वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
भूमिका ३१
योग्य एवं तृतीय रूप को—मन के योग्य देखता है । इसी रूप त्रैविध्य के कारण
देवी की भावना भी द्विविधात्मिका है—१. सरूपा २. अरूपा ।। प्रथम स्थूल-
रूपानुसंधानात्मिका है एवं द्वितीय पररूपानुसंधानात्मिका (चरमा) है । प्रथम स्वरूप
बहिर्याग द्वारा एवं दूसरा अन्तर्याग द्वारा साधित है ।
आचार्य भास्करराय ने मन्त्र-विज्ञान पर शोध करते हुए इस निष्पत्ति की
स्थापना की कि वेदमात्रा गायत्री के भी दो रूप हैं—१. सामान्य (Exotenic) एवं
२. गुप्त (Esotenic) ।। गायत्री का जो समान्य स्वरूप है वह उसका
चतुर्विशत्यात्मक वर्णमाला से एवं पादत्रय से निर्मित है किन्तु उसका एक रहस्यमय
या गुप्त स्वरूप भी है और वह है—विद्या पञ्चदशाक्षरी के रूप में स्थित है ।
श्रीविद्या का प्रत्येक अक्षर किसी न किसी एक स्वतंत्र शक्ति से अधिष्ठित है और
प्रत्येक अक्षर का स्वतन्त्र अर्थ है । भास्करराय यह भी स्थापित करते हैं कि
श्रीविद्या पञ्चदशाक्षरी ऐसी विद्या है जो कि ‘तत्वमसि’ का साक्षात्कार कराती है एवं
जीवात्मा तथा परमात्मा में स्थित औपनिषदिक सत्य की परमानुभूति का द्वार
उद्घाटित करती है ।
आचार्य भास्कर साधक-समाज की बाह्योपासना एवं उसकी निष्फलता या
स्वल्प निष्पत्ति से चिरपरिचित थे इसीलिए उन्होंने मन्त्र एवं मन्त्र के देवता के
अन्तर्संबंध का अनुसंधान किया और यह स्थापित किया कि वाच्य एवं चावक में
अभेद है । चूँकि वाचक मन्त्र है और वाच्य देवता है अतः मन्त्र एवं देवता में भी
अभेद है—‘वाच्या हि देवता देवमन्त्रो हि वाचकः स्मृतः । वाचकेऽपि च विज्ञाते
वाच्य एव प्रसीदति ।।' (यामल) इसीलिए उन्होंने ‘प्रकाश’ एवं ‘वरिवस्यारहस्यम्’ के
दोनों अंशों में वरिवस्या के समस्त अङ्गों, तत्त्वों एवं उपादानों में तथा मन्त्र-मांत्रिक,
गुरु, देवता, यन्त्र, पूजाङ्ग, ग्रह, नक्षत्र, राशि, कूटत्रय, भाव, आचार, स्वात्मा,
भगवान एवं विश्व सभी में एकात्मता, तद्रूपता एकान्विति एवं अभेद की स्थापना
की है । यही वरिवस्या का रहस्य भी है भास्कराचार्य ने श्रीविद्या पर यह प्रथम
ग्रन्थ लिखा । उन्होंने इस पर ‘प्रकाश’ नामक टीका भी लिखी । ‘सेतुबंध’ नामक
जो अन्य मन्त्रशास्त्रीय ग्रन्थ लिखा गया वह भास्कर की परवर्ती रचना है ।
‘सौभाग्यभास्कर’, ‘सेतुबंध’, ‘वरिवस्यारहस्यम्’ आदि अधिकांश रचनाएँ श्रीविद्या एवं
शाक्त दर्शन से ही सम्बंधित हैं ।
आचार्य भासुरानन्दनाथ (भास्करराय) ने अपने ग्रन्थ का ‘वरिवस्यारहस्यम्’
नामकरण करके यह द्योतित करने का प्रयास किया है कि वरिवस्या-विधान में
कतिपय रहस्य तत्त्व हैं जिन्हें सामान्य जन तो नहीं जानते किन्तु वे रहस्य तत्त्व ही
वरिवस्या के प्राण हैं अतः ग्रन्थकार ने इस ग्रन्थ में अन्य तत्त्वों को छोड़कर रहस्य
तत्त्व पर प्रकाश डालने की ही आङ्काक्षा व्यक्त की है । ‘वरिवस्या’ का अर्थ है
पूजा, उपासना या सपर्या—
‘‘पूजा नमस्यापचितिः सपर्यार्चार्हणाः समाः ।
वरिवस्या तु शुश्रूषा परिचर्याप्युपासना ।।’’ (अमरकोष)
३ वरि. भू.
३२ वरिवस्यारहस्ये
'नमोवरिवस' (३।१।१९) से क्यच् प्रत्यय जोड़ने पर 'वरिवस्या' शब्द निर्मित
होता है । 'वरिवस' शब्द पूजार्थक है । आचार्य भास्करराय ने 'वरिवस्यारहस्यम्' में
जिस रहस्य का उद्घाटन किया है उसका मूल केन्द्रीय स्वर अद्वैत-स्थापना है ।
यह ठीक भी है क्योंकि 'मन्त्रार्थ देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि । वाच्यवाचक भावेन
अभेदो मन्त्रदेवयोः ।' (शाक्तानन्द तरंगिणी) ॥ आचार्य भास्कर ने 'वरिवस्यारहस्यम्'
में विभिन्न प्रकार के ऐक्यों, अभेदों, ऐकात्म्यों एवं अभिन्नताओं का तर्कानुप्राणित
प्रतिपादन किया है जो निम्न हैं ।
शाक्ता द्वैतवाद का प्रायोगिक पक्ष—
१. मूलाधारादिक चक्रों एवं श्रीचक्र में एकात्मकता
सुषुम्ना के मूल में सस्थित अरुण सहस्रदल कमल में = त्रिपुराधिष्ठित
त्रैलोक्यमोहन चक्र, वह्नि के आधार चतुर्दल कमल में = त्रिपुरेशी से अधिष्ठित
सर्वाशापरिपूरण चक्र, शाक्त स्वाधिष्ठानस्थित षडदल कमल में = त्रिपुरसुन्दर्य-
धिष्ठित सर्वसंक्षोभण चक्र, नाभि में स्थित दशदल कमल में = त्रिपुरवासिनी से
अधिष्ठित सर्वसौभाग्यदायक चक्र, अनाहत के द्वादशदल कमल में = त्रिपुरा-
श्रीसमधिष्ठित सर्वार्थसाधक चक्र, विशुद्धचक्र के षोडशदलकमल में = त्रिपुरमालिनी
से अधिष्ठित सर्वरक्षाकर चक्र, तालुमूल में स्थित लम्बिकाग्र के अष्टदल कमल में
= त्रिपुरासिद्धि से अधिष्ठित सर्वरोगहर चक्र, भ्रूमध्य में स्थित द्विदलकमल में =
त्रिपुराम्बिका से अधिष्ठित सर्वसिद्धिप्रदचक्र, ललाट में स्थित इन्दु में—बिन्दु में—
महात्रिपुरसुन्दरी से अधिष्ठित सर्वानन्दमय चक्र की भावना करनी चाहिए ॥१
'योगिनीहृदय' में इसे इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है—
अकुलादिषु पूर्वोक्तस्थानेषु परिचिन्तयेत् ।
चक्रेश्वरीसमायुक्तं नवचक्रं पुरोदितम् ॥२
२. चक्र एवं देवी में एकात्मता—
योगिनीहृदय में इस एकात्मता को इस प्रकार पुष्ट किया गया है—
'यदा सा परमाशक्तिः स्वेच्छया विश्वरूपिणी ।
स्फुरत्तामात्मनः पश्येत्तदा चक्रस्य संभवः ॥३
अर्थात् जब भगवती स्वेच्छावश स्वनिष्ठा स्फुरत्ता को देखती हैं तभी विश्वाभिन्न
त्रिकोणादिचक्रों की उत्पत्ति हो जाती है । ('सा देवी स्वेच्छया स्वनिष्ठां स्फुरत्तां यदा
पश्यति तदा चक्रस्य विश्वाभिन्नस्य त्रिकोणादिचक्रस्य संभव उत्पत्तिर्भवतीत्यर्थः ॥'४
३. पीठ एवं पञ्चभूतों में एकात्मता—
'पीठ'—क्रमशः सिति-पवन-जल-अग्नि मण्डल रूप है—
१-२. अमृतानन्दनाथ—योगिनीहृदय 'दीपिका' (मन्त्रसंकेत : श्लोक ८, ९)
३. योगिनीहृदय (चक्रसंकेत श्लो० ९) ४. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध'
भूमिका ३३
१. भूतत्त्व, चतुरस्र, पीतवर्ण = 'कामरूपपीठ' ।
२. वायुतत्त्व, षड्बिन्दुलांछित, वर्तुल, धूम्रवर्ण = 'पूर्णगिरिपीठ' ।
३. जलतत्त्व, अर्धचन्द्राकार, श्वेत = 'जालन्धरपीठ' ।
४. अग्नितत्त्व, त्रिकोण, रक्त, = 'उड्डीयनपीठ' ।¹
“पीठाः कन्दे पदे रूपे रूपातीते क्रमात् स्थिताः । चतुरस्रं तथा बिन्दु
षट्कंयुक्तं च वृत्तकम् । अर्धचन्द्रं त्रिकोणं च रूपाण्येषां क्रमेण तु । पीतो धूम्रस्तथा
श्वेतो रक्तो रूपं च कीर्तितम् ।।'² चतुरस्रं कामरूपपीठः । षड्बिन्दुयुक्तवृत्तरूपः
पूर्णगिरिपीठः । जालंधरपीठः अप्तत्त्वमयः । त्रिकोणम् तेजस्तत्वमयः ओड्याणपीठः ।
४. चिदात्माशक्ति एवं विश्व में एकात्मता—
अमृतानन्द योगी ने ठीक ही कहा है—“विश्वाकार प्रथा षटत्रिंशत्तत्वात्मना
परिणता विमर्शशक्तिः”, ‘विश्वाकार प्रथाधार निजरूपशिवाश्रयम् ।'³ चिद्विमर्शशक्ति
