति-संहार का कारकत्व एवं (उनका) इन कार्यों को उत्पन्न करना
लाक्षणिक है ॥ १४१ ॥