वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोंऽशः ३६३
पंचदशी का लकार = 'लकारः क्षितितत्त्वं' ॥ सकार = 'सकारः चन्द्रबीजं' ।
'लकारः इन्द्रबीजं' ॥ 'ल' = पृथ्वी । इन्द्रबीज ॥ 'स' = चन्द्रबीज ॥¹
'क' = सृष्टि = विधायक ब्रह्मा ।
'ए' = स्थिति = स्थिति-संरक्षक, व्यवस्थापक = विष्णु ॥
'अ' = संहार = संहार विधायक शिव ॥
‘विधिऽहरि-शिव-वचना अपि ककार एकारकोऽकारः ।
सृष्टि-स्थिति भङ्गात्मकतत्तज्जनकत्वलाक्षणिकाः ॥ १४१ ॥
ईश्वरवाचीकारो वक्ति उकारः सदाशिवं ताभ्याम् ।
लक्षणकया तत्र तिरोधानानुग्रहण कृत्यता गदिता ॥ १४२ ॥²
ककार का अर्थ “वरेण्य” भी है—'ककारस्य वरेण्यमर्थः ॥'
ककार का अर्थ—'कामयते स ककारः कामो ब्रह्मैव तत्पदस्यार्थः—'ॐतत्
सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ॥’’³ 'तदिति ब्रह्म शाश्वतम्' के अनुसार
गायत्री का 'तत्' पद एवं पंचदशी का 'क' शब्द दोनों 'ब्रह्म' के वाचक है।
भास्करराय भी यही कहते हैं—'तत्पदार्थो ब्रह्म । तदेव च ककारार्थः ।' 'कं ब्रह्म'—
कहकर श्रुतियों ने भी इसी तथ्य की पुष्टि की है ।
‘कामयते कामी जायते स एव निरञ्जनोऽकामत्वेनोज्जंभते कामोऽभिधीयते,
तत्परिभाषाया कामः ककारं व्याप्नोति ॥’’ (श्रुति) ॥ अतः 'क' का अर्थ है
‘कामेश्वर’—‘‘कामेश्वर इति तु पर्यवसितम् ॥’’४
प्रस्तुत श्लोक में आचार्य भास्कर ने 'क' का अर्थ मात्र ('कन् दीप्तौ', धातु
से निष्पन्न मानकर) प्रकाश कहा है । 'एकार' का अर्थ है—अध्ययन का साधन ॥
वर्णद्वयमेलनतः प्रकाशिका बुद्धिरित्यर्थः ।
ई व्याप्ताविति धातोस्तस्या व्याप्तिस्तृतीयवर्णार्थः ॥ १२२ ॥
(मंत्राक्षर 'क' 'ए' एवं 'ई' का अर्थ)
दोनों अक्षरों के सम्मिलन का अर्थ है प्रकाशिका बुद्धि । ‘ई व्याप्तौ’—इस
धातु से निष्पन्न तृतीयाक्षर ‘ई’ का अर्थ है ‘व्याप्ति’ ॥ १२२ ॥
- सरोजिनी *
दीप्ति अर्थ प्रदान करने वाले कन् धातु से ककार को निष्पन्न मानने पर 'क'
का अर्थ होगा प्रकाश का साधन—‘कन्यते प्रकाश्यते अनेनेति क प्रकाशकम् । 'क'
= प्रकाशक ॥ 'इङ्ग् अध्ययने' धातु से एकार व्युत्पन्न हुआ । एकार का अर्थ है—
१. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक १४१-१४२) २. भास्करराय—‘प्रकाश’ (६२-६३)
३. वरिवस्यारहस्यम् (श्लोक ६०) ४. भास्करराय—‘प्रकाश’ (६०)