वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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वाग्भवकूट का स्वरूप¹—यह 'कादिविद्या' से सम्बद्ध है । २. भगवती का
अपना शरीर वाक्तत्त्व, कामतत्त्व एवं शक्तिकूट द्वारा निर्मित है अतः 'वाग्भवकूट'
भगवती के किरीट के शीर्ष भाग से गले तक का शरीराङ्ग है—शरीराङ्ग-युक्त
पूर्णशरीर इस प्रकार है—
१. अत्र विद्यायां वाक्कूटेन आकण्ठात् कण्ठमभिव्याप्य अर्थात् किरीट
मारभ्यावयवशो विग्रहः प्रतिपाद्यः ।। (वाग्भवकूट)
२. कामराजकूटेन कण्ठाधः कटिपर्यन्तविग्रहः ।
३. शक्तिकूटेन कट्यधः पादाग्रान्तो देहः प्रतिपाद्यः इत्यर्थः ।। 'ललिता
सहस्रनाम' में इनके इस स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है—
'श्रीमद्वाग्भवकूटैकस्वरूप मुखपङ्कजा । "कूटत्रयकलेवरा"
कण्ठाधः कटिपर्यन्तमध्यकूटस्वरूपिणी ।। राजराजेश्वरी
शक्तिकूटैकतापन्नः कट्यधोभागधारिणी । त्रिपुरसुन्दरी देवी
मूलमन्त्रात्मिका मूलकूटत्रयकलेवरा ।।'
१. वाक्कूट, १. [ वाग्भवकूट = भगवती
(किरीट से कण्ठ) के मुकुट से कण्ठ
देवी के शरीराङ्ग तक का भाग
एवं कूटों का
२. कामराज कूट अन्तर्सम्बन्ध । २. [ कामराजकूट = कण्ठ
(कण्ठ से कटि) (देवी के शरीर से कटि तक का भाग
का रहस्यार्थ)
३. शक्तिकूट ३. [ शक्तिकूट = कटि से
(कटि से पादाग्र) पादाग्र तक का भाग
आचार्य भास्करराय ने भी कहा है—
“वाक्काम्-शक्तिकूटैरवयवशो विग्रहो मातुः ।
प्रतिपाद्योऽत्रा कण्ठादामध्यादा च पादाग्रात् ।।’’२
भगवती कूटत्रय कलेवरा है—मूलमन्त्रात्मिका है—
“मूलमंत्रात्मिकामूल कूटत्रयकलेवरा ।
कुलामृतैकरसिका कुलसङ्केतपालिनी ।।”
यह भी कहा गया है—कि 'वाग्भवकूट' देवी के शरीर का एक भाग है—
नेत्रोष्ठापरगलवर्णाशालिवाचां संभूतिर्मुखमिति वाग्भवाख्यकूटमिति ।।”³
१. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक १।१४) । २. ललितासहस्रनाम (१०३) ।
३. सौभाग्यभास्कर' में उद्धृत ।