वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 462, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें३६० वरिवस्यारहस्ये
४. 'स'— सकारं शृणु चार्वङ्गि शक्तिबीजं परात्परं ।
कोटिविद्युल्लताकारं कुण्डलीत्रय संयुतं ।।१
५. 'ए'— एकारं परमं दिव्यं ब्रह्म विष्णु शिवात्मकः ।।
६. 'ई'— ईकारं परमे शान्ति, स्वयं परम कुण्डली ।।२
'क' ककार— ककारः सर्ववर्णानां मूल प्रकृतिरेव च ।
ककारः कामदा कामरूपिणी स्फुरदव्यया ।।३
कामिनी या महेशानि स्वयं प्रकृतिसुन्दरी ।
माता सा सर्वदेवानां कैवल्यपददायिनी ।।
ऊर्ध्वकोणे स्थिता कामा ब्रह्म शक्तिरितीरिता ।
वामकोणे स्थिता ज्येष्ठा विष्णुशक्तिरितीरिता ।।
दक्षकोणे स्थिता बिन्दु रौद्री संहाररूपिणी ।४
एवं हि कामिनीं ज्ञात्वा ककारं दशधा जपेत् ।।५
'ल'— लकारः पृथिवी बीजं तेजो भू बिम्बमुच्यते ।।६
'स'— सकारश्चन्द्रमा भद्रे कलाषोडशात्मकः ।
'ह'— हकारः शिव उच्यते, अष्टमूर्तिः सदाभद्रे ।७
'ई'— इकारस्तु सदा माया भुवनानि चतुर्दश ।
पालयन्ती परात्साच्छक्र कोणं भवेत् प्रिये ।।८
ब्रह्मैव शिवः शक्तिश्चेति प्रत्येककूटार्थः ।
शिवशक्तिसामरस्याद्विद्याया एष सामरस्यार्थः ।। १२० ।।
(सामरस्यार्थ का स्वरूप)
(तीनो कूटों में से) प्रत्येक कूट का अर्थ (यही) है कि—'शिव एवं शक्ति के
सामरस्य के कारण ब्रह्म ही शिव एवं शक्ति दोनों ही हैं।'—श्रीविद्या का यही
सामरस्यार्थ है ।। १२० ।।
- सरोजिनी *
आचार्य भास्करराय कहते हैं कि जो 'वाग्भव' 'कामराज' एवं 'शक्ति' नामक
तीन कूट हैं उनमें से प्रत्येक कूट का एक ही अर्थ है और वह यह है कि—'शिव
एवं शक्ति के सामरस्य के कारण ब्रह्म ही शिव एवं शक्ति दोनों ही हैं।' यही
पंचदशाक्षरी मंत्र का सामरस्यार्थ भी है ।
'मन्मथबीज' में ककार-लकार दोनों का योग है मन्मथ बीजे ककारयोर्योगः
पराप्रासादे हकारसकारयोः । शुद्ध योरचोर्द्वितीयतृतीयोः शक्तिः । लज्जाबीजस्योभय-
सामरस्यात्मकं परं ब्रह्म अर्थः ।।'
१-५. कामधेनु तन्त्र ६-८. ज्ञानार्णव तन्त्र