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सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 472, कुल 530 में से

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पृष्ठ 472

३७० वरिवस्यारहस्ये
‘अ’ = १. परमात्मा । परमशिव
२. आत्मा
३. चराचर जगत का बीज
४. समस्त वर्णमाला में अनुस्यूत एवं उसका जनक
५. वर्णमाला की आत्मा एवं सर्वसार तत्त्व
६. शब्द ब्रह्म ] तान्त्रिक योग की चरमोपलब्धि है—‘अहं’ =
७. प्रथम स्पन्द ] ‘पूर्णहन्ता’ । ‘पूर्णहन्ता’ है—पूर्ण ‘अ + ह’
८. शिव + शक्ति से अभिन्न अहं ही मन्त्र है । यही अहं अपरिमेय
पूर्णहन्ता में परिणत हो जाता है ।
अबिन्दुविसर्गं च अकारं जपतो महान् ।
उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥ (विज्ञान भैरव)
हसकं तु हसद्वदनं मतं ककारस्य वदनवाचित्वात् ।
यद्वा हस आनन्दः कः सूर्यो हस्तु चन्द्रः स्यात् ॥ १३७ ॥
एतौ लौ नयने यस्य तत्तु कहलं रवीन्दुनेत्रमिति ।
तेन प्रकाशकत्वाच्चिद्रूपत्वं च निगदितं भवति ॥ १३८ ॥
विधिहरिगिरिशेड्यत्वे हेतू एते हसत्वकहलत्वे ।
तेनात्यमितानन्दं चिद्ब्रह्मेति द्वितीयकूटार्थः ॥ १३९ ॥
(ह स क ह ल का अर्थ)
ककार के मुखार्थक होने के कारण ‘ह स क’ (वर्णों) का अर्थ ‘हँसता हुआ
मुख’ समझना चाहिए । या ‘ह स’ का अर्थ ‘आनन्द’, ‘क’ का सूर्य एवं ‘ह’ का
अर्थ चन्द्रमा हो (है) । ये दोनों (क एवं ह अर्थात् सूर्य एवं चन्द्रमा) जिसके नेत्र
(ल) हैं वह सूर्यचन्द्रनयनी ‘क ह ल’ है । अतः प्रकाशक होने के कारण (उसकी)
चैतन्यरूपता कही गई है ।
ये दोनों ‘हसत्व’ एवं ‘कहलत्व’ (ही) ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र के द्वारा ब्रह्म के
स्तुत्य होने में (मूलभूत) कारण हैं । अतः द्वितीयकूट का अर्थ हुआ—‘अपरिमेय
आनन्द एवं चिद्रूप ब्रह्म’ ॥ १३७-१३९ ॥

  • प्रकाश *
    हसो हास्यम् । अर्शादित्वान्मत्वर्थीयो ऽच् । ततः ककारेण मुखवाचकेन
    बहुव्रीहिः । हसः को यस्य तदिति विग्रहः । यद्वा हासस्यानन्दजन्यत्वादानन्दे हसपदस्य
    लक्षणा । कश्च हश्च कहौ, कहौ लौ यस्य तत् कहलम् । ‘मुखे सूर्ये ऽपि कः स्मृतः’
    ‘हः कोपे वरुणे चन्द्रे’ ‘इन्द्रे ऽपि लोचने लः स्यात्’ इत्येकाक्षरनिघण्टुः । हसपद-