आत्मभित्ति में जब आत्मप्रकाशन करती है तो वही प्रकाशन विश्व बन जाता है—
'चिदात्मभित्तौ विश्वस्य प्रकाशामर्शने यदा । करोति स्वेच्छया पूर्णविचिकीर्षा-
समन्विता ।।'⁴
५. प्रकाश एवं विमर्श में एकात्मता—
प्रकाश (परमशिव) अपने को विमर्शांश द्वारा विभक्त कर लेता है और
पश्यन्ती आदि वाणीचतुष्टय क्रम से प्रश्न भी करता है—वही प्रकाश है वही विमर्श
है—“भगवान् प्रकाशमूर्तिः परमशिवः स्वात्मानं विमर्शांशेन विभज्य पश्यन्त्यादि क्रमात्
पृच्छति ।।”⁵
६. गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी मन्त्र में एकात्मता—
(क) गायत्रीमन्त्र—'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो
नः प्रचोदयात्'
(ख) पञ्चदशीमन्त्र—क ए ई ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल ह्रीं ॥
गायत्री मन्त्र एवं पञ्चदशी का 'वाग्भवकूट'—
(१) गायत्रीमन्त्र का 'तत्' = पञ्चदशीमन्त्र का 'क' = 'तत' = ब्रह्म ॥ ‘क'
= कामेश्वर भगवान् शिव (ब्रह्म, परमात्मा) ॥
(२) गायत्रीमन्त्र का = 'सवितुर्वरेण्यं' = प्रसवित्री, जगन्माता ॥ पञ्चदशीमन्त्र
का 'ए' = देवी कामेश्वरी । (सरस्वती देवी)
(३) गायत्रीमन्त्र का = 'भर्गो देवस्य धी' । पञ्चदशी मन्त्र का ‘ई' =
सर्वान्तर्यामी, सर्वपोषक ।
१. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध' २. योगिनीहृदय
३. दीपिका ४. योगिनीहृदय
५. अमृतानन्द—'योगिनी-दीपिका'
३४ वरिवस्यारहस्ये
(४) गायत्रीमन्त्र का 'महि' = पञ्चदशीमन्त्र का 'ल' (पृथ्वी) ।।
(५) गायत्रीमन्त्र का चौथा चरण = 'धियो यो नः प्रचोदयात् । पञ्चदशीमन्त्र
का = 'ह्रीं' (मायाबीज, लज्जाबीज) ।। गायत्रीमन्त्र एवं पञ्चदशी के
मन्त्राक्षर परस्पर के मन्त्राक्षरों के प्रतिनिधि है—प्रतीक है—प्रतिनिधि है—
तदर्थक हैं ।
गायत्रीमन्त्र और पञ्चदशी का 'कामराजकूट'—
जिस प्रकार गायत्रीमन्त्र एवं वाग्भवकूट के मन्त्राक्षर परस्पर प्रतीक हैं उसी
प्रकार गायत्रीमन्त्र के अक्षर पञ्चदशीमन्त्र के 'कामराजकूट' के अक्षरों के भी प्रतीक
हैं—दोनों मन्त्रों के अक्षर एक ही अर्थ सङ्केतित करते हैं—अतः दोनों में साम्य है ।
| गायत्रीमंत्र के अक्षर | पञ्चदशी मंत्र के अक्षर |
|---|---|
| १. 'तत् सवितुः वरेण्यम्' (अक्षरत्रय) | 'ह' 'स' 'क'—अक्षरत्रय के बोधक |
| २. 'भर्गो देवस्य धी' (षडक्षर) | 'ह' (चौथा वर्ण) |
| ३. 'भर्गो देवस्य धी' | 'स' 'क' तृतीयकूट के दो वर्ण |
| (द्वितीय एवं तृतीय कूटों के शेष | |
| वर्णों का उद्धार उपर्युक्त रीति से | |
| करना चाहिए ।) | |
| कूटत्रय एवं शक्तियों में तादात्म्य | |
| ब्रह्मा-भारती, वामा-इच्छा ┐ १. वाग्भवकूट ┐ | |
| हरि-क्षिति, ज्येष्ठा-ज्ञाना ─┤ मिथुनत्रय = २. कामराजकूट │ | |
| शिव-अपर्णा, रौद्री-क्रिया ┘ ३. शक्तिकूट¹ ┘ | |
| तीन समष्टियाँ (पुरुष एवं नारी तत्त्व का सङ्घात) = शान्त एवं अम्बिका रूप | |
| में तीन 'ईकार' ।। भारती, सकले एवं ब्रह्मा आदि से आरंभ होने वाले त्रिकत्रय = | |
| माया (ह्रीं) से रहित कूटत्रय के बोधक ।। 'माया' (ह्रीङ्कार) का चौथा मिथुन है = | |
| जो शिव-शक्ति का बोधक है । | |
| पञ्चदशीमन्त्र में पन्द्रह वर्ण हैं किन्तु अनेक वर्णों की पुनरुक्ति भी है अतः | |
| पुनरुक्ति को छोड़कर गिने तो पञ्चदशी में मात्र सात ही अक्षर प्रयुक्त हुए हैं । | |
| पञ्चदशी के सात मूलाक्षर = वामा-इच्छा-ज्येष्ठा-ज्ञाना-रौद्री-क्रिया के प्रतीक ।। | |
| 'पञ्चदशीमन्त्र' में प्रयुक्त मूलाक्षर—७—(क, ए, ई, ल, ह्रीं, ह, स) | |
| ──────────────────────────────────────────────────────── | |
| १. वरिवस्यारहस्यम् (६०-६५) |
भूमिका ३५
| मन्त्र के वर्णों की | ३ | १ | १ | ३ | ३ | २ | २ = संख्या = १५ |
| पुनरुक्ति संख्या | | | | | | | |
| वर्ण | क | ए | ई | ल | ह्रीं | ह | स = मन्त्राक्षर = ७ |
| | | | | | | = मूलाक्षर |
परदेवता—वामादिक सप्तशक्तियों की समष्टि ॥
परदेवता—षट्त्रिंशत् तत्त्व ॥²
‘अहं’ = ‘अ’ = शिव । ‘ह’ = शक्ति । = ‘ई’ कामकला । वर्ण—गुण ।
कामकलात्रय—एवं ईकार—स्पर्श चतुष्टय । ३ लकार = लोकत्रय । मन्त्रगत—तीन
ककार = ‘सकल’, ‘प्रलयाकल’, विज्ञानाकल । पञ्चदशीमन्त्रगत हृल्लेखात्रय को
छोड़कर अवशिष्ट अक्षरों में स्थित अकार (क, ल; ह स क ह ल; स, क, ल में
स्थित दस अकार) = जीव । ग्यारहवाँ स्वर “एकार” = जीव का वाचक एवं
विद्या का प्राण । बिन्दुत्रय = रुद्र, ईश्वर एवं सदाशिव । नादत्रय = शान्ति, शक्ति,
शंभु । महाविद्या के सैंतिस पद = ३६ तत्त्व एवं सैंतिसहवाँ तत्त्वातीत सैंतिसहवाँ
तत्त्व । जन्य-जनक में अभेद = (वाच्य-वाचक में अभेद) = ब्रह्म एवं जगत् तथा
जगत् एवं विद्या में अभेद । परमशिव = जागतिक पदार्थ । दीक्षा गुरु एवं
परमशिव में अभेद । (श्लोक क्र० २।८२) भगवती पराम्बा = (इच्छा, ज्ञान, क्रिया
- सतोगुण-रजोगुण-तमोगुण+अग्नि-सोम-सूर्य इन नौ के संयोग से) त्रिनेत्री पराम्बा
ग्रहरूपा भी है । (२।८४)
७. पराम्बा के साथ तादात्म्य—
पराम्बा का अन्य तत्त्वों के साथ तादात्म्य—जगन्माता त्रिपुरा जगद्रूपिणी,
तत्त्वरूपिणी, चक्ररूपिणी, शक्तिरूपिणी, वर्णरूपिणी, यन्त्ररूपिणी, मन्त्ररूपिणी, गुरु-
रूपिणी तो हैं ही किन्तु वे साथ ही साथ ग्रहरूपिणी एवं नक्षत्ररूपिणी भी है । दस
इन्द्रियों, चार अन्तःकरणों, दस इन्द्रिय-विषयों, प्रकृति, पुरुष एवं गुणतत्त्वों के योग
से सत्ताईस अङ्गों से युक्त होने के कारण भगवती भी सत्ताईस नक्षत्रों के साथ
तादात्म्य रखती है । भगवती का योगिनियों के साथ भी तादात्म्य है (२।८६)
भगवती का राशियों के साथ भी तादात्म्य है (२।८७) क्योंकि नाग, कूर्म
आदि पाँच प्राण, प्राणापानादि पाँच, जीवात्मा एवं परमात्मा दो के द्वादशाङ्गों से
समन्वित होने के कारण जगदम्बा राशिस्वरूपा हैं । (२।८७) श्रीविद्या गणेशरूपिणी
भी हैं । (२।८८) यह ‘श्रीविद्या’ बिन्दुत्रय, नादत्रय एवं कूटत्रय के शेषांशों द्वारा
घटित होने के कारण ग्रहरूपिणी भी है एवं व्यञ्जनों द्वारा सत्ताईस अक्षरों वाली होने
के कारण श्रीविद्या नक्षत्ररूपिणी भी है (२।८९) तीन ह्रीं हृल्लेखाओं (ह्री त्रय) एवं
उससे भिन्न तीन कूटों के योग से श्रीविद्या योगिनीरूपा भी हैं । तीनों (ह वर्णों)
२. वरिवस्यारहस्यम्
३६ वरिवस्यारहस्ये
हल्लेखाओं एवं 'ल' के योग से घटित होने के कारण श्रीविद्या राशिरूपिणी है
(२।९०)। विद्या एवं देवी में सारूप्य होने के कारण विद्या एवं देवी में अभेद है ।
अतः श्रीविद्या गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी एवं राशि सभी के साथ तादात्म्य रखती
है—देव्या रूपान्तरत्वेन विद्यायास्तदभेदतः । गणेशग्रहनक्षत्र योगिनीराशिपीठता ॥
(२।९१) विद्या एवं देवी के सारूप्य के कारण विद्या एवं देवी में अभेद है । अतः
