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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 458, कुल 530 में से

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पृष्ठ 458

३५६ वरिवस्यारहस्ये
अहन्तामय त्रिबिन्दु तत्त्वस्वरूप वर्णात्मा ‘कामकला’ त्रिगुणात्मक त्रिकोण रूप
में परिणत होकर जगज्जननी बनती है—
एवं कामकलात्मा त्रिबिन्दुतत्त्वस्वरूप वर्णमयी ।
सेयं त्रिकोणरूपं याता त्रिगुणस्वरूपिणी माता ॥ २५ ॥१
मिश्र, शुक्ल एवं रक्त बिन्दु—त्रिबिन्दुयुक्त, सिङ्गाड़े के आकार का सुन्दर
त्रिकोण है जिसे प्रणव कहते हैं—
बिन्दुत्रयात्मकं स्वात्म शृङ्गार विद्धि सुन्दरमं ।
मिश्रं शुक्लं च रक्तं च पुराणं प्रणवात्मकम् ॥२
कामकलाक्षर बिन्दुत्रयात्मक है और तीनों बिन्दुरूप—सूर्य-सोम-अग्निरूप है ।
सोम सूर्य एवं अग्नि अकार, उकार एवं मकार से अभिन्न हैं ।
‘कामकला’ भगवती महात्रिपुरसुन्दरी ही है—‘‘कामकला महात्रिपुरसुन्दरी ॥’’३
कहा भी गया है—‘इति कामकला विद्या देवीचक्रमात्मिका सेयम् । विदिता येन स
मुक्तो भवति महात्रिपुरसुन्दरीरूपः ॥४ प्रकाशस्वरूप ‘शिव’ स्फूर्तिरूपा, विमर्शस्वरूपा
‘शक्ति’ में प्रविष्ट होते हैं और ‘बिन्दु’ का आकार ग्रहण कर लेते हैं । शक्ति भी
शिव में प्रवेश करती है । इससे बिन्दु विकसित होता है । उससे ‘नाद’ (स्त्री तत्व)
उद्भूत होता है । बिन्दु एवं नाद मिलकर ‘मिश्रबिन्दु’ बन जाते हैं । इसे ‘काम’
कहा जाता है । श्वेत बिन्दु एवं रक्त बिन्दु (पुरुष-नारी के प्रतीक) पुनः ‘संयुक्त
बिन्दु’ बन जाते हैं । श्वेत-रक्त-मिश्र बिन्दु एक हो जाते हैं—और ‘कामकला’
कहलाते हैं । यहाँ पर ४ शक्तियों का सामरस्य हैं—१. मूलबिन्दु (विश्वोपादान) २.
नाद ३. श्वेत पुरुषबिन्दु ४. रक्त स्त्रीबिन्दु । ये चारों तत्त्व मिलकर ‘कामकला’ का
रूप धारण कर लेते हैं । ग्रन्थान्तर में कहा गया है कि उच्चतमा देवी ‘कामकला’
है । संयुक्त बिन्दु (सूर्य) उसका मुख है । अग्नि-चन्द्र (रक्त + श्वेतबिन्दु) उसके
पयोधर हैं । हार्धकला उसकी योनि है । इसीसे सृष्टि होती है । ‘ह’ अर्धकला है,
ह के आकार का अर्धभाग (हार्धकला) है । अर्धकला या ‘ह’ ही शिव के प्रतीक
‘अ’ अक्षर से मिलकर कामकला (त्रिपुरसुन्दरी) का प्रतीकात्मक रूप है एवं
शिव-शक्ति के संयोग का फल है ।५
‘सामानाधिकरण्यादीकारेण’—‘कामकला’ एवं ईकार एक ही है—अभिन्न है।
अयमेव कूटयोरपि परयोरर्थः परं तु तार्तीये ।
द्वैतीयीकद्वैतीयीकहकारः सकारतः पूर्वः ॥ ११७ ॥
अन्वयितव्योऽक्षरशः शक्तेः शाक्तैर्विभाव्यत्वात् ।
वामेच्छादिशक्तिमयत्वोक्तेरेष शाक्तार्थः ॥ ११८ ॥
१-२. कामकलाविलास ३. चिद्वल्ली
४. कामकलाविलास
५. भण्डारकर—‘वै० शैव और अन्य धार्मिक मत’ (पृ० १६६)