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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 456, कुल 530 में से

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पृष्ठ 456

३५४ वरिवस्यारहस्ये
(प्रथमकूट के छः वर्णों, तीन दम्पतियों एवं कामकला
में अभिन्नता का प्रतिपादन)
वे ये सभी (छः देवता) कामकला ही हैं अन्य नहीं । इसका यह अर्थ ईकार
के सामानाधिकरण्य से (सिद्ध) है ॥ ११६ ॥

  • प्रकाश *
    एता ब्रह्मादयः षट् । यद्यपि ब्रह्मादीनां पुंस्त्वेन भारतादीनां स्त्रीत्वेन तद्वाचकशब्दे
    ‘पुमान् स्त्रिया’ इत्येकशेषतः ‘एते’ इत्येव भाव्यम्; तथापि ब्रह्मविष्णुमहेश्वराणां
    स्त्रीरूपताया भावार्थप्रकरणे कथितायाः स्मरणायैवमुक्तिः । सामानाधिकरण्यादेक-
    विभक्तिकत्वरूपात् । प्रत्यक्षरं विद्यमानानां सुपां तु लोपः । वाक्ये संहिताया
    अविवक्षणादीकारेण सह न संधिः ॥ ११६ ॥
  • सरोजिनी *
    ‘ता एताः सकला अपि कामकला एव’ न ततोऽन्याः ॥ उपर्युक्त छः देवता
    कामकलाऐं ईकार ही हैं उनसे अन्य नहीं हैं । १. ब्रह्मा-भारती २. विष्णु-लक्ष्मी ३.
    एवं रुद्र-पार्वती—यह दिव्य मिथुनत्रिक ईकार (कामकला) से अभिन्न हैं ।
    ‘कामकला’—‘बह्वृचोपनिषद्’ में कहा गया है—“ॐदेवी ह्येकाग्र आसीत् ।
    सैव जगदण्डमसृजत् । कामकलेति विज्ञायते । शृङ्गारकलेति विज्ञायते ॥”¹
    विश्व-प्रसवित्री जगज्जननी को ही यहाँ ‘कामकला’ एवं ‘शृङ्गारकला’ दोनों कहा गया
    है ।² बिन्दुत्रय—रक्तबिन्दु, शुक्लबिन्दु एवं मिश्रबिन्दु एवं मध्यस्थित महाबिन्दु चारों
    मिलकर ‘कामकला’ को प्रकट करते हैं ‘शक्ति’ ‘महाबिन्दु’ से निःसृत होकर शृङ्गार
    (सिंघाड़े) के समान त्रिकोणाकार धारण करती है ।
    ‘श्वेतबिन्दु’—शिवात्मक है । ‘रक्तबिन्दु’—शक्त्यात्मक है । ये दोनों परस्पर
    एक दूसरे में प्रविष्ट होते रहते हैं । रक्त एवं श्वेतबिन्दु के समागम से तृतीय बिन्दु
    ‘मिश्रबिन्दु’ का आविर्भाव होता है । यही ‘अहं’ पद है । इसी में अकार से हकार
    पर्यन्त समस्त वर्ण निहित रहते हैं । ‘मिश्रबिन्दु’ ही सूर्य बिन्दु’ कहलाता हैं । यह
    बिन्दु अनन्त सौन्दर्य का केन्द्र है । “मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो ।
    हरार्धं ध्यायेत् यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् ॥”
    १. ‘काम’—‘मिश्रबिन्दु’ (सूर्यबिन्दु) अतिकमनीय होने के कारण ‘कर्म’ भी
    कहलाता है ।
    २. ‘कला’—‘रक्तबिन्दु’ अग्नि एवं ‘श्वेतबिन्दु’ चन्द्रमा—ये दोनों ‘कला’
    कहलाते हैं । मूल महाबिन्दु एवं त्रिकोण के तीनों बिन्दु सम्पूर्ण ‘कामकला’ के
    स्वरूप का निर्माण करते हैं ।
    ३. ‘हार्दकला’ महाबिन्दु ही हैं । ‘योगिनीहृदय’ में कहा गया है—‘ज्येष्ठा
    १. बह्वृचोपनिषद २. तत्रैव .