वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
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द्वितीयोंऽशः ३६७
इति वचनाट्टिलोपार्थं डित्त्वकल्पनेत्यर्थः । छान्दसत्वसमाधानं तु निरङ्कुश-
मित्याह—छन्दसीति ॥ १३१-१३२ ॥
- सरोजिनी *
पंचदशी मंत्र के जो विभिन्न अर्थ बताए गए हैं उनकी पुष्टि अनेक प्रकार से
होती है यथा—
१. धातुओं के अनेकार्थक होने के कारण ।
२. बहुल को मान्य परम्परा के रूप में ग्रहण होने के कारण ।
३. पृषोदरादि में विभिन्न प्रकरणों को सम्मिलित करने के कारण ।
४. आकृतिगणपाठ होने के कारण ।
५. उणादि सूत्रों के स्वप्रयोजनार्थ स्वेच्छापूर्वक कल्पित करने के कारण ।
स्वच्छन्दता के अनेक उदाहरण हैं—“क्वचित् प्रवृत्ति क्वचिदप्रवृत्तिः क्वचिद्
विभाषा क्वचिदन्य एव । विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधं बाहुलकं वदन्ति ॥”
अतः मंत्रों के भी अनेक अर्थ भी हो सकते हैं । ‘बहुल’ का यही उदाहरण है ।
‘पृषोदरादीनि यथोपदिष्टम्’ के अनुसार पृषोदरादिक शब्दों को सभ्य एवं शिष्ट लोगों
द्वारा जिन अर्थों में प्रयुक्त किया जाता है उन्हें उन्हीं अर्थों में समाज में स्वीकृति
मिल जाती है । ‘संज्ञासु धातुरूपाणि प्रत्ययाश्च ततः परे । कार्याद्विद्यादनूबन्ध-
मेतच्छास्त्रमुपादिषु” के अनुसार टि के लोपार्थ डित्व की कल्पना की गई है ।
छान्दसत्वसमाधान निरंकुश, नियमों के संयम से परे है । ‘विष्णु सहस्रनाम’ के
भाष्य में ‘न्यग्रोधोदुम्बरोऽश्वत्थः’—प्रसङ्ग में पृषोदरादि के कारण संधि है—ऐसा
शङ्कराचार्य ने स्वीकार किया है । गणपाठ में परिगणित न होने वालों को ‘आकृति’
कहकर स्मरण किया गया है ।
समस्तार्थपदनिरुक्तिपूर्वकमुपसंहरति—
बहुतरसमासयोगात् समस्तपुरुषार्थसाधनत्वोक्तेः ।
संक्षेपात् सारोक्तेः श्रीविद्यायाः समस्तार्थः ॥ १३३ ॥
(मंत्र के ‘समस्तार्थ’ के स्वरूप का विवेचन)
(श्रीविद्या के ‘समस्तार्थ’ के अन्तर्गत) अनेक पदों को समास-युक्त करने के
कारण, समस्त पुरुषार्थों का साधनत्व निष्पादित करने के कारण तथा संक्षिप्त
रूप में श्रीविद्या का सारांश बताने के कारण—इसे श्रीविद्या का ‘समस्तार्थ’ (कहा
गया) है ॥ १३३ ॥ - प्रकाश *
समस्तपदस्यार्थ इति वा, समस्ताः सकला अर्थाः पुरुषार्था यस्मिन्निति वा,
समस्तः संक्षिप्तो ऽर्थ इति वा निरुक्तिः ॥ १३३ ॥