सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 463

द्वितीयोऽंशः ३६१
कादि विद्या में—(१) ३ ककार एवं (२) २ हकार हैं—‘कादिविद्यायां हि
ककारास्त्रयो हकारौ द्वौ ।’ और इनका अर्थ है—‘शिव’—‘‘तेषां शिव एवार्थः ।’’¹
इसी प्रकार इस ‘पंचदशाक्षरी विद्या’ में ३ लकार एवं २ सकार हैं । ये ही
दोनों शक्ति हैं—‘लकारास्त्रयः सकारौ द्वौ, तेषां शक्तिः ॥’²
ह्रींकार—‘लज्जाबीजस्योभयसामरस्यात्मकं परं ब्रह्मार्थः ॥’ अर्थात् इस मंत्र में
स्थित ‘ह्रीं’ का अर्थ है—‘उभय सामरस्यात्मक परब्रह्म’ । शिव एवं शक्ति दोनों ब्रह्म
ही हैं—यही प्रत्येक कूट का अर्थ है—‘शिवः शक्तिश्चेत्येतदुभयं ब्रह्मैवेति प्रतिकूट-
मर्थः । इसीलिए कहा गया है—
‘कत्रयं हद्वयं चैव शैवो भागः प्रकीर्तितः । शेषाणि शक्त्यक्षराणि ह्रींकार
उभयात्मकः ।’³ अर्थात्—
(क) ‘क त्रयं’ (तीनों कूटों में—‘‘क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं । स
क ल ह्रीं’’ मे से तीनों कूटों में, स्थित ककारत्रय)
(ख) ‘हद्वयं’—‘कामराजकूट’ में स्थित हद्विक (दो हकार)
(ग) ‘ह्रीं’—लज्जाबीज ।
१. क त्रयं ] ⎤ पंचदशाक्षरी
२. ह द्वय ] = ‘शैवभाग’ ⎥ मंत्र में
३. ए ई ल स, = ‘शक्त्यक्षर’ ⎥ स्थित
४. ह्रींकार (‘ह्रीं’) = शिवशक्त्यात्मक (उभयात्मक) ⎦ शिव-शक्ति
“शिवः शक्तिश्चेत्येतदुभयं ब्रह्मैवेति प्रतिकूटमर्थः ॥” अर्थात् प्रत्येक कूट का
अर्थ यही है कि—शिव एवं शक्ति दोनों ब्रह्म ही है या ब्रह्म ही शिव-शक्ति हैं ।
अथ समस्तार्थमाह—
कन दीप्ताविति धातोः प्रकाशकत्वं ककारार्थः ।
अध्ययनार्थकतेङः स्यादेकारस्तदीयकरणार्थः ॥ १२१ ॥
(‘ककार’ एवं ‘एकार’ का अर्थ)
‘कनदीप्तौ’ धातु से निष्पन्न ककार का अर्थ प्रकाश । अध्ययनार्थक इङ्धातु
से व्युत्पन्न एकार का अर्थ उसका साधन (अध्ययन का साधन) है ॥ १२१ ॥

  • प्रकाश *
    कन्यते प्रकाश्यते ऽनेनेति कं प्रकाशकम् । बाहुलको नलोपः । औणादिकः
    ‘गमन्ताड्डुः’ इति डप्रत्ययो वा । ‘इङ् अध्ययने’ इति धातुरधिपूर्वो ऽपि प्रकृत
    ──────────────────────────────────────────────
    १-३. भास्करराय—‘प्रकाश’