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वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)

Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary

भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 530 में से

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पृष्ठ 48

४० वरिवस्यारहस्ये
(६) चूँकि मन्त्र मातृकाओं से प्रकट होते हैं अतः मन्त्र मातृकास्वरूप भी है ।
(७) चूँकि मन्त्र एवं उसके अर्थस्वरूप देवता में तत्वतः कोई भेद नहीं होता
अतः मन्त्र देवतामय भी है ।
(८) चूँकि 'देवता' आत्मा के ही एक विशिष्ट रूप हैं अतः सारे मन्त्र
आत्मचैतन्यमय हैं—इसीलिए प्रत्यक् चैतन्य का विकास न होने तक
मन्त्र का विकास नहीं होता—मन्त्र का साक्षात्कार नहीं होता, देवता का
दर्शन नहीं होता एवं मन्त्र सिद्ध नहीं होते ।
(९) 'मन्त्र'—चित्त्तत्त्व की रश्मियाँ हैं—'मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥'
(१०) ओंकाररूप मूल मन्त्र से जगत् की सृष्टि होती है—इसी मन्त्र में जगत्
स्थित रहता है तथा प्रलय के समय इसी मन्त्रतत्त्व में लीन हो जाता
है अतः 'मन्त्र'—सृष्टि-पालन-संहारमय तथा विश्वमय एवं विश्वातीत सभी
हैं ।
(११) 'मनन' एवं 'त्राण' इन दो प्रधान धर्मों से संवलित होने के कारण मन्त्र
मनन-त्राता भी है—'मननात्त्राण धर्माऽसौ मन्त्रोऽयं परिकीर्तितः ॥'१
'मन्त्रसङ्केतकं मननात् त्रायन्तो साधकमिति मन्त्राश्चिन्मरीचयः ॥'२
(१२) 'मन्त्र' प्रकाशविमर्शात्मक हैं एवं परमशिव तथा पराशक्ति के प्रकाशक
है—(प्रकाश विमर्शात्मक परमशिव-पराशक्ति प्रतिपादनपरत्वात्)३
(१३) जो मन्त्र के रहस्यों को जान लेता है वह 'परमशिव' हो जाता है—
('मन्त्रसङ्केतकस्यवेत्ता ज्ञाता त्रिपुराकारोवेदन संपरिस्फुरत्परमशिवभट्टारको
वीरचक्रेश्वरो भवेत् । परमशिव एव भवेत् ॥'४ मन्त्रसङ्केतकं दिव्यमधुना
कथयामि ते ।—यद्वेत्ता त्रिपुराकारो वीरचक्रेश्वरो भवेत् । (योगिनी हृदय)
त्रिकदर्शन की गीता 'शिवसूत्र' में 'शाक्तोपाय' के रूप में मन्त्र को
ग्रहण करके कहा गया है—"चित्तं मन्त्रः ॥"
भास्कराचार्य कहते हैं कि मनन-त्राण करने के कारण तुतीयकूट में
'मन्त्रत्व' की स्थिति प्राप्त होती है । तीन कूट हैं—पश्यन्ती, मध्यमा
एवं वैखरी । यह तुरीय मन्त्र है—'परमातृका' ॥५
(१४) भगवती पराशक्ति स्वयं मन्त्ररूपिणी हैं—
ज्ञातृज्ञानमयाकार मननान्मन्त्ररूपिणी ।
तेषां समष्टिरूपेण पराशक्तिस्तु मातृका ॥६
इस प्रकार 'मन्त्र' एक अचिन्त्य शक्ति का अपर पर्याय है ।
१-४. अमृतानन्दनाथ—'दीपिका' ५. भास्कराचार्य—'सेतुबन्ध'
६. योगिनीहदय