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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 530 में से

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आर्षत्वात्तद्द्विमोकः । अत एव ङः क्विबपि कृते, कित्त्वे ऽपि गुणः । विज्वा कार्यः ।
अधीयते अनेनेत्यध्ययनकरणं बुद्धिः । अनयोः कर्मधारयः । असंधिरार्षः । तत
ईकारेण षष्ठीतत्पुरुषः । लहरीत्यत्राकारलोपः । 'माङ् माने' इति धातोः क्विबपि
तल्लोपे 'प्रातिपदिकाद्धात्वर्थे बहुलमनिष्ठवच्च' इति णिचि 'णेरनिटि' इति टिलोपे च म्
इति सिध्यति । प्रकाशकत्वं सूक्ष्मत्वम् । तथा च सूक्ष्ममतिव्यापनाधिक्यं प्रथम-
कूटार्थः ॥ १२१-१२२ ॥

  • सरोजिनी *

ककार एवं एकार का अर्थ—दीप्त्यर्थक 'कन् दीप्तौ' धातु से 'क' पद
निष्पन्न होता है । इसका अर्थ है—दीप्ति, प्रभा या प्रकाश ॥ अध्ययनार्थक इङ्
धातु से निष्पन्न एकार का अर्थ उसका करण है—अर्थात् एकार का अर्थ है
अध्ययन का करण या साधन ।
'क'—'पंचदशी मंत्र' का प्रथमाक्षर

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