वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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द्वितीयोऽंशः ३७१
कहलपदयोः कर्मधारयः । एतदर्थप्रतिपादकं मूलमाह—हेतू इति । यतो ह्रीं हसकहलँ
ततो ह्रीं कएईलमित्यन्वयः ॥ १३७-१३९ ॥
- सरोजिनी *
इन श्लोकों में द्वितीयकूट का अर्थ समझाया गया है । 'ह स क' =
हँसता हुआ मुख ॥ 'ह स' = आनन्द । 'क' = सूर्य ॥ 'ह' = चन्द्रमा ॥
'क + ह' = (सूर्य एवं चन्द्र) जिसके नेत्र हों वही है = सूर्यचन्द्रनयनी
अर्थात् 'क ह ल' । 'क ह ल' = सूर्यचन्द्रनयनी ॥ (प्रकाशक)
द्वितीयकूट का सम्पूर्ण अर्थ—'अपरिमेय आनन्द एवं चिद्रूप ब्रह्म ।'
सकलकलाभिः सहितं सकलं ब्रह्म तु तृतीयकूटार्थः ।
इत्थं गुणगणकथनाद्विद्याया एष सगुणार्थः ॥ १४० ॥
(तृतीयकूट एवं सगुणार्थ के स्वरूप का विवेचन)
समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म 'स क ल' है—यही तृतीय कूट का अर्थ है ।
इस प्रकार (समस्त) गुणसमूह के कथन द्वारा विद्या का यह 'सगुणार्थ' (कहा गया)
है ॥ १४० ॥ - प्रकाश *
— अत्र सर्वत्र सुलोपः । स्पष्टमन्यत् ॥ १४० ॥ - सरोजिनी *
प्रस्तुत श्लोक में 'तृतीयकूट' का अर्थ समझाया गया है । और विद्या के
'सगुणार्थ' की व्याख्या की गई है ।
“स क ल”—समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म ।
चरमोद्दिष्टं महावाक्यार्थमाह—
विधिहरिशिववचना अपि ककार एकारको ऽकारः ।
सृष्टिस्थितिभङ्गात्मकतत्तज्जनकत्वलाक्षणिकाः ॥ १४१ ॥
ईश्वरवाचीकारो वक्ति डकारः सदाशिवं ताभ्याम् ।
लक्षणया तत्र तिरोधानानुग्रहणकृत्यता गदिता ॥ १४२ ॥
(मंत्रगत 'ककार', 'एकार' एवं 'अकार' की त्रिदेवों से तदात्मता का प्रतिपादन)
ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव शब्द भी ककार, एकार एवं अकार से अभिन्न हैं
(उनका), सृष्टि-स्थिति-संहार का कारकत्व एवं (उनका) इन कार्यों को उत्पन्न करना
लाक्षणिक है ॥ १४१ ॥