सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 457, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 457

द्वितीयोऽंशः ३५५
कामकला—सूर्य
मुख ->
अग्नि -> स्तन [चित्र: कामकला यन्त्र] चन्द्र <- स्तन
हार्द्धकला
(योनि)
ज्ञानं क्रिया शेषमित्येवं त्रितयात्मकम् । चक्रं कामकलारूपं प्रसार परमार्थतः ॥१
'कामकला' में पहले तुरीय बिन्दु उसके नीचे 'काम' नामक बिन्दु एवं उसके
नीचे विसर्गाख्य बिन्दुद्वय एवं नीचे 'हार्द्धकला' स्थित है । १. 'काम' बिन्दु (संमिश्र
बिन्दु) २. विसर्ग (शोण+सित बिन्दु) एवं ३. हार्धकला—इन तीन अवयवों से युक्त
एक अखण्ड पदार्थ 'कामकला' कहलाता है । नित्या षोडशिकार्णव' (वि० ७) में
इसका स्वरूप इस प्रकार व्यक्त किया गया है—'मध्यबिन्दुविसर्गान्तः समास्थानमये
परे । कुटिलारूपके तस्याः प्रतिरूपं वियत्कले ॥'
भास्करराय एवं अमृतानन्द की दृष्टि में 'कामकला' तत्त्व—भास्करराय ने
'सेतुबंध' में 'कामकला' का जो स्वरूप प्रस्तुत किया है उससे अमृतानन्द द्वारा
प्रस्तुत स्वरूप भिन्न है । भास्करराय ने 'बिन्दु' सङ्कल्प्य वक्त्रंतु—(नित्या० षो० १
विश्राम, श्लोक २०१) की व्याख्या करते हुए इसे भिन्न रूप में दिखाया है—
“ऊर्ध्व कामाख्योबिन्दुरेकः तदधोग्नीषोमात्मक बिन्दुद्वितयरूपोन्यः । तदधो हकारार्ध-
रूपः कलाख्यस्तृतीयः तदिदंप्रत्याहारन्यायेन कामकलेत्युच्यते ।२ अमृतानन्द योगी
कहते हैं—"मध्यबिन्दुः ऊर्ध्वबिन्दुः अकार हकार सामरस्यरूपः । कामाख्यः । तदुक्त
'कामकलाविलासे'—बिन्दुरहंकारात्मा रविरेतन्मिथुनसमसाकारः । कामः कमनीय-
तया ॥'३ 'मुखं बिन्दुं' कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधोहारर्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते
मन्मथकलाम् (सौन्दर्यलहरी १९) में भी इससे भिन्नता लक्षित होती है । 'तुरीय
बिन्दु' अतितुर्य तत्त्व है ।
१. योगिनी हृदय २. सेतुबन्ध
३. योगिनीहृदय 'दीपिका' (पृ० ८५-८६)