सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 466, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 466

३६४ वरिवस्यारहस्ये
अध्ययन का साधन (बुद्धि) । ‘क + ए’ = इन दोनों का सम्मिलित अर्थ हुआ—
प्रकाशिका बुद्धि ।
'वर्णद्वय मेलनतः प्रकाशिका बुद्धिरित्यर्थः ।।'
‘ई व्याप्तौ’ धातु से निष्पन्न तृतीय वर्ण ‘ई’ का अर्थ है—“व्याप्ति” ।।
तस्य लहर्याधिक्यं तन्निर्माणं मकारार्थः ।
हन हिंसायामिति हं शौर्य प्रत्यर्थिहननकरणत्वात् ॥ १२३ ॥
सं भोगसाधनं धनमुपभोगार्थात् स्यतेः सुनोतेर्वा ।
कमु कान्ताविति धातोरिच्छाविषयो ऽङ्गनादिः कम् ॥ १२४ ॥
एषां गमनं प्रापणमोहाङ्-गत्यर्थधातुजन्यं हम् ।
तस्यातिशयो लहरी तत्र श्लिष्टः सवर्णदीर्घेण ॥ १२५ ॥
ईकारस्तस्यार्थः कीर्तिः सर्वासु दिक्षु दीप्तत्वात् ।
ई दीप्ताविति धातौर्निर्मितिरनयोर्मकारार्थः ॥ १२६ ॥
तदेव तावद्वदति—
वाग्भवकूटस्यार्थः सूक्ष्ममतिव्यापनाधिक्यम् ।
शौर्यधनस्त्रीयशसामाधिक्यं कामराजार्थः ॥ १२७ ॥
एते सम्यक् कलयति सकला हरतेर्हकारः स्यात्।
निखिलजगत्संहर्त्रीत्यर्थस्तस्यापि वर्णस्य ॥ १२८ ॥
ईकारः प्रश्लिष्टः सृष्टिस्थितिरूपदीप्तिकर्त्रर्थः ।
यद्वा हृदि खेदहरे प्रकाशते तेन माता ह्रीः॥ १२९ ॥
सकलान्तेन पदेन ह्रीकारे कर्मधारयः कार्यः ।
तस्य विशेष्यो मः स्यान्नादार्थः संविदर्थो वा ॥ १३० ॥
(लहरी, ह, क, ई, स, म कूटत्रय एवं ह्रीं
आदि का रहस्यार्थ)
उसकी (बुद्धि की) प्रमुखता ‘लहरी’ है । इस प्रमुखता का निर्माण—मकार का
अर्थ है । ‘हन हिंसायाम् धातु’ से निष्पन्न ‘ह’ शब्द शत्रु का हनन करने का कारण
होने के कारण शौर्यार्थक है ।। भोगार्थवाची षो या सु अभिषवार्थवाची सु से निष्पन्न
‘स’ शब्द भोग के साधन धन का वाचक है । ‘कमु कान्तौ’ धातु से निष्पन्न ‘क’
शब्द कामिनी आदि इच्छित पदार्थों का वाचक है ।। गमनार्थी ओहाङ् धातु से
निष्पन्न ‘ह’ का अर्थ इनका (भोगों का) गमन या प्राप्ति है । उनकी (इन सभी
की) प्रभूत प्राप्ति ‘लहरी’ है जिसके साथ ईकार की सवर्ण दीर्घ संधि हुई है ।