उसका गणेश, ग्रह, नक्षत्र, योगिनी एवं राशिरूप का समीचीन है । रेखाओं, 'दलों
एवं कोणों के गणों द्वारा घटित होने के कारण इसका गणेशत्व एवं त्रैलोक्यमोहन
आदि नवचक्रों द्वारा निर्मित होने से इसका ग्रहत्व स्पष्ट है । वृत्तत्रय, तीन
भूगृहरेखाओं एवं चौदह कोणों एवं सात अन्य चक्रों की पृथक्-पृथक् गणना द्वारा
इसका नक्षत्र रूप स्पष्ट है ।
श्रीचक्र के साथ तादात्म्य—
पालन एवं संहार नामक चक्रद्वय, पद्मद्वय एवं अन्य वृत्तद्वय एवं भूगृह आदि
के योग से—श्रीचक्र योगिनीरूप है । पाँच शक्ति, चार अग्नि, एक बिन्दु, एक वृत्त
एवं एक भूगृह आदि बारह के योग से श्रीचक्र राशिरूप है । विद्या के अक्षरों द्वारा
निर्मित होने के कारण चक्र इनसे अभिन्न हैं ।
मातृका वर्णों की संख्या = ५१ पीठ ॥ ओडयाण, जालंधर, पूर्णगिरि,
कामरूपपीठ, गणप, ग्रह, भ आदि एक, नौ, सत्ताईस, छः, बारह से घटित
पचपन पीठ हैं ।
८. अपने गुरु, देवता, विद्या एवं चक्र में तादात्म्यभाव—
देवी, विद्या चक्र, स्वगुरु एवं स्वयं—इन पाँचों में भी तादात्म्यभाव है ।
९. कुण्डलिनी के साथ तादात्म्य—
कुण्डलिनी का श्रीविद्या एवं देवी के साथ तादात्म्य है । श्रीविद्या का अपने
घटक अक्षरों के साथ तादात्म्य है । कल्याणी, एकाक्षरी, ईशित्री, ललिता आदि
देवी के तीन सौ नाम मन्त्र के आद्यक्षरों का प्रतीक है । नाम का एकांश समस्त
नाम का प्रतीक है । वाग्भवकूट, कामराजकूट एवं शक्तिकूटों के साथ (देवी के)
किरीट से कण्ठ, कण्ठ से कटि एवं कटि से पादाग्र में तादात्म्य है । प्रथमकूट के
छः वर्गों एवं तीन मिथुनों (ब्रह्मा-भारती, विष्णु-लक्ष्मी एवं रुद्र-पार्वती) का तादात्म्य
है । देवताष्टक ईकार के प्रतीक है । अक्षरों के साथ वामा, इच्छा आदि शक्तियों
का तादात्म्य है । ब्रह्म ही शिव-शक्ति दोनों का प्रतीक है क्योंकि शिवशक्ति अभिन्न
हैं । 'वाग्भवकूट' सूक्ष्म की विराट व्याप्ति एवं 'कामराजकूट' शौर्य, धन, स्त्री एवं
कीर्ति के प्रतीक हैं । प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय कूट के प्रतीक ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं
सामवेद हैं । 'ह्रीं' ब्रह्म का वाचक हैं । 'ह स क'—हँसते हुए मुख का, 'ह
स'—आनन्द का, 'क'—सूर्य का, 'ह'—चन्द्रमा का, क एव ह—सूर्य-चन्द्रमा का,
'ल'—नेत्र का, क ह ल—सूर्य-चन्द्ररूपी नेत्रवालों का, एवं 'क'—ब्रह्म का प्रतीक
है ।
भूमिका ३७
तृतीयकूट का प्रतीकार्थ है—
समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म स क ल है । ककार, एकार एवं अकार
सृष्ट्यादि के वाचक हैं । ई एवं ड = तिरोधान एवं अनुग्रह के वाचक हैं । ह स
= आनन्द का, 'क' सत्य का, 'ह' अनन्त का एवं 'ल' ज्ञान का प्रतीक है ।
'सकल'—जीव का वाचक है । स क ल = जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति का वाचक
है । सकल का अर्थ है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' ।
मांत्री-साधना के लिए मन्त्र, जप, दीक्षा, शक्तिपात, गुरु, यंत्र, माला,
महासेतु, सेतु, भावतत्त्व, साधनाधिकार, सूतकोद्धार, मन्त्र-चैतन्य, मन्त्रार्थभावना, गुरु
का ध्यान, मन्त्र, गुरु एवं मन्त्रेश्वर में एकता का विश्वास, मंत्रशिखा, कुल्लुका,
कवच, कीलक, अर्गला, न्यास, निर्वाण, योनिमुद्रा, प्राणायाम, मुखशुद्धि,
सूतकद्वय-मोक्षण, मुद्रा (यथा शांभवी मुद्रा), मौन, एकान्त, धैर्य, अटल विश्वास,
निर्भयता, गोपनीयता, जापक-जप्य एवं जप में अभेदभावना, अमित उत्साह, दृढ़
सङ्कल्प, प्राणयोग, मनोयोग, मन्त्रेश्वर, मन्त्र एवं गुरु की अचिन्त्य एवं अपार शक्ति
में पूर्ण विश्वास एवं मन्त्राधिकारित्व आदि तत्त्व आवश्यक है । भद्रगुप्ताचार्य ने
मन्त्र-साधना के लिए सर्वप्रथम मन्त्राधिकारी बनना आवश्यक बताया है ।
मन्त्राधिकारित्व—"दक्षो जितेन्द्रियो धीमान् कोपानल जलोपमः । सत्यवादी विलोभश्च
मायामद-विवर्जितः । मानत्यागी दयायुक्तः परनारी-सहोदरः । जितेन्द्री गुरुभक्तश्च
मन्त्रग्राही भवेन्नरः ॥"
इसके अतिरिक्त पञ्चविध देवपूजा भी आवश्यक है जो निम्न है—
१. 'अभिगमन'— देवस्थान को स्वच्छ करना, लीपना, निर्माल्य हटाना ।
२. 'उपादान'— गंधपुष्पादिक पूजाद्रव्यों का संग्रह ।
३. 'योग'— इष्टदेवता की अपनी आत्मा के रूप में भावना करना ।
४. 'स्वाध्याय'— मन्त्रार्थ का अनुसन्धान करते हुए जप, सूक्त-स्तोत्रपाठ,
गुणावली-पाठ, लीला एवं धाम का वर्णन एवं
वेदान्ताभ्यास ।
मन्त्र-पूजा—
मांत्री-साधना से मन्त्र-पूजा भी आवश्यक है । इस विधान में अभीष्ट मन्त्र को
ताम्र पत्र पर अष्टगंध से लिखकर उसे कादि-हादि मन्त्र लिखकर सम्पुटित करना
चाहिए । यथा—
(क) कादि विद्या क्रम—क ए ई ल ह्रीं, स क ह ल ह्रीं, ह्रीं सकल ह्रीं ।
(ख) हादि विद्या क्रम—ह स क ह ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल
ह्रीं—मन्त्र की षोडशोपचार से पूजा भी करनी चाहिए ।। मन्त्र में मन्त्रेश्वर
के विद्यमान रहने की भावना करनी चाहिए ।।
३८ वरिवस्यारहस्ये
प्रत्येक वर्ण का सर्वातिशायी महत्व—
१०. ऐसा कोई भी वर्ण नहीं है जो 'मन्त्र' नहीं है—भगवती जगन्माता
पचास वर्णों का मूर्तिमान रूप है । इसीलिए कहा गया है—"पञ्चाशन्मातृकां देवी
नानाविद्यामयी सदा । नानाविद्यामयीं देवीं महाविद्यामयीं तथा सर्ववर्णमयीं देवीं सर्व
सर्वदेवमयीं पराम् । सर्वदेवमयीं सौम्यां ब्रह्माण्डजननीं पराम् ॥"¹ इन्हीं वर्णों से
ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र सभी उत्पन्न होते हैं—'वर्णान्तु जायते ब्रह्मा तथा विष्णुः प्रजायते ।
रुद्रश्च जायते देवी । जगत्संहारकारकः ॥'² भगवती अकारादि सकारात सभी वर्णों
का विग्रह है । 'अकारादिक्षकारान्ता मातृकाबीजरूपिणी । विसर्गश्च बिन्दुश्च त्रिशक्ति
ब्रह्मविग्रहः ॥'³ वर्ण पञ्चदेवों से समन्वित है । वे शक्तित्रय समन्वित हैं । वे
त्रिगुणोपेत, कैवल्यस्वरूप, बिन्दुतत्त्वमय प्रकृतिस्वरूप है—'पञ्चदेवमयं वर्णा शक्तित्रय
समन्वितम् । निर्गुणं त्रिगुणोपेतं स्वयं कैवल्यमूर्तिमान । बिन्दुतत्वमयं वर्णं स्वयं
प्रकृतिरूपिणी ॥"⁴
(क) 'वर्ण' ब्रह्मा-विष्णु एवं रुद्र स्वरूप हैं—"ब्रह्मविष्णुमयं वर्ण तथा रुद्रः
वयं प्रिये ।"⁵
(ख) 'वर्ण' पञ्चप्राणमय हैं एवं परमकण्डलीस्वरूप हैं—"पञ्चप्राणमयं वर्ण
स्वयं परमकुण्डली ।"⁶
(ग) 'वर्ण' सदाशिवमय, हरिब्रह्मात्मक एवं परब्रह्मसमन्वित हैं—'सदाशिवमयं
वर्णं परब्रह्म समन्वितं । हरिब्रह्मात्मकं वर्णं गुणत्रय समन्वितं ॥'⁷
(घ) 'वर्ण' पञ्चदेवमय, पञ्चप्राणयुत एवं गुणत्रययुत है—'पञ्चप्राणमयं वर्णं वर्णं
पञ्चदेवमयं सदा । पञ्च प्राणयुतं वर्णं तथा त्रयगुणात्मकं मातृकाएँ
