वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
DevanagariHindipublished530 पृष्ठ
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द्वितीयोऽंशः ३५७
(शाक्तार्थ का स्वरूप)
अन्य दो (द्वितीय एवं तृतीय) कूटों का भी यही अर्थ है, तथापि द्वितीय कूट
के द्वितीय 'हकार' को तृतीय कूट के 'सकार' से सम्बंधित करना चाहिए ।
शाक्तों की विभावना (विचारणा) के अनुसार प्रत्येक अक्षर शक्त्यान्वित है एवं वे
(प्रत्येक अक्षर) 'वामा' 'इच्छा' आदि शक्तियों से युक्त (अभिन्न) हैं—यही 'शाक्तार्थ'
है ॥ ११८ ॥
- प्रकाश *
प्रथमकूटस्य यावानर्थस्तावनेव द्वितीयतृतीयकूटयोः । द्वितीयकूटे मध्यमहकारः
परं तृतीयकूटस्य प्रथमभागे ऽन्वययोग्यः । तस्य तत्र चतुर्थत्वे ऽपि सजातीययोर्मध्ये
द्वितीयत्वात्तथोक्तिः । तेन तयोरपि कूटयोः प्रातिस्विकं रेफान्ता वर्णाः षडेव संपद्यन्त
इति तेषामुक्तरीत्यैवार्थवर्णनम् । अत्र प्रत्यक्षरमेकैकत्र शक्तिः । तेन शक्तानामक्षराणा-
मर्थः शाक्तार्थः । स्वार्थे अण् । अथ वा शाक्तानामुपासकानामर्थः प्रयोजनम्, अथ वा
शक्तिसमूहः प्रतिपाद्यत इति त्रेधा निर्वचनम् । भावार्थेन सह पौनरुक्त्यपरिहारस्तु
पूर्वमेव कृतः ॥ ११७-११८ ॥ - सरोजिनी *
प्रत्येक अक्षर शक्ति-समन्वित होता है एवं प्रत्येक अक्षर 'वामा' 'इच्छा' आदि
शक्तियों से अभिन्न होता है । आचार्य भास्करराय कहते हैं—'अत्र प्रत्यक्षर मेकैकत्र
शक्तिः ॥ तेन शक्तानामक्षराणामर्थः शाक्तार्थः । स्वार्थे अण । अथवा शाक्ताना-
मुपासकानामर्थः प्रयोजनम् अथवा शक्ति समूहः प्रतिपद्यत इति वा निर्वचनम् ॥'१
चूँकि प्रत्येक अक्षर शक्ति-समन्वित है अतः शाक्त अक्षरों का अर्थ ही
'शाक्तार्थ' है ।२ शाक्त उपासकों का अर्थ या प्रयोजन भी 'शाक्तार्थ' है । शक्ति
समूह का यहाँ प्रतिपादन किया गया है इसलिए भी इसे शाक्तार्थ कहते हैं ।३
“वामा”– बीजभावस्थितं विश्वं स्फुटीकर्तुं यदोन्मुखी ।
'वामा' विश्वस्य वमनादंकुशाकारतां गता ॥ ३७ ॥४
प्रत्येक शब्द की शक्तिमत्ता का प्रतिपादन सभी तंत्रों में किया गया है—
१. ईकारं परमेशानि स्वयं परम्कुण्डली ।
ब्रह्मविष्णुमयं वर्णं तथा रुद्रमयं सदा ॥५
२. उकारं परमेशानि तारः कुण्डलिनी स्वयं ॥६
१-३. सेतुबन्ध
४. योगिनीहृदय— (क) सर्वं चराचरं विश्वं वर्णान्तु जायते ध्रुवम् ।
(ख) अक्षराज्जायते सर्वं परं ब्रह्म स्वयं शिवे ॥
५-६. कामधेनु तन्त्र