वरिवस्यारहस्य (भास्करराय मखी - सरोजिनी हिन्दी व्याख्या, कामकला व श्रीविद्या मन्त्र-दर्शन)
Varivasyarahasya of Bhaskararaya with Sarojini Hindi Commentary
भास्करराय मखी (टीकाकार: डॉ. श्यामकान्त द्विवेदी आनन्द) द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका ३७
तृतीयकूट का प्रतीकार्थ है—
समस्त कलाओं से युक्त ब्रह्म स क ल है । ककार, एकार एवं अकार
सृष्ट्यादि के वाचक हैं । ई एवं ड = तिरोधान एवं अनुग्रह के वाचक हैं । ह स
= आनन्द का, 'क' सत्य का, 'ह' अनन्त का एवं 'ल' ज्ञान का प्रतीक है ।
'सकल'—जीव का वाचक है । स क ल = जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति का वाचक
है । सकल का अर्थ है—'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' ।
मांत्री-साधना के लिए मन्त्र, जप, दीक्षा, शक्तिपात, गुरु, यंत्र, माला,
महासेतु, सेतु, भावतत्त्व, साधनाधिकार, सूतकोद्धार, मन्त्र-चैतन्य, मन्त्रार्थभावना, गुरु
का ध्यान, मन्त्र, गुरु एवं मन्त्रेश्वर में एकता का विश्वास, मंत्रशिखा, कुल्लुका,
कवच, कीलक, अर्गला, न्यास, निर्वाण, योनिमुद्रा, प्राणायाम, मुखशुद्धि,
सूतकद्वय-मोक्षण, मुद्रा (यथा शांभवी मुद्रा), मौन, एकान्त, धैर्य, अटल विश्वास,
निर्भयता, गोपनीयता, जापक-जप्य एवं जप में अभेदभावना, अमित उत्साह, दृढ़
सङ्कल्प, प्राणयोग, मनोयोग, मन्त्रेश्वर, मन्त्र एवं गुरु की अचिन्त्य एवं अपार शक्ति
में पूर्ण विश्वास एवं मन्त्राधिकारित्व आदि तत्त्व आवश्यक है । भद्रगुप्ताचार्य ने
मन्त्र-साधना के लिए सर्वप्रथम मन्त्राधिकारी बनना आवश्यक बताया है ।
मन्त्राधिकारित्व—"दक्षो जितेन्द्रियो धीमान् कोपानल जलोपमः । सत्यवादी विलोभश्च
मायामद-विवर्जितः । मानत्यागी दयायुक्तः परनारी-सहोदरः । जितेन्द्री गुरुभक्तश्च
मन्त्रग्राही भवेन्नरः ॥"
इसके अतिरिक्त पञ्चविध देवपूजा भी आवश्यक है जो निम्न है—
१. 'अभिगमन'— देवस्थान को स्वच्छ करना, लीपना, निर्माल्य हटाना ।
२. 'उपादान'— गंधपुष्पादिक पूजाद्रव्यों का संग्रह ।
३. 'योग'— इष्टदेवता की अपनी आत्मा के रूप में भावना करना ।
४. 'स्वाध्याय'— मन्त्रार्थ का अनुसन्धान करते हुए जप, सूक्त-स्तोत्रपाठ,
गुणावली-पाठ, लीला एवं धाम का वर्णन एवं
वेदान्ताभ्यास ।
मन्त्र-पूजा—
मांत्री-साधना से मन्त्र-पूजा भी आवश्यक है । इस विधान में अभीष्ट मन्त्र को
ताम्र पत्र पर अष्टगंध से लिखकर उसे कादि-हादि मन्त्र लिखकर सम्पुटित करना
चाहिए । यथा—
(क) कादि विद्या क्रम—क ए ई ल ह्रीं, स क ह ल ह्रीं, ह्रीं सकल ह्रीं ।
(ख) हादि विद्या क्रम—ह स क ह ल ह्रीं, ह स क ह ल ह्रीं, स क ल
ह्रीं—मन्त्र की षोडशोपचार से पूजा भी करनी चाहिए ।। मन्त्र में मन्त्रेश्वर
के विद्यमान रहने की भावना करनी चाहिए ।।