(मूलमन्त्र रूप सभी ५० वर्ण) युवतीरूपा एवं मन्त्रविग्रहरूपिणी हैं—
'मातृका युवतीरूपा मन्त्रविग्रहरूपिणी ॥'⁸
(ङ) 'वर्ण-युवतीरूप एवं शब्दब्रह्मस्वरूप हैं—'शब्दब्रह्म यदा याति मन्त्रं तन्त्रं
तदा भवेत् । पञ्चाशत् युवती सर्वशब्दब्रह्मस्वरूपिणी ।' मातृकादेवी
सनातनी वेदमाता है—"भजेऽहं मातृकादेवी९ वेदमातां सनातनीम् ॥"१०
जो भी वर्णरूपमयी कुण्डली परदेवता या परा महाकुण्डली है वह चूँकि
वर्णात्मिका है अतः इस शक्तिरूप वर्ण के ज्ञान के बिना किया गया 'जप'
व्यर्थ है—"वर्णरूपमयी देवी कुण्डली परदेवता । पञ्चाशद्वर्णतत्त्वं च विद्यामन्त्रं जपेत्तु
यः । सर्वं हि विफलं तस्य शववत् तज्जपं भवेत् । चैतन्यरहितं देवि तज्जपं शवमेव
तत् ॥"¹¹
समस्त वर्ण कुण्डलिनीस्वरूप हैं—"उकारं परमेशानि तारः कुण्डलिनी स्वयं ।
ऋकारं परमेशानि कुण्डली मूर्तिमान स्वयम् ॥" 'ककार परमेशानि कुण्डलीत्रय
संयुतम् ।'¹²
१-१२. कामधेनु तन्त्र
भूमिका ३९
संसार के समस्त प्राणियों का जन्म ब्रह्मा से होता है। सभी का पालन विष्णु
द्वारा एवं संहार रुद्र द्वारा होता है किन्तु ये तीनों भी वर्ण से ही उत्पन्न होते हैं ।¹
मन्त्र की परिभाषा
१. मन्त्र और मन्त्र का स्वरूप—
‘मन्त्र’ मननत्राणस्वरूप होते हैं। तन्त्रशास्त्र में मन्त्र को ‘मनु’ भी कहा जाता
है। ‘मृत्युञ्जयभट्टारक’ में कहा गया है कि चूँकि मन्त्र का ‘म’ शब्द—संसार से
उन्मोचन, शिव से योजन, एवं ‘त्र’ शब्द—मनन करने से त्राण करने का विधायक
है अतः इसे ‘मन्त्र’ कहा गया है—
“मोचयन्ति च संसाराद्योजयन्ति परे शिवे। मननत्राणधर्मित्वात्तेन मन्त्रा इति
स्मृताः ।। (२१।१) ‘मन्त्र’ को मन्त्र इसलिए कहते हैं क्योंकि यह पूर्णाहन्ता का
अनुसंधान करता है, मनन धर्मा है, त्राण-कर्ता है—‘पूर्णाहन्तानुसंध्यात्मा स्फूर्जन्मनन
धर्मतः। संसारक्षयकृत्त्राणा धर्मतो मन्त्र उच्यते ।।²
२. मन्त्र का स्वरूप—
मन्त्र की सामान्य परिभाषा यह है कि जो मनन करने से साधकों का त्राण
करे वही ‘मन्त्र’ है—
‘मननात् त्राणधर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः ।।' (सङ्केत पद्धति)
‘मन्त्र’ परमात्मा का शब्द-विग्रह है। मन्त्र परमात्मा का शब्दावतार है। मन्त्र
का मूलाधिष्ठान ‘नाद’ है अर्थात् मन्त्र का मूल तत्त्व—‘नाद’ है अतः तत्त्वतः
‘मन्त्र’ नादमय हैं। चूँकि ‘नाद’ बिन्दु के रूप में परिणत होता है अतः सारे
मन्त्र—‘बिन्दुरूप’ भी हैं। सृष्टि-विधान देखिए—‘आसीच्छक्तिःस्ततोनादः नादाद् बिन्दु
समुद्भवः ।।'³
सारांश—
(१) मन्त्र नादमय है, मन्त्र बिन्दुमय .है ।
(२) परब्रह्म का सगुणरूप ‘शब्दब्रह्म’ है अतः शब्दब्रह्मजन्यमन्त्र भी ब्रह्ममय है
(३) ‘मन्त्र’ चित् शक्ति की अभिव्यक्ति है—‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः’—अतः मन्त्र
अपने तात्विक स्वरूप में चिन्मय एवं शक्तिमय है।
(४) ‘यंत्र’ मन्त्रावयवों से सङ्घटित हैं अतः मन्त्र यंत्रस्वरूप भी है।
(५) ‘चक्र’ मन्त्रोपेत, मन्त्र-घटित एवं मन्त्र की शक्ति से संवलित हैं अतः
मन्त्र चक्रस्वरूप भी हैं।
१. कामधेनु तन्त्र २. सौभाग्यभास्कर
३. शारदातिलक
४० वरिवस्यारहस्ये
(६) चूँकि मन्त्र मातृकाओं से प्रकट होते हैं अतः मन्त्र मातृकास्वरूप भी है ।
(७) चूँकि मन्त्र एवं उसके अर्थस्वरूप देवता में तत्वतः कोई भेद नहीं होता
अतः मन्त्र देवतामय भी है ।
(८) चूँकि 'देवता' आत्मा के ही एक विशिष्ट रूप हैं अतः सारे मन्त्र
आत्मचैतन्यमय हैं—इसीलिए प्रत्यक् चैतन्य का विकास न होने तक
मन्त्र का विकास नहीं होता—मन्त्र का साक्षात्कार नहीं होता, देवता का
दर्शन नहीं होता एवं मन्त्र सिद्ध नहीं होते ।
(९) 'मन्त्र'—चित्त्तत्त्व की रश्मियाँ हैं—'मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥'
(१०) ओंकाररूप मूल मन्त्र से जगत् की सृष्टि होती है—इसी मन्त्र में जगत्
स्थित रहता है तथा प्रलय के समय इसी मन्त्रतत्त्व में लीन हो जाता
है अतः 'मन्त्र'—सृष्टि-पालन-संहारमय तथा विश्वमय एवं विश्वातीत सभी
हैं ।
(११) 'मनन' एवं 'त्राण' इन दो प्रधान धर्मों से संवलित होने के कारण मन्त्र
मनन-त्राता भी है—'मननात्त्राण धर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः ॥'१
'मन्त्रसङ्केतकं मननात् त्रायन्तो साधकमिति मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥'२
(१२) 'मन्त्र' प्रकाशविमर्शात्मक हैं एवं परमशिव तथा पराशक्ति के प्रकाशक
है—(प्रकाश विमर्शात्मक परमशिव-पराशक्ति प्रतिपादनपरत्वात्)३
(१३) जो मन्त्र के रहस्यों को जान लेता है वह 'परमशिव' हो जाता है—
('मन्त्रसङ्केतकस्यवेत्ता ज्ञाता त्रिपुराकारोवेदन संपरिस्फुरत्परमशिवभट्टारको
वीरचक्रेश्वरो भवेत् । परमशिव एव भवेत् ॥'४ मन्त्रसङ्केतकं दिव्यमधुना
कथयामि ते ।—यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत् । (योगिनी हृदय)
त्रिकदर्शन की गीता 'शिवसूत्र' में 'शाक्तोपाय' के रूप में मन्त्र को
ग्रहण करके कहा गया है—"चित्तं मन्त्रः ॥"
भास्कराचार्य कहते हैं कि मनन-त्राण करने के कारण तुतीयकूट में
'मन्त्रत्व' की स्थिति प्राप्त होती है । तीन कूट हैं—पश्यन्ती, मध्यमा
एवं वैखरी । यह तुरीय मन्त्र है—'परमातृका' ॥५
(१४) भगवती पराशक्ति स्वयं मन्त्ररूपिणी हैं—
ज्ञातृज्ञानमयाकार मननान्मन्त्ररूपिणी ।
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥६
इस प्रकार 'मन्त्र' एक अचिन्त्य शक्ति का अपर पर्याय है ।
१-४. अमृतानन्दनाथ—'दीपिका' ५. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध'
६. योगिनीहदय
भूमिका ४१
(१५) 'मन्त्र' भगवान का वर्णावतार है । 'मन्त्र' भगवती का शब्द-विग्रह है ।
३. मन्त्रस्वरूप विषयक अन्य दृष्टियाँ—
'मन्त्र' परमात्मा का सार्वकालिक शाश्वत एवं चिन्मय शब्दावतार है । 'मन्त्र'
अपने तात्त्विकस्तर वर्ण या अक्षर नहीं है प्रत्युत् पराशक्ति की नादात्मक
अभिव्यक्तियाँ हैं । इसीलिए इन्हें शिवात्मक कहा गया है क्योंकि शक्ति एवं शिव
अभिन्न हैं । समस्त मन्त्र वर्णात्मक तो हैं ही किन्तु सारे वर्ण भी शिवात्मक हैं—
'मन्त्रावर्णात्मका सर्वेवर्णाः सर्वेशिवात्मकाः ॥'
परावाक् को परमेष्ठी परमशिव का परमन्त्रात्मक विमर्शस्वरूप 'हृदय' कहा
गया है । 'मन्त्र' ही उसका हृदय है । विमर्शशक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई मन्त्र
नहीं है और यही मन्त्र परमेष्ठी शिव का हृदय है—"सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकाला
विशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥"१
'मन्त्र'-साधना के तीन मुख्य अङ्ग हैं—१. मन्त्र २. मन्त्र-जापक ३. मन्त्र का
वाच्य (देवता) ॥ अपने तात्त्विकस्तर पर मन्त्र वहीं है जहाँ मन्त्र एवं उसका
वाच्यदेवता एकात्मता प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि—
“मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि ।
वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ॥”२
मन्त्र की मूल शक्ति है चित् शक्ति । इसीलिए कहा गया है—
“मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥” मन्त्र का बल है निरावरण चित्शक्ति का उल्लासन । उसी
शक्ति को लेकर 'मन्त्र' सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त हो उठते हैं
और उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । आत्मा के परतत्त्व का अवबोध
होने के कारण मन्त्रज्ञ इच्छामात्र द्वारा मन्त्रों का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है ।३
'त्रिकसार' नामक ग्रन्थ में ठीक ही कहा गया है कि वर्णातीत निराकार परम
तत्त्व का अवबोध हो जाने पर 'मन्त्र' मन्त्राधिपों के साथ ही मांत्रिक के किङ्कर हो
जाते हैं । चिच्छक्ति के बल का संस्पर्श न होने पर वे मन्त्र केवल वर्णमात्र (जड़
अक्षर) मात्र बनकर रह जाते हैं और कठपुतली के समान निष्फल चेष्टा करते हैं ।
'हंसपारमेश्वर'-नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है कि “केवल वर्णरूप मन्त्र
'पशुभाव' में स्थित हैं जबकि सुषुम्नामार्ग से उच्चरित होने पर वे पशुपति बन जाते
हैं और इस प्रकार मन्त्र की दो अवस्थाएँ हैं—१. 'पशु अवस्था' २. 'पशुपति
अवस्था' ।
'श्रीवैहायसी'-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—“संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि
द्वारा ही बोधित जान करना चाहिए । यथा सूत्र में मणि पिरोये जाते हैं तद्वत्
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (अ० ४) २. ब्रह्मानन्द गिरि—शाक्तानन्द तरंगिणी
३. स्पन्द प्रदीपिका
४० वरिवस्यारहस्ये
(६) चूँकि मन्त्र मातृकाओं से प्रकट होते हैं अतः मन्त्र मातृकास्वरूप भी है ।
(७) चूँकि मन्त्र एवं उसके अर्थस्वरूप देवता में तत्वतः कोई भेद नहीं होता
अतः मन्त्र देवतामय भी है ।
(८) चूँकि 'देवता' आत्मा के ही एक विशिष्ट रूप हैं अतः सारे मन्त्र
आत्मचैतन्यमय हैं—इसीलिए प्रत्यक् चैतन्य का विकास न होने तक
मन्त्र का विकास नहीं होता—मन्त्र का साक्षात्कार नहीं होता, देवता का
दर्शन नहीं होता एवं मन्त्र सिद्ध नहीं होते ।
(९) 'मन्त्र'—चित्तत्त्व की रश्मियाँ हैं—'मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥'
(१०) ओंकाररूप मूल मन्त्र से जगत् की सृष्टि होती है—इसी मन्त्र में जगत्
स्थित रहता है तथा प्रलय के समय इसी मन्त्रतत्त्व में लीन हो जाता
है अतः 'मन्त्र'—सृष्टि-पालन-संहारमय तथा विश्वमय एवं विश्वातीत सभी
हैं ।
(११) 'मनन' एवं 'त्राण' इन दो प्रधान धर्मों से संवलित होने के कारण मन्त्र
मनन-त्राता भी है—'मननात्राण धर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः ॥'१
'मन्त्रसङ्केतकं मननात् त्रायन्तो साधकमिति मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥'२
(१२) 'मन्त्र' प्रकाशविमर्शात्मक है एवं परमशिव तथा पराशक्ति के प्रकाशक
है—(प्रकाश विमर्शात्मक परमशिव-पराशक्ति प्रतिपादनपरत्वात्)३
(१३) जो मन्त्र के रहस्यों को जान लेता है वह 'परमशिव' हो जाता है—
('मन्त्रसङ्केतकस्यवेत्ता ज्ञाता त्रिपुराकारोवेदन संपरिस्फुरत्परमशिवभट्टारको
वीरचक्रेश्वरो भवेत् । परमशिव एव भवेत् ॥'४ मन्त्रसङ्केतकं दिव्यमधुना
कथयामि ते ।—यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत् । (योगिनी हृदय)
त्रिकदर्शन की गीता 'शिवसूत्र' में 'शाक्तोपाय' के रूप में मन्त्र को
ग्रहण करके कहा गया है—'“चित्तं मन्त्रः ॥”'
भास्कराचार्य कहते हैं कि मनन-त्राण करने के कारण तुटीयकूट में
'मन्त्रत्व' की स्थिति प्राप्त होती है । तीन कूट हैं—पश्यन्ती, मध्यमा
एवं वैखरी । यह तुरीय मन्त्र है—'परामातृका' ॥५
(१४) भगवती पराशक्ति स्वयं मन्त्ररूपिणी हैं—
ज्ञातृज्ञानमयाकार मननान्मन्त्ररूपिणी ।
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥६
इस प्रकार 'मन्त्र' एक अचिन्त्य शक्ति का अपर पर्याय है ।
१-४. अमृतानन्दनाथ—'दीपिका' ५. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध'
६. योगिनीहृदय
भूमिका ४१
(१५) ‘मन्त्र’ भगवान का वर्णावतार है । ‘मन्त्र’ भगवती का शब्द-विग्रह है ।
३. मन्त्रस्वरूप विषयक अन्य दृष्टियाँ—
‘मन्त्र’ परमात्मा का सार्वकालिक शाश्वत एवं चिन्मय शब्दावतार है । ‘मन्त्र’
अपने तात्त्विकस्तर वर्ण या अक्षर नहीं है प्रत्युत् पराशक्ति की नादात्मक
अभिव्यक्तियाँ हैं । इसीलिए इन्हें शिवात्मक कहा गया है क्योंकि शक्ति एवं शिव
अभिन्न हैं । समस्त मन्त्र वर्णात्मक तो हैं ही किन्तु सारे वर्ण भी शिवात्मक हैं—
‘मन्त्रावर्णात्मका सर्वेवर्णाः सर्वेशिवात्मकाः ॥’
परावाक् को परमेष्ठी परमशिव का परमन्त्रात्मक विमर्शस्वरूप ‘हृदय’ कहा
गया है । ‘मन्त्र’ ही उसका हृदय है । विमर्शशक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई मन्त्र
नहीं है और यही मन्त्र परमेष्ठी शिव का हृदय है—‘‘सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकाला
विशेषिणी । सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥’’१
‘मन्त्र’-साधना के तीन मुख्य अङ्ग हैं—१. मन्त्र २. मन्त्र-जापक ३. मन्त्र का
वाच्य (देवता) ।। अपने तात्त्विकस्तर पर मन्त्र वहीं है जहाँ मन्त्र एवं उसका
वाच्यदेवता एकात्मता प्राप्त कर लेते हैं क्योंकि—
‘‘मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनं परमेश्वरि ।
वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ॥’’२
मन्त्र की मूल शक्ति है चित् शक्ति । इसीलिए कहा गया है—
‘‘मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥’’ मन्त्र का बल है निरावरण चित्शक्ति का उल्लासन । उसी
शक्ति को लेकर ‘मन्त्र’ सहज नादशक्ति से उद्बोधित होकर प्रदीप्त हो उठते हैं
और उनमें सर्वज्ञता आदि का बल आ जाता है । आत्मा के परतत्त्व का अवबोध
होने के कारण मन्त्रज्ञ इच्छामात्र द्वारा मन्त्रों का यथेष्ट प्रयोग कर सकता है ।३
‘त्रिकसार’ नामक ग्रन्थ में ठीक ही कहा गया है कि वर्णातीत निराकार परम
तत्त्व का अवबोध हो जाने पर ‘मन्त्र’ मन्त्राधिपों के साथ ही मांत्रिक के किङ्कर हो
जाते हैं । चिच्छक्ति के बल का संस्पर्श न होने पर वे मन्त्र केवल वर्णमात्र (जड़
अक्षर) मात्र बनकर रह जाते हैं और कठपुतली के समान निष्फल चेष्टा करते हैं ।
‘हंसपारमेश्वर’-नामक ग्रन्थ में भी कहा गया है कि ‘‘केवल वर्णरूप मन्त्र
‘पशुभाव’ में स्थित हैं जबकि सुषुम्नामार्ग से उच्चरित होने पर वे पशुपति बन जाते
हैं और इस प्रकार मन्त्र की दो अवस्थाएँ हैं—१. ‘पशु अवस्था’ २. ‘पशुपति
अवस्था’ ।
‘श्रीवैहायसी’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—‘‘संधिस्थल में नादोर्ध्वध्वनि
द्वारा ही बोधित जान करना चाहिए । यथा सूत्र में मणि पिरोये जाते हैं तद्वत्
१. ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (अ० ४) २. ब्रह्मानन्द गिरि—शाक्तानन्द तरंगिणी
३. स्पन्द प्रदीपिका
४२ वरिवस्यारहस्ये
शक्ति के ताने-बाने से विनिर्मित मन्त्राक्षरों का ही ध्यान करना चाहिए। वह शक्ति
परम व्योम में निवास करती है और परमामृत से समृद्ध है।—उक्त पद्धति से जप
करने पर मन्त्र अपना स्वस्वरूप उद्घाटित कर देता है और अपने ऊपर से
आवरण का उन्मोचन कर देता है।
‘श्रीकालपरा’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—शब्दनादात्मक हैं। उनके
साथ प्रत्यय, (संवित्) संलग्न रहता है और उनमें वृद्धि करता है। मन्त्रबोध के
स्वरूप में स्थित जो संवित् है वह मन्त्र से अभिन्न है अतः वह आत्म-बोध करा
देती है।
‘सङ्कर्षणसूत्र’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—चिद्रूपता स्वात्मैकनिष्ठ है।
भाव एवं अभाव उसकी दिशाएँ एवं परिष्कार है। वह स्वसंवेदन-संवेद्य है। वह
प्रकृति का विषय भी है साथ ही वह प्रकृत्यातीत भी है। यही है मन्त्रों का
प्रत्ययात्मक कारण। मन्त्र बाहर एवं भीतर वर्णरूप से प्रकट होते है। वे शाश्वत
पदरूप मन्त्र मनुष्य के कर-चरण आदि के समान है। वीर्य के योग से प्रत्येक
काल में ये मन्त्र-प्रयोग सिद्ध होते हैं।१
शुद्ध बोधात्मक रूप से अन्तर्बाह्य दोनों में उदित मन्त्र का एक बार भी जप
किये जाने पर वह लक्ष बार किए गए जप के समान फल वाला हो जाता ‘है।२
‘जयसंहिता’-नामक ग्रन्थ में इसी तथ्य को प्रमाणित करते हुए कहा गया है
कि—जब एक ही मन्त्रनाथ अन्तर एवं बाह्य दोनों में उदित होकर एक हो जाते हैं
तब ऐसे जप को लक्षसंख्या से भी अधिक महनीय समझना चाहिए। इन्हीं भावों
को इन शब्दों में व्यक्त किया गया है—
“तदाक्रम्य बलं मन्त्रा सर्वज्ञबलशालिनः।
प्रवर्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनः॥”३
ये मन्त्र-साधक चित्त की प्रवृत्ति-निवृत्ति के निमित्त (साधक की इच्छा होने पर)
शक्तिस्वभाव में लीन हो जाते हैं क्योंकि मन्त्र स्वस्वभाव के अनुगामी एवं शक्तिरूप
हैं।४
‘कालपरा’-नामक ग्रन्थ में कहा गया है कि—पर अक्षर रूप विटप में अनेक
शक्तियाँ विद्यमान हैं। उनके विवर्त शक्तिरूप में वर्णों के माध्यम से प्रकट होते हैं।
ये शक्तियाँ कृतकृत्य होने के कारण शान्त एवं निरञ्जन हैं। मन्त्र सर्वज्ञ एवं
सर्वकर्ता हैं। मन्त्र शिवधर्मी हैं। आचार्य कल्लट ने ‘स्पन्दकारिका’ में इसकी पुष्टि
करते हुए कहा है—
“तत्रैव सम्प्रलीयन्ते शान्तरूपाः निरञ्जनाः।
सहसाधक चित्तेन तेनैते शिवधर्मिणः॥”५
१. संकर्षणसूत्र २. स्पन्द प्रदीपिका
३. स्पन्द कारिका ४. स्पन्द प्रदीपिका
५. स्पन्द कारिका
भूमिका ४३
‘साधक के चित्त में मन्त्र लीन हो जाते हैं’—कहने का तात्पर्य यह है कि
आत्मा ही शिव है । यह आत्मा सर्वमय, सर्वात्मक एवं विश्वरूप है क्योंकि यह
बोद्धा है । संवित् ही मन्त्रात्मा है अतः मन्त्र शिवरूप हैं ।
मन्त्र एवं जप वर्णात्मक होने पर भी मूलतः संविदात्मक हैं आन्तर-विकास की
निष्पत्ति हैं—आत्मोल्लास का अपर पर्याय हैं । इसीलिए ‘बौद्धायन संहिता’ में कहा
गया है कि—‘चन्द्रमा शान्त हो जाय एवं सूर्य का उदय भी न हो, उस समय
समस्त देवों का विलय एवं समस्त मन्त्रों का उदय हुआ करता है ।।'
‘मालिनीविजय’-नामक ग्रन्थ में भी इसी तथ्य को पुष्टि करते हुए कहा गया है
कि—‘जिस अवस्था में जीव अन्य आधारों से विनिर्मुक्त होकर स्वस्वरूप में लीन हो
जाता है वही अवस्था मन्त्रों के उद्भव का स्थान है ।'
यह भी कहा गया है कि—‘‘जब पुरुष का चित्त धर्माधर्म के संधि-स्थल में
निरुद्ध हो जाता है तब वह जो कुछ भी बोलता है वही ‘मन्त्र’ हो जाता है ।
केवल स्वर, वर्ण मातृका से निर्मित मन्त्र ही मन्त्र नहीं होते ।।'’
“धर्माधर्मान्तरे चित्तं निरुद्धं यत्तदा तु सः ।
यद्वक्ति स भवेन्मन्त्रः किं पुनर्मातृकोत्थितः ॥”
इसीलिए कहा गया है कि अनिरुद्ध चित्त वाला साधक जिस मन्त्र का जप
करता है वे मन्त्र उस स्थिति में पशुभाव में स्थित रहते हैं किन्तु जब उन्हीं मन्त्रों
का सुषुम्णा नाड़ी से उच्चारण होने लगता है तब वे ही मन्त्र ‘पशुपति’ बन जाते
हैं¹—
“पशुभावे स्थिता मन्त्राः केवलः वर्णरूपिणः ।
सौषुम्णोऽध्वन्युच्चरिताः पतित्वं प्राप्नुवन्ति ते ॥”
मन को चेतन करके उठाना होगा । सुषुम्ना का स्रोत ही चैतन्य की धारा
है । मन को जगाकर ऊर्ध्वमुखी सुषुम्णा की धारा में डाल देना होगा ।²
यह जाग्रत मन ही मन्त्रस्वरूप है । यही प्रबुद्ध कुण्डलिनी की स्फूर्ति है ।
जाग्रत मन ही मन्त्र है इसीलिए शिवसूत्र में कहा गया है—‘चित्तमन्त्रः’ हृदयाकाश
में मन लीन होने पर पुनः व्युत्थित होकर बहुमुखी दौड़ने लगता है महाकाश में
एकीभूत मन उत्थित होने पर एकमुखी होकर दौड़ता है । अतः मन को और ऊपर
उठाकर (मन को कम्पनहीन करके) मन को विकल्पहीन करना होगा । यही मन
जाग्रत मन “मन्त्र” है—‘‘चित्तं मन्त्रः ।’’
१. हंस पारमेश्वर
२. शक्तिसम्पन्न शब्दराशि ही मन्त्र है । निरुद्ध, कम्पन-शून्य, हृदयाकाश एवं
महाकाश को अतिक्रान्त करके विकल्प-शून्य स्थिति में आरूढ़ एवं सुषुम्णा धारा में लीन
मन ही मन्त्र है । इसी से ‘चित्तं मन्त्रः’ कहा गया है ।
४४ वरिवस्यारहस्ये
'मननंविश्वविज्ञानं त्राणं संसारसङ्कटात् ।
यतः करोति संसिद्धो मन्त्र इत्युच्यते प्रिये ।।'१
आगमों में कहा गया है—'मननात्राणधर्माणो मन्त्राः स्युः परिकीर्तिताः ।।'
शिवसूत्र में कहा है—'चित्तं मन्त्रः ।।'
'मंत्रिगुप्तभाषणे' (चु०प०से०) से घञ् (३।३।१९, १८) करने पर मन्त्र शब्द
निष्पन्न होता है । इसका अर्थ निम्न है—"मन्त्रो वेदविशेषे स्याद्देवादीनां च साधने ।
गुह्यवादेऽपि च पुमान् ।"२ "वेदे भेदे गुह्यवादे मन्त्रः"३ "मन्त्र्यतेऽनेन इति मन्त्रः ।।"
मन्त्र = 'मन्त्रणम्' ।।
४. 'शाक्तानन्दतरंगिणी' की दृष्टि—
ब्रह्मानन्दगिरि ने 'शाक्तानन्दतरंगिणी' के नवमोल्लास में कहा है कि—"मन्त्र"
सुनिश्चित वर्णों की शाब्दिक पुनरावृत्ति या जिह्वा का वर्णावृत्तिरूप अध्यवसाय नहीं है
बल्कि “मन्त्रार्थं देवतारूपं चिन्तनम्” तथा 'मन्त्र' देवता से पृथक् कोई सत्ता नहीं है
प्रत्युत मन्त्र वही है जो देवता है अतः मन्त्र एवं देवता में अभेद है—
“वाच्यवाचकभावेन अभेदो मन्त्रदेवयोः ।।”४
'मन्त्रार्थ' की व्याख्या करते हुए ब्रह्मानन्दगिरि कहते हैं कि—"हे देवी !
मन्त्रार्थ को सावधानी से हृदयङ्गम कीजिए । आधारपद्म में विद्या को गुरुस्फटिक के
सदृश कल्पित करें, लिङ्ग स्थान में बंधूक के समान, नाभि में स्फटिक के समान
हृदय में मरकत के समान, विशुद्ध चक्र में हरे रङ्ग में, आज्ञाचक्र में
'चतुर्वर्णानुरंजित' रूप में कल्पित करें ।" 'रुद्रयामल' में कहा गया है कि—मन्त्र
को गुरु के पास ले जाकर गुरुभक्ति दिखाकर गुरु से—१. मन्त्र का कान २. मन्त्र
का मुख ३. मन्त्र का नेत्र, एवं ४. मन्त्र का प्राण—यत्नपूर्वक जानना चाहिए ।
फिर मन्त्र का 'कीलक' जानकर मन्त्र की पुरुष्क्रिया की जानी चाहिए ।
“मन्त्रंनीत्वा गुरोः पार्श्वे गुरुभक्तिपुरःसरः ।
मन्त्रस्य श्रोत्रास्य नेत्रप्राणान् विज्ञाय यत्नतः ।।”५
मन्त्र के श्रोत्रादिक के ज्ञान के बिना मन्त्र-जाप—दारिद्र्य, विपत्ति, नरक ।।६
उदाहरणार्थ काली मन्त्र लें—
कालीमन्त्र का—१. श्रोत्र—बिन्दु, २. मुख—नाद, ३. हृदय—ककार, ४.
नेत्र—वह्नि ५. कीलक—दीर्घीकार,।७
१. देवतत्त्व, २. प्राणतत्त्व, ३. बिन्दुतत्त्व, ४. ज्ञानतत्त्व, ५. शक्तितत्त्व, ६.
योनितत्त्व आदि नव तत्त्व जानकर ही मन्त्र का जप करना चाहिए, अन्यथा नहीं ।
१. माहेश्वर तन्त्र (ज्ञानखण्ड) २. मेदिनी कोष
३. अमर कोष ४-६. शाक्तानन्दतरंगिणी
७. भूत डामर
भूमिका ४५
"बिन्दुतत्त्वं प्रजप्याथ ज्ञानतत्त्वं च सुन्दरि । प्राणतत्त्वं च चार्वङ्गि देवतत्त्वं
तथैव च । जपतत्त्वं मन्त्रतत्त्वं ध्यानतत्त्वं सुलोचने ।।''१
वैसे तो समस्त 'मन्त्र' वर्णात्मक हैं किन्तु वे मात्र वर्णात्मक नहीं हैं—
शक्त्यात्मक भी हैं—'सर्वेवर्णात्मका मन्त्रास्ते च शक्त्यात्मकाः प्रिये । शक्तिस्तु
मातृका ज्ञेया सा च ज्ञेया शिवात्मिका ।।''
'मन्त्र' स्थूल अक्षर से ऊपरी धरातल की वस्तु हैं । इसीलिए कहा गया है—
'मन्त्रे चाक्षर बुद्धिस्स्याद् गुरौ तु मानवः प्रिये । देवतायाः वरारोहे प्रतिबुद्धिस्तु जायते ।
किं तस्य जप पूजायां सर्वं व्यर्थं कदर्थनम् ।।''२
'स्पन्दप्रदीपिका' में मन्त्र के चार तत्त्व बताए गए हैं—१. बीज, २. पिण्ड,
३. पद, ४. नाम । मन्त्र के दो कार्य बताए गए हैं—१. मनन, २. त्राण ।।
'शब्द', 'मन्त्र', 'ओंकार' एवं देवता तत्त्वतः अभिन्न हैं । समस्त मन्त्रों की
मूल एवं सर्वोच्च प्रकृति ॐकार है । अर्धमात्रादिक में जो प्रतिफलित चैतन्य है
वही 'मन्त्र' है ।
समग्र विश्व की उत्पत्ति शब्द द्वारा हुई है । 'समस्त विश्व शब्द में ही विधृत
है ।'' शब्दातीत परमपद का साक्षात्कार करने हेतु भी शब्द का आश्रय लेना पड़ता
है तथा शब्द-राज्य का भेदन करने हेतु भी शब्द का आश्रय लेना पड़ता है । सृष्टि
में रहने एवं सृष्टि से बाहर जाने दोनों के लिए शब्द ही एक मात्र आलम्बन है ।
इसीलिए शब्द को पकड़कर शब्दातीत परब्रह्म पद में जाने का विधान किया गया
है । मन्त्रों का मूल उद्भवस्थान (योनि) 'ज्ञानशक्ति' है—
'ज्ञानशक्तिः परासूक्ष्मा मातृकां तां विदुर्बुधाः । सा योनिः सर्वमन्त्राणां सर्वत्रा-
रणिवत्स्थिताः ।' मन्त्रों के अवयवभूत वर्णों की भी आत्मा है—'मातृका' । इसी
मातृका से मन्त्र निर्मित होते हैं—
मातृका या महामातृका ही विश्वजननी है । शब्दब्रह्म ही यह परामातृका है ।
अस्तित्व के तीन स्तर हैं—१. 'दिव्य समरसभूमि' = यहाँ न तरङ्ग है, न स्पंदन,
न विमर्शन, न सृष्टि, न संरक्षण, न संहार, न तिरोधान, न अनुग्रह, न
शिव-शक्ति, न जीव जगत् । अद्वय परम स्थिति की वह अवस्था जहाँ पूर्ण सत्य
अपनी महिमा में पूर्णतः विराजमान है । २. द्वितीयावस्था = यहाँ परब्रह्म भी है
और शब्दब्रह्म भी । परावाक् ही शब्दब्रह्म है । यही है युगलभाव की अवस्था—
'शिवशक्ति की समरसावस्था' । यह सामरस्य नित्य है । यह 'यामल', 'युगनद्ध',
'युगल' की अवस्था है । सृष्टि के मूल में है—'बिन्दु' । स्वातन्त्र्य—स्पन्दन द्वारा
'बिन्दु' का स्पर्श—रेखा रूप में बिन्दु की परिणति—त्रिकोण = (सृष्टि की मूल
योनि) ।।
शब्द, अर्थ एवं ज्ञान परस्पर सम्बद्ध हैं । अर्थ ही जगत् है क्योंकि वह
१-२. कामधेनु तन्त्र
४६ वरिवस्यारहस्ये
पदार्थों की समष्टि है । शब्द का अर्थ से जो सम्बंध है वह है तीन प्रकार का—
१. अभेद सम्बन्ध, २. भेदाभेद सम्बन्ध, ३. भेद सम्बन्ध ।
पश्यन्ती अवस्था = यहाँ शब्दार्थ में अभेद सम्बंध है । यहाँ जो शब्द है वही
अर्थ है, जो अर्थ है वही शब्द है ।
मध्यमावस्था = यहाँ शब्दार्थ में भेदाभेद सम्बंध है ।
वैखरीअवस्था = यहाँ शब्द से अर्थ का भेद सम्बंध है । (परावस्था में शब्द,
अर्थ, ज्ञान—पृथक्-पृथक् रूप में भासमान नहीं होते ।)
मातृका ही प्रत्यवमर्शनकारिणी शक्ति है । मातृकाशक्ति के जुड़ने पर ही
‘प्रकाश’ अपने को प्रकाश के रूप में पहचान पाता है अन्यथा नहीं । ‘अहं’ में
भी मातृका की ही क्रीड़ा है । ‘पूर्णाहन्ता’ (पूर्ण अहं या परमेश्वर के स्वरूप) को
भी मातृका द्वारा ही पकड़ा जा सकता है । (पूर्णत्व उन्मनी अवस्था में है ।)
मन्त्र को जो देवता से अभिन्न कहा गया है—उसका अर्थ यही है कि
मन्त्राक्षर वैखरीभाव (भेदराज्य) एवं मध्यमाभाव (भेदाभेद राज्य) का त्याग करके
पश्यन्तीभाव (अभेद राज्य) तक यात्रा करें जहाँ कि शब्द से उसका अर्थ (वाचक
से उसका वाच्य) अभिन्न रूप से दिखाई दे अर्थात् मन्त्र से मन्त्रवाच्य अभिन्न रूप
में दर्शन दे, अर्थात् जहाँ मन्त्र एवं उसके वाच्यदेवता में रञ्चमात्र भी भेद दृष्टिगत न
हो । जहाँ मन्त्र और उसका देवता दोनों एक हैं वह अवस्था ही मन्त्र का
वास्तविक अर्थ है । चूँकि पश्यन्ती की अवस्था में शब्द और अर्थ अभिन्न रूप से
स्थित हैं उसी प्रकार वहाँ मन्त्र और उसका अर्थ रूप देवता भी अभिन्न रूप में
स्थित हैं अतः मन्त्र वहाँ देवता के रूप में एवं देवता मन्त्र के रूप में एवं दोनों
एक दूसरे के रूप में दृष्टिगत होंगे । ‘मन्त्र’ अपने वास्तविक स्तर पर देवता से
अभिन्न रूप में ही स्थित रहते हैं अतः मन्त्र की इसी मूल आदर्श दशा को दिखाने
के लिए कहा गया है कि मन्त्र ही देवता है ।
६. ओंकार (प्रणव) और मन्त्र—ओंकार ही महामन्त्र है । वेदों में कहा
गया है कि मनोभावों एवं विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए जिस वाणी का
उपयोग किया जाता है उसके चार प्रकार हैं । उसे केवल ‘मनीषी ब्राह्मण’ ही
जानते हैं अन्य नहीं । इनमें तीन वाणियाँ गुहा में गुप्तरूप से स्थित हैं । केवल
चौथी वाणी ही मनुष्य बोला करते हैं अन्य वाणियाँ नहीं क्योंकि अन्य वाणियों का
(गुप्त तीन वाणियों का) ज्ञानमात्र मनीषी ब्राह्मणों को ही है अन्य को नहीं—
‘चत्वारि वाक् परिमिता पदानि, तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः ।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति, तुरीयो वाचो मनुष्या वदन्ति ॥
सारांश—
१. परा, पश्यन्ती एवं मध्यमा वाणी (मनुष्यों को अज्ञात । केवल मनीषी
ब्राह्मणों को ज्ञात)
भूमिका ४७
२. वैखरी वाणी = तुरीय वाणी । (मनुष्यों द्वारा बोली जाने वाली वाणी ।)
इनमें तीन गुप्त वाणियों में भी गुप्त हैं 'पश्यन्ती' एवं 'पश्यन्ती' से भी
अधिक गुप्त है 'परावाणी' । यहीं परावाणी है—ओंकार । ओंकार ही सब कुछ
है—उसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, वेद के प्रमाण देखिए—
१. 'ॐ कार एवेदं सर्वम्' (छा०उप०)—यह सब कुछ (समस्त जगत्) ओंकार
ही है ।
२. 'ॐ तद्ब्रह्म' (मु०उप०)—ॐ वह अचिन्त्य परात्पर परमात्मा है ।। प्रणव
(ओंकार ही पर एवं अपर) ब्रह्म है
३. “प्रणवोऽपरं ब्रह्मप्रणवश्च परः स्मृतः । अपूर्वोऽनन्तरोऽबाह्योऽनपरः प्रणवो-
ऽव्ययः ।।”
४. 'ॐ मित्येत्' (क०उप०)—ओंकार ही यह सब (जगत्) है ।
५. 'ॐमिति ब्रह्म' (तै०उप० १।८।१)—ओंकार ही ब्रह्म है ।
६. 'एतदालम्बनम्' (क०उ० १।२।१७)—यही ओंकार ही आलम्बन है ।
७. 'एतद्वैसत्यकाम' (प्र० ३०५।२)—हे सत्यकाम । यह ओंकार है और यही
पर एवं अपर ब्रह्म है ।
८. 'ओमित्यात्मानं युञ्जीत' (मैत्र्यु० ६।३)—आत्मा का ॐ इस प्रकार ध्यान
करे ।
९. 'ओंकार एवेदं सर्वम्' (छा० ३०२।२३)—यह सब ओंकार ही है ।
१०. ओमित्येतदक्षरमिदं सर्वं । तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद्भवविष्यदिति सर्वमोंकार
एव । यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ।। (माण्डूक्योपनिषदः १।१)
—ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है । यह जो कुछ भूत, भविष्यत् एवं
वर्तमान है—उसी की व्याख्या है । इसलिए यह सब ओंकार ही है ।
इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है ।
११. 'सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात्' (माण्डूक्यो० १।२)
—यह सब ब्रह्म ही है । यह आत्मा ही ब्रह्म है । वह यह आत्मा चार
पादों वाला है ।
१२. सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो
मकार इति ।। (माण्डुक्य० १।८)—वह यह आत्मा अक्षर की दृष्टि से
ओंकार है, वह मात्राओं को विषय करके स्थित है । पाद ही मात्रा हैं
और मात्रा ही पाद हैं । वे मात्रा अकार, उकार एवं मकार हैं । (क)
ओंकार की प्रथममात्रा—'अकार' । (ख) ओंकार की द्वितीय मात्रा—
'उकार' । (ग) ओंकार की तृतीय मात्रा—'मकार' ।
४ वरि. भू.
४८ वरिवस्यारहस्ये
(क) जागरित स्थान = 'वैश्वानर' = ॐ की प्रथममात्रा = 'अ' ॥
(ख) स्वप्न स्थान = 'तैजस' = ॐ की द्वितीयमात्रा = 'उ' ॥
(ग) सुषुप्ति स्थान = 'प्राज्ञ' = ॐ की तृतीयमात्रा = 'म' ॥
(घ) तुरीय, तुरीयातीत = आत्मा का तुरीयपाद = तुरीयआत्मा = मात्रा-शून्य ॐ
'अमात्रश्चतुर्थोऽव्यवहार्यः प्रपञ्चोपशमः शिवोऽद्वैत एवमोंकार आत्मैव
संविशत्यात्मनात्मानं य एवं वेद ।'—(माण्डू० १।१२) ॥
(ङ) 'प्रणवं हीश्वरं विद्यात्सर्वस्य हृदि संस्थितम् । सर्वव्यापिनमोंकारम् ॥'—
(माण्डू० का० २८)—ओंकार हृदयस्थ ईश्वर है ।
यह ओंकार 'अनादिनिधन ब्रह्म' है—'शब्दतत्त्व' है—'अक्षर' है—'जगत्'
इसीका 'विवर्त' है—
“अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् ।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ॥”
यही ओंकार 'शब्दब्रह्म' है एवं इसी 'शब्दब्रह्म' से 'परब्रह्म' की प्राप्ति होती
है—'शब्दब्रह्मणि निष्णातः परब्रह्माधिगच्छति ।' ध्वनि का स्थूल शरीर—'आकाश'
है । ध्वनि का सूक्ष्म शरीर 'शब्दतन्मात्रा' है । ध्वनि का सूक्ष्मतम कारण शरीर—
'परशब्द' है । यही 'परशब्द' ओंकार है ।
यह वही शब्द है जो मानव पिण्ड में 'गगनशिखर' में प्रकाशित होता है—
'गगनशिखर महँ शब्द प्रकास्या तहँ बूझै अलखबिनाणी'¹, 'शब्द' (ओंकार) ही
ताला है, शब्द ही कुञ्जी है । शब्द ही शब्द को जगाता है । शब्द का शब्द से
परिचय होने पर शब्द, शब्द में समा जाता है ॥'' (शब्दहिं ताला, शब्दहिं कूची
शब्दहिं शब्द समाया । शब्दहिं शब्द से परचा हुवा शब्दहिं शब्द समाया ।²)
इसीलिए आचार्य रामानन्द ने कहा था—''शब्द को सीख ले, शब्द को बूझ ले,
शब्द से शब्द पहिचान भाई ॥''
शब्द—समस्त वर्णमाला, समस्त प्रकृत्यण्ड, मायाण्ड, शाक्ताण्ड, ब्रह्माण्ड,
समस्त जीव-जगत् ॥ पञ्चअवस्थाएँ—त्रिलोक, तैंतिस कोटि देवता, त्रिदेव,
वेदचतुष्टय, समस्तशास्त्र, समस्तमन्त्र, मन्त्रेश्वर, मन्त्रमहेश्वर आदि सारे अस्तित्व ॥
मन्त्र का वाच्य है परमात्मा । मन्त्र-साधना का लक्ष्य है परमात्मा, आत्मा एवं
ब्रह्म की प्राप्ति । चूँकि ओंकार ही आत्मा है—परमात्मा है, और ब्रह्म है—इसीलिए
सारे मन्त्रों के पूर्व ओंकार का प्रयोग किया जाता है यथा—'भुवनेश्वरी का मन्त्र
(ॐ ह्रीं ह्रीं ओं ओं) विष्णु का मन्त्र—(सेतु) ॐविष्णवे ॐ । कृष्ण का मन्त्र—
(सेतु) ॐ क्लीं ॐ । तारा का मन्त्र—(सेतु) 'ॐ ह्रीं' । समस्त वर्णों के मूल
१-२. गोरखनाथ